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शहीद ख़ामेनेई और फ़िलिस्तीन

फ़िलिस्तीन, ज़िंदा है और उस का जेहाद जारी है और अल्लाह की मदद से वह आख़िरकार दुष्ट दुश्मन पर विजयी होगा। 7 मई 2021

13/03/2026

अमीरुल मोमेनीन की तरह हम दुश्मनों की ज़्यादा तादाद से नहीं डरते

अमरीका से नहीं डरना चाहिए और ईरानी क़ौम नहीं डरती। क़ौम के सभी वर्गों में जो बहादुरी की यह भावना, अल्लाह पर भरोसे और जोश व जज़्बा है, उस से यह क़ौम विजयी होगी, अपने लक्ष्य को हासिल करेगी और दुश्मनों को झुका कर रहेगी। कोई भी दुश्मन, ईरानी क़ौम को उस राह पर चलने से नहीं रोक सकता, जो इस्लाम ने उस के सामने रखी है। बस यह बात याद रखनी चाहिए कि अली बिन अबी तालिब की तरह दुश्मन की ज़्यादा तादाद से डरना नहीं चाहिए। इमाम ख़ामेनेई 19 जनवरी 1992

11/03/2026

भ्रष्टाचार और ज़ुल्म का द्वीप

बेलगाम यौन संबंध का द्वीप बनाना कोई मामूली बात है? नैतिक भ्रष्टाचार, व्यावहारिक बुराइयां, ज़ुल्म, मुंहज़ोरी, ताक़त का इस्तेमाल, दख़लअंदाज़ी, जो मिले उसे मार देना, जहाँ पर उन का बस चल जाए, जहाँ मुमकिन हो पंजे मारना। इस्लामी क्रांति के शहीद नेता इमाम ख़ामेनेई की 17 जनवरी 2026 की स्पीच का भाग

10/03/2026

सब से घृणित सरकार

आज क्षेत्रीय क़ौमों की नज़र में अमरीका सब से घृणित सरकार है...इलाक़े के लोगों के मज़बूत इरादे से अमरीका को यहाँ से जाना ही पड़ेगा और वो जाएगा। इमाम ख़ामेनेई 17 मई 2025

07/03/2026

हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा शहीद सैयद अली हुसैनी ख़ामेनेई रिज़्वानुल्लाह अलैहः

ईरानी क़ौम डटी हुयी है, सीना तान कर डट गयी है। दुश्मनी इस वजह से है, लड़ाई इसी वजह से है। उन की बाक़ी बातें (जैसे) मानवाधिकार और इस तरह की दूसरी बातें, बकवास हैं; अस्ल बात यह है। वह ललचायी नज़रें लगाए हुए है, ईरान भी पूरी तरह डटा हुआ है और डटा रहेगा और अल्लाह की कृपा से दुश्मन को दुष्टता और पीड़ा देने से मायूस कर देगा।

05/03/2026

हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा शहीद ख़ामेनेईः

अल्लाह की कृपा से मुल्क यह दिखा देगा कि वह एक ताक़तवर राष्ट्र है और कोई भी ताक़त अपना पूरा ज़ोर लगाकर भी ईरानी राष्ट्र को न तो झुका सकती है और न ही हरा सकती है; महान अल्लाह भी मदद करेगा।

05/03/2026

क्षेत्रीय जंग

अमरीकी जान लें कि अगर उन्होंने इस बार जंग छेड़ी, तो यह जंग, क्षेत्रीय जंग होगी। इस्लामी क्रांति के शहीद नेता 1 फ़रवरी 2026

05/03/2026

पश्चिमी सभ्यता का आइसबर्ग

हमने उन के भ्रष्टाचार के बारे में जो कुछ सुना था वह एक तरफ़ और उस बदनाम और भ्रष्ट जज़ीरे का मामला एक तरफ़! ये चीजें वास्तव में पश्चिमी सभ्यता की तस्वीर पेश करती हैं। यह जो हम पश्चिमी सभ्यता, पश्चिम के उदारवादी लोकतंत्र के बारे में बात करते हैं, वह यही है। दो सौ साल, तीन सौ साल काम करते हैं, उसका नतीजा एक ऐसी चीज़ होती है। यह जज़ीरा एक नमूना है, इस तरह की बातें बहुत अधिक हैं। जिस तरह से यह चीज़ प्रकट नहीं थी मगर सामने आ ही गई, उसी तरह बहुत सी दूसरी चीज़ें भी हैं और वे भी सामने आएंगी। इमाम ख़ामेनेई 17 फ़रवरी 2026

