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इंसानियत के मूल मुद्दों में से एक विश्व स्तर पर महिला के मुद्दे पर नज़र

शहीद ख़ामेनेई औरत की मौजूदा स्थिति को किस नज़र से देखते थे और इस संबंध में क्या हल पेश करते थे?

शहीद ख़ामेनेई औरत की मौजूदा स्थिति को किस नज़र से देखते थे और इस संबंध में क्या हल पेश करते थे?

एक मूल मुद्दा जिस पर बात करने और जिसे पेश करने में हमारे शहीद नेता बहुत दिलचस्पी रखते थे और ख़ास तौर पर महिलाओं के साथ अपनी चर्चा में इस पर बात करना चाहते थे "महिलाओं" का मुद्दा था। मैं उन का एक संक्षिप्त कथन पेश करना चाहती हूं ईरानी महिलाओं की एक सभा में 22 मई 2011 को उन्होंने महिलाओं के संकट के बारे में बात की थी।

शहीद नेता ने कहा था कि शायद आज यह शब्दावली "महिलाओं का संकट" हैरतअंगेज़ लगे जबकि क्लाइमेट चेंज के संकट, जल संकट, ऊर्जा संकट और धरती का तापमान बढ़ने जैसे संकटों की बात की जा रही है। उस वक़्त ये सारी जंगें और बदलाव नहीं हुए थे और शायद वह दौर किसी हद तक शांतिपूर्ण था। इसलिए उन्होंने उन मिसालों को मानवता के मूल मुद्दों के तौर पर पेश किया था लेकिन इसी के साथ उन्होंने बल देकर कहा था कि इन में से कोई भी मानवता का मूल और बुनियादी मुद्दा नहीं है इंसानियत की बुनियादी मुश्किलों के बड़े भाग का उन मुद्दों से संबंध है जो इंसान के अध्यात्म, नैतिकता और इंसानों के एक दूसरे के साथ सामाजिक रवैये से जुड़े हुए हैं और उन में से एक मसला, महिलाओं, उनकी पोज़ीशन और समाज में उन के सम्मान से संबंधित है जो वास्तव में एक संकट शुमार होता है। इसलिए आज मैं जिस विषय पर बात करना चाहती हूं वह यह है कि हमारे शहीद नेता, आयतुल्लाह ख़ामेनेई दुनिया में महिलाओं के संबंध में रवैये को बुनियादी मुश्किल के तौर पर देखते थे सिर्फ़ अमरीका में या योरोप में या फिर दूसरी जगहों पर नहीं बल्कि वह इस मसले को दुनिया का मूल मुद्दा मानते थे ऐसा मुद्दा जिसे ज़्यादा तर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है उसे कम ही देखा जाता है और उसकी ओर से ग़फ़लत की जाती है। जबकि यह मसला, इंसानियत का एक बुनियादी और गहरा मुद्दा है और इसी वजह से इस पर गंभीर रूप से ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है अहम बात यह है कि हम इस बात की समीक्षा करें कि वह इस मसले को किस तरह से देखते थे? उन्होंने किन बिंदुओं को चिन्हित किया था? वह इस संकट की किस तरह समीक्षा करते थे? क्या वह इस संकट के बारे में कोई भविष्यवाणी या कोई हल पेश करते थे? और जब वह कोई हल पेश करना चाहते थे हमारे लिए

या पूरी दुनिया की महिलाओं के लिए, चाहे वह मुसलमान हों या ग़ैर मुसलमान, कौन सा रोल मद्देनज़र रखते थे? कुल मिलाकर शहीद नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई जागरुक और ज़िंदा ज़मीर इंसान के तौर पर हमारे लिए चाहे मर्द हो या औरत जो मानवता के मूल और गंभीर मुद्दों के हल के लिए कोशिश करना चाहते हैं, क्या पोज़ीशन मद्देनज़र रखते थे?

