इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वेच्च नेता सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई
हुर्मुज़ जलडमरूमध्य के संचालन को निश्चित तौर पर नए चरण में लेकर जाएंगे
इस्लामी इंक़ेलाब के सर्वेच्च नेता सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई ने इमाम ख़ामेनेई की शहादत के चेहलुम पर और इसी तरह थोपी गयी तीसरी जंग से संबंधित अहम मसलों के बारे में बयान जारी किया।
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
(ऐ रसूल (सल्लललाहो अलैहि वआलेही वसल्लम)) बेशक हम ने आप को एक फ़तहे मुबीन (नुमायां फ़तह) अता की है। ताकि अल्लाह इन (लोगों की नज़र में) आप के तमाम अगले और पिछले गुनाह बख़्श दे और आप पर अपनी नेमत तमाम करे और आप को मंज़िले मक़सूद तक पहुंचा दे। (सूरए फ़तह, आयत-1 और 2)
इस्लाम और ईरान के दुश्मनों के सब से बड़े अपराधों में से एक अपराध और ईरानी राष्ट्र के इतिहास में अवामी सतह पर पहुंचाए गए सब से बड़े दुखों में से एक को चालीस दिन हो रहे हैं जो इस्लामी इंक़ेलाब के महान रहबर, ईरानी क़ौम के पिता, इस्लामी जगत के नेता और मौजूदा दौर में सत्य के समर्थकों के पेशवा, ईरान और रेज़िस्टेंस के मोर्चे के शहीदों के सरदार, महान ख़ामेनेई की दिल को दहलाने वाली शहादत का दाग़ है।
हमारे शहीद रहबर की महान आत्मा को अल्लाह के क़रीब औलिया, सिद्दीक़ीन और शहीदों का मेहमान हुए 40 दिन बीते हैं और इसी के साथ या एक के बाद एक, इस्लाम के मददगारों, कमांडरों और मुजाहिदों तथा मज़लूम हमवतनों की बड़ी तादाद, कि जिस में नवजात शिशुओं से लेकर बूढ़ें शामिल हैं, शहादत के महान दर्जे को पहुंची है।
महान अल्लाह की ओर से इस उम्मत के रहबर को अपने पास बुलाए हुए चालीस रात और दिन हुएं हैं; लेकिन इस बार हज़रत मूसा कलीमुल्लाह के दौर में घटी घटना के विपरीत, शहीद रहबर के साथी और उनकी क़ौम सत्य को क़ायम करने और असत्य का मुक़ाबला करने के मिशन के लिए आगे आई और वे ठोस पहाड़ की तरह सामरी और उस की गाय की मूर्ति के मुक़ाबले में डट गए और हमलावरों और फ़िरऔनियों पर आग के लावे की तरह बरसे।
दुनिया के साम्राज्यवादियों को चालीस दिन हो चुके हैं जब से उन्होंने, धूर्ततापूर्ण नक़ाब डालकर क़त्ल, ज़ुल्म, अग्रेशन, झूठ, बच्चों के नरसंहार और भ्रष्टाचार के शैतानी और घिनौने रूप को दिखाया है।
लेकिन इस के मुक़ाबले में चालीस दिन से महान ख़ुमैनी और अज़ीज़ शहीद ख़ामेनेई के ग़ैरतमंद सपूत और पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद (सल्लललाहो अलैहि व आलेही व सल्लम) के शुद्ध इस्लाम के अनुयाई, बेमिसाल संघर्ष और बहादुरी के साथ चौक, स्कवाएर, सड़कों और मोर्चों पर मौजूद हैं और दुश्मन की ओर से बर्बरतापूर्ण भीषण हमले से होने वाले नुक़सान के बावजूद, तीसरी थोपी हुयी जंग को, तीसरे पाकीज़ा डिफ़ेंस के शौर्य का मंच बना दिया है। ईरान की जागरुक और होशियार क़ौम ने अगरचे यह दिखाया है कि वह अपने शहीद नेता की जुदाई के बड़े