25/02/2026

क़ुरआन की रौशनी में: ऐतिहासिक घटनाओं वाले दिनों की याद को बाक़ी रखना क़ुरआन की परंपरा है

निश्चित तौर पर असत्य पर चलने वाले गिरोहों का लक्ष्य 'अय्यामुल्लाह' पर पर्दा डालना या इस तरह के वाक़यात के रंग को फीका बना देना है। (वो चाहते हैं कि) 11 फ़रवरी (इस्लामी इंक़ेलाब की सालगिरह) के दिन को छिपा दें, 3 नवंबर (अमरीकी जासूसी के अड्डे पर क़ब्ज़े) के दिन को, 9 जनवरी (11 मोहर्रम को क़ुम के अवाम के क़त्ले आम) के दिन को, 29 दिसंबर के (यादगार) दिन को और 17 फ़रवरी तबरेज़ की घटना के दिन को, शहीद सुलैमानी के जनाज़े के जुलूस के दिन को, शहीद होजजी के जनाज़े के जुलूस के दिन को, जो सबके सब 'अय्यामुल्लाह' (ऐतिहासिक दिन) हैं, मिटा दें और इतिहास से ख़त्म कर दें। इनमें हर दिन एक मशाल है जिसे असत्य के मोर्चे की नज़र में बुझा दिया जाना चाहिए। यह क़ुरआन मजीद की शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है। क़ुरआन ने इस तरह के दिनों की याद और ज़िक्र को बाक़ी रखने का हुक्म दिया है। "ऐ पैग़म्बर! इस किताब में मरयम का ज़िक्र कीजिए जब वो अपने घरवालों से अलग होकर (बैतुल मुक़द्दस) के एक पूर्वी मक़ाम पर गयीं" (सूरए मरयम, आयत-16) हज़रत मरयम का अहम वाक़ेया भुलाया नहीं जाना चाहिए। इसे इतिहास में बाक़ी रहना चाहिए। शायद दस से ज़्यादा बार क़ुरआन में इस तरह आया हैः 'याद करो, याद करो...' यह क़ुरआन का तरीक़ा है। इमाम ख़ामेनेई 09/01/2023

23/02/2026

इस्लामी घराना : इस्लाम सही उम्र व सही वक़्त पर शादी के लिए ताकीद करता है

शादी की उम्र का मसला भी, जिस पर इस्लामी किताबों में ताकीद की गयी है कि शादी की उम्र कहीं ज़्यादा न हो जाए और जवानों को जल्दी शादी कर लेनी चाहिए, अख़लाक़ी बुराइयों के ख़तरे से बचाने के लिए है। अलबत्ता इसका मतलब यह नहीं है कि कम उम्र में शादी कर दी जाए, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, जी नहीं, जवान लड़के और लड़कियां, मर्द और औरत जहाँ तक हो सके सही वक़्त पर शादी कर लें तो यह इस्लाम की नज़र में ज़्यादा पसंदीदा है, ख़ुद उनके लिए भी निश्चित तौर पर बेहतर है और समाज के लिए भी बहुत अच्छा है। इसलिए जब हम हेजाब के मसले को देखें तो इसे औरत को वंचित करने वाले साधन की नज़र से न देखें। यह अस्ल में एक संपत्ति है, हेजाब सुरक्षा मुहैया करता है, सुरक्षा देता है। इमाम ख़ामेनेई 27/12/2023

21/02/2026

एयरक्राफ़्ट कैरियर से ज़्यादा ख़तरनाक हथियार

अमरीकी राष्ट्रपति बार बार कह रहा है कि हम ने ईरान की ओर एयरक्राफ़्ट कैरियर भेजा है। हाँ ठीक है, एयरक्राफ़्ट कैरियर जहाज़ एक ख़तरनाक उपकरण है लेकिन उस से ज़्यादा ख़तरनाक वह हथियार है जो उसे समुद्र की गहराई में डुबा सकता है। इमाम ख़ामेनेई 17 फ़रवरी 2026