पश्चिमी सभ्यता में औरतों को "उपभोग की वस्तु" समझना और सुनियोजित रूप से उसका अमानवीयकरण करना (डिह्यूमनाइज़ेशन)

इमाम ख़ामेनेई, सैयद अली ख़ामेनेई बार बार इस विचार के बारे में बात करते थे कि इस सिलसिले में एक सिस्टमैटिक मुश्किल है जिस की जड़ पश्चिमी सभ्यता में है। जब हम पश्चिमी सभ्यता के सिलसिले में उन के विचार को देखते हैं तो उन की मुख्य आलोचना यह थी कि इस सभ्यता की बुनियाद आम तौर पर इंसानों से फ़ायदा उठाने और उन के अमानवीयकरण और ख़ास तौर पर महिलाओं के अमानवीयकरण पर रखी गयी है। ये मेरे शब्द हैं इस सिलसिले में दो अहम कीवर्ड्स पाए जाते हैं: मुनाफ़ा कमाना और लज़्ज़त हासिल करना यह ऐसा सिस्टम है जिसकी बुनियाद मुनाफ़ा ख़ोरी और ख़ास तौर पर महिलाओं के प्रति वासना पर रखी गयी है। इस लिए वह बारंबार इस बिंदु की ओर इशारा करते थे और यह सवाल करते थे कि जब आप पश्चिमी सभ्यता और उन मुल्कों पर जो इस का एक भाग समझे जाते हैं, नज़र डालते हैं तो क्यों यह नज़र आता है कि औरतों से यह अपेक्षा रखी जाती है कि जब वे सामाजिक मैदान में आएं तो एक ख़ास तरीक़े से आएं और ऐसे मानदंडों को अपनाएं जो बड़ी हद तक महिलाओं के अमानवीयकरण के लिए हैं जब कि मर्दों के बारे में इस तरह की अपेक्षा नहीं रखी जाती

यह क्या है? क्यों पश्चिमी सभ्यता इस सोच पर इस हद तक ज़ोर देती है? और दूसरा सवाल यह है कि क्यों इस हद तक इस सिस्टम को पूरी दुनिया में फैलाने की कोशिश की जा रही है? ऐसा नज़र आता है कि यह मसले का दूसरा भाग है। हमारा सामना एक ऐसे सिस्टम से है जो ख़ुद को दूसरे तमाम सिस्टमों से श्रेष्ठ समझता है यह सोच, पश्चिमी सभ्यता का एक भाग है और कम से कम 15वीं सदी के अंत में साम्राज्यवाद के सुनियोजित रूप से आग़ाज़ से, उस की मूल नाणी बन चुकी है। यह चीज़ महिलाओं की ज़िंदगी के क्षेत्र में महिलाओं के संबंध में सोचने के अंदाज़ में समाज में महिलाओं को रोल को समझने में फ़ैमिली में उन के रोल के बारे में और इसी तरह महिलाओं को मज़बूत और अख़्तियार वाली बनाने और उनकी आज़ादी के सिलसिले में साफ़ तौर पर देखी जा सकती है। पश्चिमी सभ्यता इस मैदान में न सिर्फ़ एक संकटग्रस्त सिस्टम का शिकार है बल्कि उसे दुनिया भर में फैलाना भी चाहती है। उन्होंने अपने एक हालिया ख़ेताब में बयान किया था कि वे लोग, इस मॉडल और नमूने को दूसरे मुल्कों और सभ्यताओं पर थोपने की कोशिश कर रहे हैं। इस के अलावा उन की कोशिश है कि दूसरे मुल्कों, क़ौमों और समाजों के सांस्कृतिक ढांचे को ढा दें जो महिलाओं के संबंध में अलग सोच रखते हैं। ऐसा क्यों है? इस लिए यह मुश्किल को चिन्हित करने का पहला हिस्सा हैः हमें पश्चिमी सभ्यता में मौजूद एक सिस्टमैटिक मुश्किल का सामना है जो महिलाओं को अमानवीय नज़र, सम्मान से ख़ाली और उपभोग की वस्तु की नज़र से देखता है।