ग़म में दुखी है, लेकिन इस के साथ ही उस ने हुसैनी आशूरा के प्रत्यक्ष वारिसों का अनुसरण करते हुए, इस दुख से शौर्यगाथा लिख दी और इन सब चीज़ों ने सिर से पैर तक हथियारों से लैस दुश्मन को हैरत और मायूसी का शिकार कर दिया और दुनिया के आज़ादी प्रेमियों को तारीफ़ करने पर बाध्य कर दिया है। इस बार साम्राज्यवादियों की जेहालत और नादानी, 1404 (हिजरी शम्सी के बारहवें महीने) इस्फ़ंद को, ईरान और इस्लामी इंक़ेलाब के ताक़तवर और उस के नाम के उजागर होने के नए अध्याय के शुरू होने और इस्लामी ईरान के परचम के न सिर्फ़ मुल्क के भौगोलिक क्षेत्र बल्कि दुनिया में सत्य के खोजियों के दिल पर फहराने का सबब बनी।
यह मुनासेबत, इस बात का उचित मौक़ा है कि अज़ीम रहबर को कुछ हद तक पहचनवाया जाए। ऐसी हस्ती के बारे में बात है कि वह जितना मशहूर था, उस हद तक उसको पहचाना नहीं गया। सभी जानते हैं कि हमारे शहीद नेता, समय की पहचान और अंतर्दृष्टि रखने वाले फ़क़ीह, अथक संघर्ष करने और पहाड़ की तरह डटे रहने वाले मुजाहिद, अमल करने वाले और आत्मज्ञानी धर्मगुरू, अल्लाह को याद करने, (रात की विशेष नमाज़) तहज्जुद पढ़ने और उसके सामने गिड़गिड़ाने वाले, पाकीज़ा मासूम हस्तियों को कि उन सब पर अल्लाह का सलाम व दुरूद हो, वसीला क़रार देने वाले और दिल की गहराइयों से अल्लाह के वादे पर ईमान रखने वाले थे। उन की दूसरी ख़ूबियों में ईरान से मोहब्बत और अज़ीज़ ईरान की ज़्यादा से ज़्यादा स्वाधीनता के लिए लगातार कोशिश करने के साथ ही राष्ट्रीय एकता व समरस्ता पर ताकीद करना था। उन्होंने इस्लामी सिस्टम को क़ायम करने, उसे मज़बूत बनाने और उस के बाक़ी रहने के लिए एक उम्र कोशिश की और इस के साथ ही अवाम के बिना इस्लामी गणराज्य उन की नज़र में निरर्थक था। ताक़त और दृढ़ता के साथ ही वह विचारों को बहुत गहराई और मामलों को बहुत ध्यान से देखते थे। मुल्क की क्षमताओं ख़ास तौर पर युवा नस्ल को ख़ास तौर पर महत्व देते और उन के सहारे इल्म, टेक्नॉलोजी और तरक़्क़ी को अहमियत देते थे। शहीदों के महान घर वालों, जांबाज़ों और वतन की रक्षा के लिए लड़ चुके लोगों को ख़ास तौर पर सम्मान देते थे। कई आयाम से क़ीमती अनुभव और कुछ क्षेत्रों में कई दशकों का अनुभव रखते थे और भी बहुत सी ख़ुसूसियतें है कि जिसकी लिस्ट बड़ी लंबी है। इन दिनों मीडिया में उन में कला के शौक़, कला की पहचान और उसे बढ़ावा दिए जाने की उन की कोशिशों पर चर्चा हो रही है। यह तत्व अकेले ही किसी शख़्स की अहमियत को बहुत बढ़ा सकता है और निश्चित तौर पर हमारे अज़ीज़ रहबर में सही अर्थों में बहुत ऊंचे दर्जे तक था, जो उन के वजूद के दूसरे तत्वों और ख़ूबियों की तुलना में छोटा नज़र आता है। मैं व्यक्तिगत तौर पर उन में मौजूद बहुत से कौशल को जानता हूं।
उन में एक बड़ा कौशल जिस की ओर लोगों का कम ध्यान है, वह अवाम के विशाल समूहों और सामाजिक गुटों की वैचारिक और भावनात्मक संरचना के निर्माण के ज़रिए समाज की तरबियत का कौशल था।