18/02/2026

दरस-ए-अख़लाक़: अल्लाह की नेमतों को गुनाह में इस्तेमाल न करें

इस बात का हमेशा ख़याल रखना चाहिए कि इन नेमतों को कैसे इस्तेमाल करें? आपकी शारीरिक नेमत, आँख की नेमत, कान की नेमत, हाथ की नेमत, पांव की नेमत, ये सब अल्लाह की नेमतें हैं, वो नेमतें हैं कि जिनकी क़द्र व क़ीमत का इंसान कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता, ये इस क़द्र क़ीमती हैं कि किसी भी भौतिक मानदंड पर उनको तौला नहीं जा सकता। अगर इनसे सही फ़ायदा न उठाएं और यूं ही छोड़ दें या ग़लत राह में इस्तेमाल करें और इन नेमतों को अल्लाह की नाफ़रमानी और गुनाह में इस्तेमाल करें तो ये नेमत की नाशुक्री है। अल्लाह हमें और आपको इन नेमतों से नवाज़ता है (लेकिन) हम इन नेमतों को गुनाह और अल्लाह की नाफ़रमानी में एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करें! ये अल्लाह की नेमतों की नाशुक्री की सबसे बुरी हालत है। वे लोग कितने ख़ुशनसीब हैं जिन्होंने अल्लाह की नेमत को नाशुक्री में नहीं बदला, अल्लाह की नेमत का इंकार नहीं किया। सचमुच ऐसा इंसान कितना ख़ुशनसीब है! हमें इसके लिए बहुत ज़्यादा होशियार रहने की ज़रूरत है।  इमाम ख़ामेनेई 30/04/2017

18/02/2026

क़ुरआन की रौशनी में: ज़ायोनियों के प्रचारिक साम्राज्य से डरना नहीं चाहिए

बदलाव लाने की एक शर्त दुश्मन और दुश्मनियों से न डरना है। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने पैग़म्बरे इस्लाम से फ़रमाया हैः "और आप लोगों (के ताने) से डर रहे थे हालांकि अल्लाह इस बात का ज़्यादा हक़दार है कि आप उससे डरें।" (सूरए अहज़ाब, आयत-37) लोगों से डरना नहीं चाहिए, उनकी बातों से ख़ौफ़ज़दा नहीं होना चाहिए। हर अच्छे और सार्थक काम और हर अहम काम के लिए मुमकिन है कि कुछ लोगों के विरोध का सामना करना पड़े। आज साइबर स्पेस के दौर में मुख़ालेफ़त का रूप भी ज़्यादातर कठोर और कष्टदायक हो गया है। अगर कोई काम सही, अहम, ठोस और नपे तुले अंदाज़ में अंजाम पा रहा है तो इन बातों का ख़याल नहीं करना चाहिए। बाहरी दुश्मन की भी परवाह नहीं करनी चाहिए। हर वो काम जो मुल्क में भलाई की ओर किया जाए, दुश्मन की ओर से उसके ख़िलाफ़ एक बड़ा मोर्चा खुल जाता है क्योंकि ये लोग इसी सोच में बैठे रहते हैं कि कहाँ से चोट पहुंचाएं, वैचारिक मैदानों में भी और व्यवहारिक मैदानों में भी। उनका वैचारिक मोर्चा यह है कि जब भी मुल्क में कुछ अहम, सही व तार्किक फ़ैसले लिए जाते हैं ये अपने व्यापक प्रोपैगंडों से उन पर तरह तरह के सवाल खड़े कर दे और उस प्रचारिक साम्राज्य के ज़रिए जो ज़ायोनियों के हाथ में है, इन्हें दबा दे और तबाह कर दे। इमाम ख़ामेनेई 03/06/2020

16/02/2026

इस्लामी घराना: मियां बीवी के दरमियान मोहब्बत, सामाजिक मैदान में औरत की मुश्किलों को कम कर देती है