महिलाओं से संबंधित मुद्दों के इस्लामी हल

उन की नज़र में, आयतुल्लाह ख़ामेनेई की नज़र में हल क्या है? क्या इस मसले का कोई हल है? जब हम हल करने के चरण में पहुंचते हैं तो क्या करना चाहिए? इस सिलसिले में आयतुल्लाह ख़ामेनेई के नज़रिए के दो भाग हैं पहला भाग आदर्शों और नमूनों पर ताकीद करता है वे आदर्श के बारे में बात करते हैं और इस लेहाज़ से औरत के बारे में इस्लाम का नज़रिया बयान करते हैं औरत को किस नज़र से देखना चाहिए?  वे अपने भाषणों में बार बार हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा का ज़िक्र करते हैं वे 27 जूलाई 2005 को अपने एक ख़ेताब में कहते हैं: इस्लाम, फ़ातेमा को, इस नुमायां, बेमिसाल और परालौकिक शख़्सियत को महिला के आदर्श और नमूने के तौर पर पेश करता है उन की ज़ाहिरी ज़िंदगी, संघर्ष, सरगर्मियों, इल्म वाकपटुता, बलिदान, बीवी और माँ की हैसियत से उन के रोल हिजरत, तमाम राजनैतिक, सैन्य और इंक़ेलाबी मैदानों में उन की मौजूदगी और कमाल की हद तक इन ख़ूबियों के साथ, जिसके सामने बड़े बड़े मर्द सिर झुका देते थे। ये सारी चीज़ें, उन के आध्यात्मिक स्थान, उन की इबादतों और उन के सजदों और अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम के बराबर उन के मक़ाम के साथ पेश की जाती हैं इसलिए वे हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा को एक आदर्श के तौर पर पेश करते हैं औरत होने के एक आदर्श के तौर पर। कभी कभी यह सवाल किया जाता है कि यह कैसे मुमकिन है कि एक इंसान जो 1400 साल पहले का है, आज की महिलाओं के लिए नमूना हो? लेकिन जैसा कि इमाम ख़ामेनेई के बयानों में देखा जाता है कि वे हज़रत फ़ातेमा की शख़्सियत को इस तरह आज की दुनिया से प्रासंगिक दिखाते हैं कि वे पूरी तरह से समकालीन और समझने योग्य बन जाती हैं। वे एक सरगर्म महिला थीं फ़ैलिमी के स्तर पर और सामाजिक स्तर पर और इसी के साथ ही वे अध्यात्म की चोटी पर थीं। तो हल का एक पहलू यह है कि हम यह जानें कि आदर्श मौजूद हैं अलबत्ता ये सारे आदर्श हज़रत फ़ातेमा के स्तर के नहीं हैं वे इसी तरह दूसरी सरगर्म महिलाओं का भी ज़िक्र करते हैं: शहीदों की माएं, शहीदों की बीवियां, ईरान में ख़ास तौर पर इंक़ेलाब के दौर की सरगर्म महिलाएं और वे महिलाएं भी जिन्होंने थोपी गयी 8 वर्षीय जंग में योगदान दिया था। कुल मिलाकर वे इस्लाम को ऐसा सिस्टम बताते हैं जो अमानवीयकरण को रोकता है महिला का मानवता का दर्जा बहाल करता है और उस के लिए ज़िंदगी के तमाम मैदानों में सरगर्म मौजूदगी को मुमकिन बनाता है।