उन में एक दूसरा कौशल, टार्गेट ओरिएंटेड संस्थाओं का निर्माण था जिसे उन्होंने वरिष्ठ नेता बनने के शुरू के सालों में, दूरगामी क्षितिज को मद्देनज़र रखते हुए, क़ायम किया था।
उन में एक और कौशल, मुल्क के सैन्य ढांचे को मज़बूत बनाने के लिए, उनके द्वारा उठाया गया क़दम था। ईरानी क़ौम हालिया थोपी गयी दो जंगों में उस के सार्थक प्रभावों से परिचित और लाभान्वित हुयी। इसी तरह इल्मी, रणनैतिक और नीति निर्धारण सहित मुख़्तलिफ़ आयाम से उन में, आविष्कार करने की सलाहियत, उन में दूसरे कौशल थे कि जिस का छोटा सा भाग, सिस्टम की मूल नीतियों के संकलन में नज़र आता है। तुरंत शब्दावली और अनोखे वाक्यों के निर्माण के ज़रिए अनोखे अर्थ पेश करने की क्षमता, कि जिसमें हर एक गहरे अर्थ लिए होता था और उस पर आम तौर पर चर्चा होती थी। एक और कौशल जो सत्य की राह में कठिनाइयों, इम्तेहानों, मुसीबतों पर धैर्य और दृढ़ता दिखाने से उन की महान आत्मा के बहुत प्रकाशमय हो हो जाने के नतीजे में, बहुत आगे की घटनाओं का अंदाज़ा लगा लेने की कला थी कि यह कथन "मोमिन अल्लाह के प्रकाश से देखता है।" उन पर चरितार्थ होता है। और बहुत से कौशल हैं कि जिन्हें इस संक्षिप्त बयान में पेश करना मुमकिन नहीं है।
इन सभी कौशलों और ख़ूबियों का स्रोत अल्लाह की ख़ास इनायत और हमारे सरपरस्त और उन के पाक पाकीज़ा वंशजों के, कि उन सब पर अल्लाह का दुरूद व सलाम हो, ख़ास लुत्फ़ के सिवा कुछ और नहीं था। इस महान हस्ती में जो ख़ूबियां थीं उनके बारे में संक्षेप यह कहा जा सकता है कि वे सत्य के परचम को फहराने की राह में उन के निरंतर और ईमानदारी भरे संघर्ष का नतीजा थीं। पहलवी हुकूमत के ग़द्दार तंत्र के ख़िलाफ़ संघर्ष में कठिनाइयों को सहने से हटकर, उन्होंने फ़र्ज़ को अंजाम देने के मार्ग में एक ख़ास मौक़े का उपयोग किया कि जिनके बारे में आम लोग नहीं जानते। क़िस्मत से जवान सैयद, जो इल्म और अमल में बहुत गंभीर थे, जब उन के पिता की आँखों की रौशनी चली गयी, बड़े बड़े उस्तादों से बरसों इल्म हासिल करने के बाद, इल्मी तरक़्क़ी और भविष्य निर्माण के सभी ज़ाहिरी अवसरों को क़ुम में छोड़कर, अल्लाह की कृपा पर भरोसा करते हुए, ख़ुद को अपने पिता की सेवा के लिए समर्पित कर देते हैं। इस बलिदान के नतीजे में अल्लाह की कृपा उन पर इस तरह ज़ाहिर हुयी कि अचानक सैयद अली ख़ामेनेई, 30 साल की उम्र से पहले ही, ख़ुरासान में सूरज की तरह चमके और जल्द ही उन्हें वैचारिक और क्रांतिकारी स्तंभों में गिना जाने लगा और साथ ही प्रचलित ज्ञानों में काफ़ी तरक़्क़ी की; इस तरह कि 70 के दशक में सावाक ने उन्हें ख़ुरासान का ख़ुमैनी कहा था। इस बिंदु पर भी ताकीद करुंगा कि इस महान हस्ती में भीतरी और ज़ाहिरी तरक़्क़ी की प्रक्रिया बाद में भी जारी रही। अब जबकि बुज़ुर्गों और ख़ास तौर पर ऐसी हस्ती के व्यवहार से सबक़ लेना चाहिए, बहुत उचित होगा कि हम एक दूसरे के साथ ईमानदारी के साथ भलाई और बलिदान की इस ख़ूबी को अपने भीतर पैदा करें कि यह ख़ूबी