अगर फ़ैमिली में औरत को मनोवैज्ञानिक व नैतिक नज़र से सुरक्षा हासिल हो, सुकून व इत्मेनान हो तो हक़ीक़त में शौहर उसके लिए लेबास समझा जाता है जैसा कि वह शौहर के लिए लेबास है। जैसा कि क़ुरआन मजीद ने मुतालबा किया है कि उनके दरमियान मोहब्बत और लगाव रहे और फ़ैमिली में "औरतों के लिए भी वैसे ही हुक़ूक़ हैं जैसे मर्दों के हैं।" (सूरए बक़रह, आयत-228) अगर औरत, अपने घर में अपने अस्ल मोर्चे पर अपने मसलों को कम कर सके तो निश्चित तौर पर वह सामाजिक सतह पर भी यह काम कर सकेगी। इमाम ख़ामेनेई 04/01/2012

14/02/2026

इस्लामी घरानाः इंसान की शख़्सियत समाज की संस्कृति की बुनियाद पर घर के माहौल में बनती है

अगर नस्लें अपने मानसिक व वैचारिक नतीजे, बाद की नस्लों के मन में बिठाना चाहती हैं और समाज अपने अतीत से फ़ायदा उठाना चाहता है तो यह सिर्फ़ घर और परिवार के ज़रिए मुमकिन है। घर के माहौल में ही सबसे पहले एक शख़्स की पूरी शख़्सियत व हैसियत, उस समाज की सांस्कृतिक बुनियादों पर वजूद में आती है और यह माँ बाप ही हैं जो सीधे तौर पर किसी भी क़िस्म के दिखावे से दूर, बिलकुल स्वाभाविक अंदाज़ में इंसान के मन, विचार और व्यवहार पर असर डालते हैं और अपनी मालूमात, आइडियालोजी और आस्था वग़ैरह को अपनी बाद की नस्लों के मन में बिठाते हैं। इमाम ख़ामेनेई 04/01/2001

13/02/2026

दरस-ए-अख़लाक़: समाज में फ़ुज़ूलख़र्ची कम होनी चाहिए

हमारा समाज अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम की परहेज़गारी की दिशा में आगे बढ़े। मतलब यह नहीं है कि हम अमीरुल मोमेनीन की तरह परहेज़गार बन जाएं। क्योंकि न हम बन सकते हैं न हम से इसकी मांग की गयी है लेकिन हमको उन्हीं की राह पर चलना चाहिए यानी फ़ुज़ूलख़र्ची और एक दूसरे की देखादेखी से दूर रहना चाहिए। ऐसी हालत में हम अमीरुल मोमेनीन के शिया कहे जाएंगे। फ़रमाया हैः "हमारे लिए ज़ीनत बनो" हमारे लिए ज़ीनत बनने का क्या मतलब है? मतलब यह है कि तुम्हारा अमल ऐसा हो कि जब कोई तुमको देखे तो कहेः वाह वाह अमीरुल मोमेनीन के शिया कितने अच्छे हैं! अफ़सोस कि हम फ़ुज़ूलख़र्ची का शिकार हैं। हम बरसों से इस बारे में मुसलसल नसीहत करते चले आ रहे हैं ख़ुद अपने आपको, अवाम को और दूसरों को बराबर समझाते रहते हैं और बार-बार कहते हैं, हमें आगे बढ़ना चाहिए और समाज में फ़ुज़ूलख़र्ची को कम करना चाहिए। इमाम ख़ामेनेई 21/09/2016

11/02/2026

क़ुरआन की रौशनी में: अगर आप अपने भीतर सार्थक बदलाव लाए तो अल्लाह आपके लिए सार्थक बदलाव वजूद में लाएगा

इंसान अगर सही दिशा में क़दम उठाएं तो सही दिशा में आगे बढ़ेंगे और अगर ग़लत राह पर लग जाएं तो ग़लत राहों पर ही बढ़ते चले जाएंगे। क़ुरआन में इन दोनों ही बातों की ओर इशारा मौजूद है। सूरए राद (की आयत 11) में इरशाद होता हैः "बेशक अल्लाह किसी क़ौम की उस हालत को नहीं बदलता जो उसकी है जब तक क़ौम ख़ुद अपनी हालत को न बदले।" आयत में सार्थक पहलू को बयान किया गया है, यानी जब आप ख़ुद अपने भीतर सही बदलाव लाएंगे तो अल्लाह भी आपकी ज़िन्दगी में सार्थक घटनाएं व हक़ीक़तें वजूद में लाएगा। दूसरे पहलू की ओर सूरए अनफ़ाल (की 53वीं आयत) में इशारा हुआ हैः "ये इस बिना पर है कि अल्लाह कभी उस नेमत को तबदील नहीं करता जो उसने किसी क़ौम को अता की है जब तक कि वो ख़ुद अपनी हालत तबदील न कर दें।" ये नकारात्मक पहलू है, ये पीछे हटने का पहलू है कि अगर अल्लाह ने किसी क़ौम को कोई नेमत दी और उसने सही दिशा में क़दम नहीं उठाया और सही काम अंजाम नहीं दिए तो अल्लाह उस नेमत को उनसे छीन लेता है। इमाम ख़ामेनेई 03/06/2020