महिला का तीसरा आदर्श: महिला के मुद्दे पर शहीद ख़ामेनेई के आला विचार 

शहीद रहबर आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई ने अपने एक बयान में फ़रमायाः "हम मुसलमान महिला का तीसरे आयाम से आदर्श रूप पेश कर रहे हैं" ऐसा आदर्श जो न पूर्वी है ओरिएन्टलिज़्म के अर्थ में ओरिएन्टलिज़्म की नज़र में, पूर्वी महिला घर में रहने वाली ऐसा वजूद है जिसका अधिकार नहीं है और वह सामाजिक रोल से वंचित है इस्लामी परंपराओं की ग़लत समझ कि जिसे हवा देने में साम्राज्यवाद का भी हाथ रहा है। ऐसे हालात में जब इस्लामी समाजों में अस्वस्थ संस्कृतियों की घुसपैठ थी धर्मपरायण और इस्लाम की पाबंदी करने वाले परिवार भी कभी अपनी लड़कियों और औरतों के लिए मौजूद अवसर मुहैया नहीं कर सकते थे। इसलिए शहीद रहबर आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई बारंबार इस बात पर बल देते थे कि हम ऐसे आदर्श की बात करते हैं जो न तो ओरिएन्टलिस्ट द्वारा विकृत अर्थ में पूर्वी है यानी महिला सिर्फ़ घर में सीमित रहे और समाज में उसका कोई रोल न हो राजनीति और अर्थव्यवस्था के बारे में न सोचे घर से आगे की ज़िम्मेदारी न ले और न ही पश्चिम के अर्थ में जो अमानवीयकरण है, जिस में औरत को उपभोग की वस्तु, वासना की वस्तु के रूप में देखा जाता है हमारे पास इस का आदर्श विकल्प है ऐसा आदर्श जिस में, महिला का एक इंसान के रूप में सम्मान किया जाता है और उस के मानव सम्मान की रक्षा की जाती है। इस आदर्श में, महिलाओं को न सिर्फ़ यह कि इजाज़त है बल्कि उन से इस बात की अपेक्षा है कि वे अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को पूरा करें। साथ ही महिलाओं से इस बात की भी अपेक्षा है कि वे परिवार को अपनी प्राथमिकता क़रार दें और यह 'समाज के पहले सेल' -इस बुनियादी इकाई को- स्वस्थ रखती है वे परिवार के संबंध में और परिवार के परिवेश में जो रोल रखती हैं, उस के संबंध में उदासीन नहीं हैं। जिस वक़्त वे इस मार्ग में सफल महिलाओं के बारे में बात करते हैं पारिवारिक स्तर पर सफलता की मिसालें और सामाजिक स्तर पर सफलता की मिसालें पेश करते हैं। मिसाल के तौर पर जब अपनी माँ के बारे में उन के बयान को देखते हैं -जिसे उन्होंने अपनी डायरी में बयान किया है- तो एक 'संपूर्ण महिला' की कल्पना सामने आती है। वे गृहस्थ महिला थीं और परिवार से बाहर कोई काम नहीं करती थीं लेकिन शहीद रहबर के शब्दों में एक संपूर्ण इंसान का नमूना पेश करती हैं। शहीद रहबर जो कुछ थे, उनके शब्दों में, उन की माँ की देन थी। वे कहते हैं कि उन की माँ बच्चों को इकट्ठा करती थीं और मीठी आवाज़ में क़ुरआन की तिलावत करती थीं और उन्हें कहानियां सुनाती थीं वास्तव में अपने बच्चों को आथ्यात्मिक पोषण तत्व देती थीं इसी तरह अपनी बीवी से बात करने के उन के अंदाज़ को देखिए अपनी जीवनी में जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद "सेल नंबर-14" शीर्षक के तहत छपा है, बयान करते हैं कि उन की बीवी भौतिक जीवन में बलिदान की भावना रखती थीं भौतिकवाद की ज़ाहिरी चकाचौंध से कोई लगाव नहीं था बलिदान का जज़्बा उन में नुमायां था। बलिदान, अध्यात्म, दुनिया के प्रति लगाव न होता और ईमानदारी ये वे मूल ख़ूबियां हैं जो "महिला के संकट" से पार पाने और उस संकट से पार पाने के लिए जिस से इंसानियत को नुक़सान पहुंचता है, बहुत ज़रूरी समझी जाती हैं। 

लेखिकाः डॉक्टर हकीमा सक़ाए बी रियातेहरान यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर

मार्च 2026

11/04/2026

पश्चिमी सभ्यता में औरतों को "उपभोग की वस्तु" समझना और सुनियोजित रूप से उसका अमानवीयकरण करना (डिह्यूमनाइज़ेशन)