अल्लाह की विशाल कृपा का पात्र बनने के साथ ही उन लोगों के बीच बहुत बड़ा फ़र्क़ पैदा करती है जो सत्य के परचम के नीचे खड़े हैं और जो असत्य के परचम को घेरे हुए हैं। निश्चित तौर पर ऐसा व्यवहार आसमान के दरवाज़ों को खोलेगा और अल्लाह की नाना प्रकार की मदद के उतरने का सबब बनेगा; जिसमें अल्लाह की रहमत की बारिश होने के साथ साथ दुश्मन पर फ़तह और इल्म और टेक्नॉलोजी के मैदान में तरक़्क़ी शामिल है।
इन दिनों बारंबार यह बात सुनने में आयी कि अज़ीम अवाम के मुख़्तलिफ़ वर्ग, अपने दौर की इस अकेली हस्ती को सचमुच और हसरत के साथ याद कर रहे हैं और धीरे धीरे इस आला हस्ती के चमकते वजूद के ज़्यादा आयाम ज़ाहिर हो रहे हैं। इसी तरह इस हस्ती के विशेष कर्म का अनुसरण धीरे धीरे व्यापक हो रहा है; जिस में इस हस्ती की शहादत के वक़्त बंद मुट्ठी से हमारे अज़ीज़ अवाम का सबक़ सीखना शामिल है और आज यही बंद मुट्ठी, कुछ लोगों के लिए एक तरह से अक़ीदे का संयुक्त प्रतीक बन गया है। एक बार फिर यह बात साबित हो गयी कि शहीद, अपने ज़ाहिरी वूजद से ज़्यादा प्रभावी होता है और उनकी तौहीद, सत्य का साथ देने, ज़ुल्म और भ्रष्टाचार से संघर्ष करने की ओर दावत देने में उनकी स्पष्ट आवाज़, उनकी ज़िंदगी की तुलना में ज़्यादा गूंजने वाली और ज़्यादा प्रभावी हो गयी है और इस महान शहीद की दिली इच्छा जो इस क़ौम और बाक़ी मुसलमान क़ौमों का सौभाग्य थी, पहले से ज़्यादा हक़ीक़त के निकट पहुंच गयी है।
हमवतन भाइयो और बहनो आज और इस वक़्त तक तीसरे पाकीज़ा डिफ़ेंस की बहादुरी के मद्देनज़र, पूरे यक़ीन से कहा जा सकता है कि आप ईरान की बहादुर क़ौम, निश्चित तौर पर इस मैदान के विजेता रहे हैं। आज इस्लामी गणराज्य का बड़ी ताक़त के तौर पर उभरना और साम्राज्यवाद का पतन की ओर बढ़ना, सब के सामने ज़ाहिर हो चुका है। निश्चित तौर पर यह अल्लाह की नेमत है जो हमारे शहीद रहबर और लाल रंग के कफ़न में लिपटे हुए दूसरे शहीदों, मज़लूम हमवतनों के ख़ून और मीनाब के शजर-ए-तैयबा स्कूल के बिखरे हुए फूलों, अल्लाह के सामने क़ौम के एक एक शख़्स की दुआओं और उनकी चौकों, मोहल्लों और मस्जिदों में संघर्षशील मौजूदगी, आईआरजीसी, सेना, और विशेष पुलिस बल फ़राजा में इस्लाम के लिए जान हथेली पर रख कर निकलने वालों, (इंटैलीजेंस विभागों से जुड़े) गुमनाम सिपाहियों और सीमा सुरक्षा बल के जवानों के शुद्ध संघर्ष की बर्कत से ईरानी क़ौम पर बरस रही है। इस नेमत का भी दूसरी नेमतों की तरह शुक्र अदा किया जाना चाहिए ताकि यह बाक़ी और फैलती रहे जैसा कि कथन है कि अगर तुम शुक्र करोगे तो हम नेमत में इज़ाफ़ा करते जाएंगे। इस नेमत का व्यावहारिक रूप से शुक्र, ताक़तवर ईरान के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए निरंतर कोशिश करना है।
जो चीज़ इस वक़्त शहीद रहबर के रणनैतिक लक्ष्य को हासिल करने और इस नारे को व्यवहारिक बनाने के लिए ज़रूरी है, वह हमारे अज़ीज़ अवाम का पिछले 40 दिनों की तरह अपनी मौजूदगी को जारी रखना है। यह मौजूदगी, उस दर्जे का अहम तत्व है जहाँ इस वक़्त ताक़तवर ईरान मौजूद है।