09/02/2026

दरस-ए-अख़लाक़: फूट, कमज़ोरी और इज़्ज़त गंवाने का सबब है

इस्लामी जगत की पीड़ा के बहुत से कारण हैं। जब हम फूट का शिकार हों, जब एक दूसरे के हमदर्द न हों जब यहाँ तक कि एक दूसरे का बुरा चाहने वाले बन गए हों तो इसका नतीजा यही है। क़ुरआन फ़रमाता हैः "और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो और आपस में झगड़ा न करो वरना कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी।" (सूरए अनफ़ाल, आयत-46) जब तुम आपस में झगड़ा करोगे तो कमज़ोरी पैदा हो जाएगी। 'फ़शल' यानी कमज़ोरी "तज़हबा रीहोकुम" का मतलब "तज़हबा इज़्ज़तोकुम" यानी इज़्ज़त गंवा दोगे। फूट का शिकार हुए तो स्वाभाविक तौर पर मिट्टी में मिल जाओगे, ज़लील हो जाओगे, अपने ऊपर ग़ैरों के वर्चस्व की राह समतल कर दोगे। फूट का नतीजा यही है। अमीरुल मोमेनीन ने क़ासेआ नामी ख़ुतबे में अपने सुनने वालों को इतिहास के अध्ययन की दावत दी है। इस ख़ुतबे में आप फ़रमाते हैं: "पिछले लोगों को देखो, जब वे एकजुट थे तो उनको क्या सम्मान हासिल हुआ, कैसी शान हासिल की! लेकिन जब उनके बीच आपस में जुदाई, फूट और दुश्मनी फैल गयी तो अल्लाह ने इज़्ज़त व सम्मान का लेबास उनके तन से उतार लिया। वो इज़्ज़त व मक़ाम उन्हें हासिल था, वो सम्मान जिससे उनकी शोभा बढ़ी हुयी थी और वो नेमतें जो अल्लाह ने उनको दे रखी थीं, फूट की वजह से उनसे छीन ली गयीं।" इमाम ख़ामेनेई 14/10/2022

05/02/2026

जंग का दायरा

अमरीकी जान लें कि अगर उन्होंने इस बार कोई जंग छेड़ी तो इस का दायरा पूरे इलाक़े में फैल जाएगा। इमाम ख़ामेनेई 1 फ़रवरी 2026

02/02/2026

फ़ौलादी मुक्का

हम (जंग) शुरू नहीं करेंगे लेकिन, जो हमला करना चाहेगा ईरानी क़ौम उसे फ़ौलादी मुक्का मारेगी। इमाम ख़ामेनेई 1 फ़रवरी 2026

02/02/2026

क़ुरआन की रौशनी में: दुश्मन को समाज में पैठ न बनाने दीजिए

पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी से मिलने वाला एक बहुत ही अहम ख़ज़ाना, जिसकी ओर अफ़सोस कि ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता, दुष्ट लोगों के मुक़ाबले में दृढ़ता और अभेद्य होना है। मानव समाज को जो नुक़सान पहुंचा है, उनमें से एक उनके दुश्मनों का उनके बीच पैठ बना लेना है कि जिसका ज़िक्र पवित्र क़ुरआन में आया हैः "वो काफ़िरों पर सख़्त हैं" (सूरए-फ़तह, आयत-29) इस आयत में 'अशिद्दा' शब्द आया है जिसका मतलब अमल में सख़्ती नहीं है। 'अशिद्दा' उस मानी में कि जिसे फ़ारसी में कर्म करने में शिद्दत कहते हैं, नहीं है। 'अशिद्दा' यानी सख़्त होना, मज़बूत होना, अभेद्य होना, 'अशिद्दा' का यह मतलब है। 'अशिद्दाओ अलल कुफ़्फ़ार' यानी काफ़िरों को इजाज़त न देना कि वो समाज में पैठ बनाएं। इमाम ख़ामेनेई 18/02/2023