इसलिए दुश्मन से वार्ता के एलान को आधार बनाकर यह सोचा न जाए कि सड़कों पर मौजूदगी ज़रूरी नहीं है। बल्कि अगर यह फ़र्ज़ कर लें कि सैन्य लड़ाई के मोर्चे पर ख़ामोश रहने की ज़रूरत आ गयी है, तब भी एक एक शख़्स की चौकों, मुहल्लों और मस्जिदों में मौजूदगी मुमकिन होने के मद्देनज़र, पहले से ज़्यादा ज़रूरी लग रही है। निश्चित तौर पर चौराहों पर आपके नारे, वार्ता के नतीजे पर प्रभावी होंगे; जैसा कि ईरान के लिए जान फ़िदा अभियान में हैरतअंगेज़ तादाद में शामिल होना और उस का बढ़कर दसियों लाख तक पहुंच जाना भी, इस क्षेत्र में प्रभावी तत्व है। महान अल्लाह की इजाज़त से इस रोल और इस के जारी रहने से, ईरानी क़ौम के सामने जो क्षितिज है, वह इज़्ज़त, सरबुलंदी और समृद्धता से भरे और जगमगाते हुए दौर के उदय की ख़ुशख़बरी दे रहा है। हमारे शहीद नेता जिस वक़्त इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता बने, उस वक़्त इस्लामी गणराज्य सिस्टम उस पौधे की तरह था जिस पर इस्लाम और ईरान के दुश्मनों ने अनेक घाव लगाए थे कि जिसे उस ने भलिभांति बर्दाश्त किया था। लेकिन जब उन्होंने क़ौम के नेतृत्व को क़रीब 37 साल बाद छोड़ा, तो अपने पीछे ऐसा पाकीज़ा दरख़्त छोड़ा जिसकी जड़ मज़बूत, उस के पत्ते और डालें क्षेत्र सहित दुनिया के अहम भागों पर अपना साया फैलाए हुए हैं। "ज़्यादा से ज़्यादा ताक़तवर ईरान" के लक्ष्य को हासिल करना, समाज के मुख़्तलिफ़ वर्गों के बीच एकता के मार्ग से हासिल होगा कि जिस पर वे बारंबार ताकीद करते थे। एक एकता का बड़ा भाग, इस चालीस दिन में व्यवहारिक हुआः लोगों के दिल एक दूसरे के निकट हुए, मुख़्तलिफ़ रुझान वाले मुख़्तलिफ़ वर्गों के बीच मौजूद बर्फ़ पिघलना शुरू हो गयी, सभी वतन के परचम के साए में इकट्ठा हुए और दिन ब दिन इस तादाद और इस की गुणवत्ता में इज़ाफ़ा हो रहा है। बहुत से वे लोग जो अभी तक इस तरह हाज़िर नहीं हो पाए हैं, दिल से चौराहों पर मौजूद अवाम के साथ हैं।
इन दिनों बहुत से लोग ऊंचे क्षितिज पर नज़र लगाए, सभ्यात्मक दृष्टि का अनुभव कर रहे हैं और अपने लिए वर्तमान और भविष्य की वास्तविकताओं के आधार पर ख़ाका बना रहे हैं। यह वह ख़ुसूसियत है जो अब से कुछ समय पहले तक बहुत कम लोगों में, जिसमें शहीद रहबर सबसे आगे हैं, नज़र आती थी। इस लिए हर समीक्षक इस क़ौम के करिश्माई अंदाज़ में विकास को समझ रहा है और यूहीं नहीं था इन दिनों अपने दौर का मशहूर बुद्धिमान और आला फ़क़ीह जब आप से इस शान से बात करता था तो बारंबार उन का गला रुंध जाता था।