02/02/2026

इस्लामी घरानाःमियां बीवी एक दूसरे की क़िस्मत और आख़ेरत संवारें

बहुत सी बीवियां हैं जो अपने शौहरों को जन्नत का हक़दार बना देती हैं और बहुत से शौहर हैं जो अपनी बीवी को सही मानी में सौभाग्यशाली बना देते हैं। इसी तरह इसका उलटा भी है। मुमकिन है (शादी से पहले) शौहर अच्छा रहा हो मगर बीवी उसे जहन्नमी बना दे या बीवियां अच्छी रही हों जिन को उनके शौहरों ने जहन्नमी बना दिया हो। अगर शौहर और बीवी दोनों इस बात पर ध्यान दें तो वो अच्छी नसीहतों के ज़रिए और आपस में अच्छे सहयोग से घर में धर्म व नैतिकता की बातें करके और वो भी ज़बानी बातों के ज़रिए नहीं बल्कि अपने व्यवहार व अमल के ज़रिए इस तरह एक दूसरे की मदद करते हैं। ऐसी स्थिति में ज़िन्दगी सही मानी में मुकम्मल और ख़ूबसूरत हो जाएगी। इमाम ख़ामेनेई 02/03/1999

31/01/2026

दरस-ए-अख़लाक़ःदिल की गहराई से अल्लाह से दुआ, बंद राहों को खोल देती है

हमारे मुल्क में जिस हद तक अध्यात्म से लगाव पैदा हुआ है, निश्चित तौर पर यह हमारे काम में मददगार होगा। ऐसी स्थितियां भी होती हैं जब इंसान किसी चीज़ के सिलसिले में रास्तों को बंद पाता है लेकिन अल्लाह से दिल की गहराई से ध्यान और पैग़म्बरों व इमामों के वसीले से दुआ से कि जिन पर अल्लाह की ख़ास इनायतें हैं, बंद राहें खुल जाती हैं कि हम सब इसे अपनाए रहेंगे इंशाअल्लाह। हम भविष्य को बहुत ही उज्जवल देख रहे हैं और जानते हैं कि अल्लाह के करम से, उसकी ताक़त से इस मुल्क का भविष्य, अतीत की तुलना में हर रुख़ से चाहे वो भौतिक हो या आध्यात्मिक, बेहतर से बेहतर होता जाएगा। इमाम ख़ामेनेई 04/09/2014

28/01/2026

क़ुरआन की रौशनी में: अल्लाह की ताक़त, मुजाहिदों के साथ है

आपने अगर संघर्ष किया और दृढ़ता दिखाई तो अल्लाह की ताक़त आपके साथ होगी। वो लश्कर जिसका अल्लाह मददगार न हो वो कुछ नहीं कर सकता। एक ऐसा लश्कर जिसकी पीठ मज़बूत है, जिसके पास रिज़र्व फ़ोर्स है, अथाह ताक़त का भंडार है, वो सारे काम कर सकता है। एक ऐसा लश्कर जिसकी पीठ मज़बूत है, उसके पीठ पर अल्लाह की ताक़त हो तो क्या ऐसा लश्कर हार सकता है? इसी उसूल के तहत साम्राज्यवाद के क़ब्ज़े में मौजूद सभी सरज़मीनें आज़ाद हो सकती हैं, इसी उसूल के तहत फ़िलिस्तीन भी आज़ाद हो सकता है, इसी उसूल पर अमल से कोई भी राष्ट्र कमज़ोर न रहेगा...अल्लाह की ताक़त उनकी पीठ पर होती है जो मैदान में उतर पड़ते हैं, क़दम बढ़ाते हैं और कोशिश करते हैं, ख़ुद को सभी हालात के लिए तैयार कर लेते हैं। ये लोग अल्लाह की ताक़त पर भरोसा करते हैं। "यह इसलिए है कि अल्लाह अहले ईमान का सरपरस्त है और जो काफ़िर हैं उनका कोई सरपरस्त और कारसाज़ नहीं है" (सूरए मोहम्मद, आयत-11) इमाम ख़ामेनेई 23/5/2016

26/01/2026

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