इस मौक़े पर अपने दक्षिणी पड़ोसियों से कहना चाहता हूं कि आप इस वक़्त एक चमत्कार होते देख रहे हैं। तो सही तरह से देखिए और सही तरह से समझिए और सही जगह पर खड़े होइए और शैतानों के किए गए वादों को शक की नज़र से देखिए। हम आप के उचित रिएक्शन का इंतेज़ार कर रहे हैं ताकि आपके संबंध में अपनी शुभचिंता और भाईचारे को आप पर साबित कर सकें। यह तभी होगा जब आप साम्राज्यवादियों से नाता तोड़ लें जो आप के अपमान और आपको लूटने का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते। सब लोग यह बात जान लें कि अल्लाह की इजाज़त से हम विनाश फैलाने वाले हमलावरों को जिन्होंने हमारे मुल्क पर हमला किया है, नहीं छोड़ेंगे। एक एक पहुंचने वाले नुक़सान, शहीदों के ख़ून और इस जंग में घायल होने वालों का हर्जाना लेकर रहेंगे और हुर्मुज़ जलडमरूमध्य के संचालन को निश्चित तौर पर नए चरण में लेकर जाएंगे। हम जंग नहीं चाहते थे और न चाहते हैं लेकिन अपने अधिकार से पीछे नहीं हटेंगे और इस दिशा में रेज़िस्टेंस के संपूर्ण मोर्चे को अखंड मानते हैं।
इस वक़्त से लेकर उस चीज़ को हासिल करने तक जिसका हम से संबंध है, सब से पहले क़ौम के एक एक शख़्स से कहना चाहता हूं कि एक दूसरे की मदद करें ताकि हर जंग के स्वाभाविक असर से होने वाली कमियों का असर, मुख़्तलिफ़ वर्गों पर कम हो। अलबत्ता कुछ चीज़ों में कमी आपके मुक़ाबले वाला मोर्चा ज़्यादा महसूस कर रहा है, सरकार और दूसरी संस्थाओं में आप भाइयो और बहनो की कोशिश से इस पर बड़ी हद तक क़ाबू पा लिया गया है।
दूसरी बात यह है कि हम, दुश्मन द्वारा समर्थित या उसकी हाँ में हाँ मिलाने वाले मीडिया की सुनने वाली बातों की ओर से जो दिल दिमाग़ की खिड़की है, सावधान रहें। ज़ाहिर सी बात है कि वे ईरानी क़ौम या मुल्क से शुभचिंतक नहीं हैं और यह चीज़ बारंबार साबित हो चुकी है। इसलिए मूल रूप से हम उन्हें न सुनें या फिर कम से कम उस की ओर से कही जाने वाली बातों को बहुत संदेह से देखें।
तीसरी बात यह कि अज़ीज़ क़ौम अगरचे महान रहबर की शहादत की अज़ादारी की मुद्दत के ख़त्म होने के साथ, अज़ादारी के कपड़े को उतार देगी, लेकिन उन के और दूसरी तथा तीसरी थोपी गयी जंग के शहीदों के ख़ून का बदला लेने के मज़बूत इरादे को दिल में बाक़ी रखेगी और इसे हासिल करने के लिए निरंतर कोशिश करेगी।
अंत में अपने सरपरस्त हज़रत इमाम महदी अल्लाह उन्हें जल्द से जल्द ज़ाहिर करे, की सेवा में अर्ज़ है कि हम अल्लाह पर ईमान, मासूम इमामों का वसीला क़रार देकर कि अल्लाह का दुरूद व सलाम हो उन पर और अपने रहबर का अनुसरण करते हुए, आपके परचम के नीचे, कुफ़्र और साम्राज्यवाद के मोर्चे के मुक़ाबले में डटे हुए हैं और इस राह में मुख़्तलिफ़ वर्ग के बहुत क़ीमती शहीदों का, मुल्क की स्वाधीनता और इज़्ज़त और इस्लाम और इस्लामी इंक़ेलाब का नाम रौशन करने की राह में नज़राना पेश किया है और बहुत क्षति उठायी है। इस वक़्त पूरे वजूद से, वार्ता से लेकर जंग के मैदान के मोर्चे तक दुश्मन पर फ़तह हासिल करने के लिए आपकी ख़ास दुआओं से उम्मीद बांधी है और हमें उम्मीद है कि जल्द से जल्द हम और हमारे दुश्मन, उस के करिश्माई असर को देखेंगे इंशा अल्लाह।
आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत व बर्कत हो
सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई
9 अप्रैल 2026
10/04/2026

