एप्सटीन के मुख़्तलिफ़ घिनौने रूपः महिलाओं के ख़िलाफ़ अमरीका की जंग से इमाम ख़ामेनेई की हत्या तक
एप्सटीन के मुख़्तलिफ़ घिनौने रूपः महिलाओं के ख़िलाफ़ अमरीका की जंग से इमाम ख़ामेनेई की हत्या तक, शीर्षक के तहत एक लेख पेश हैः
1 अगस्त 2019 की सुबह, क़रीब साढ़े 6 बजा है, अमरीका की मैनहटन फ़ेडरल हिरासत में दो लोग अपनी शिफ़्ट में, सुबह का नाश्ता बांटने के लिए कोरिडोर में चलते हैं। उन में से एक, एक सेल को खोलता है, उस सेल में मौजूद शख़्स कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाता। कुछ सेकेन्ड बाद वहीं पर आधिकारिक रिपोर्ट में दर्ज किया जाता है कि जेफ़्री एप्सटीन ने ख़ुदकुशी कर ली है।
इस घटना के बाद जो कुछ हुआ, वो भ्रष्टाचार के इस मामले, हाशिए से जुड़ी बातों और इधर उधर की बातों, इस स्कैंडल में लिप्त लोगों के बारे में ख़बरों की भरमार थी। लेकिन एक गहरा सवाल जो बिना जवाब के रह गयाः अगर एप्सटीन रास्ते से हट गया है तो उस 'बाज़ार' का क्या होगा जिस में वह लिप्त था?
एक आपराधिक मामले से एक मेकनिज़्म तक
एप्सटीन पर 2019 के गर्मी के मौसम में फ़ेडरल एजेंसी की ओर से सेक्स ट्रैफ़िकिंग और सेक्स ट्रैफ़िकिंग के लिए साज़िश के इल्ज़ाम लगे। न्यूयॉर्क के दक्षिणी भाग के अटार्नी ने आधिकारिक नोटिस में, केस का मुख्य बिन्दु, कई साल तक कम उम्र लड़कियों का शोषण बताया।
लेकिन एप्सटीन स्कैंडल का संबंध 2019 से नहीं है। इस स्कैंडल के मुख्य तार फ़्लोरिडा में 2008 में हुयी सहमति से जुड़ा हैः ऐसी सहमति जिस ने उसे फ़ैडरल कार्यवाही के चंगुल से बच निकलने और राज्य स्तरीय इल्ज़ामों और हल्के स्तर की सज़ाओं को मानने से उसकी फ़ाइल को बंद करने में मदद की। ऐसी सहमति जो क़ानूनी और मीडिया हल्क़ों की ओर से गंभीर आलोचना का विषय बनी। एक फ़ेडरल जज ने भी 2019 में एक आदेश दिया का न्यायविदों ने पीड़ितों से संबंधित सहमति को गुप्त रखकर, उनके अधिकारों का हनन किया है, जो इस बात का चिन्ह था कि यह स्कैंडल सिर्फ़ एप्सटीन से संबंधित नहीं था बल्कि पूरा एक सिस्टम इस में लिप्त था।
क्यों एक शख़्स का ख़त्म होना, नेटवर्क का ख़त्म होना नहीं है?
अर्थशास्त्री, ग़ैर क़ानूनी बाज़ार को आम तौर पर बहुत सादा अर्थों से समझाना शुरू करते हैं: डिमांड, स्पलाई, रिस्क और अल्टरनेटिव्ज़। लेकिन सुनियोजित अपराध, सादा कारोबार से ज़्यादा एक एडेप्टेबल सिस्टम है।
सुरक्षा हल्क़ों के साहित्य और नेटवर्क स्टडीज़ में सरग़ना को ख़त्म करने या अडेप्टिव रणनीति यानी सरग़ना को ख़त्म करना, एसा विषय है जिस पर बरसों से बहस हो रही है। इस रवैये के अनुचित परिणाम के बारे में शोध दर्शाते हैं कि किसी सरग़ना को हटाना टुकड़ों में नई प्रतिस्पर्धा के जन्म लेने या मैदान के ज़्यादा जटिल होने का कारण बन सकता है। इस विचार के प्रभाव को एप्सटीन मामले में देखा जा सकता हैः अगर एप्सटीन, भ्रष्टाचार के एक नेटवर्क का मुख्य सूत्रधार था तो उसके ख़त्म होने का मतलब यह नहीं है कि एलीट या पैसे वाले वर्ग की डिमांड और मोटिवेशन ख़त्म हो गया है, मुमकिन है नेटवर्क ज़्यादा बिखरे हुए रूप में और ज़्यादा गोपनीय रूप में आगे बढ़े।
हम विशेष डिमांड के बारे में बात कर रहे हैं, पहुंच, कंट्रोल, सुरक्षा और उस अनुभव तक पहुंच की बात कर रहे हैं जो सार्वजनिक स्तर पर वर्जित या रुस्वा करने वाले हैं। धनवान और प्रभावशाली लोग अपनी आर्थिक क्षमता से घटना को दबा देते हैं और अपनी संगठनात्मक ताक़त से रिस्क को मैनेज करते हैं।
इंसानों की तस्करी, एक सुनियोजित बाज़ार है न कि व्यक्तिगत भ्रष्टाचार
यह समझने के लिए कि "अगला मानव तस्कर कौन है" एप्सटीन केस से दूरी बनाते हुए बड़ी तस्वीर पर निगाह करनी होगी। मानव तस्करी 2024 की रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र संघ के मादक पदार्थ और अपराध की रोकथाम के विभाग यूएनओडीसी की रिपोर्ट के कुछ कीवर्ड्स हैं, जो सीधे इस मामले से जुड़े हुए हैं: कोरोना पैन्डेमिक के प्रभाव कम होने के बाद मानव तस्करी की भेंट चढ़ने वालों की तादाद फिर से बढ़ गयी यहाँ तक कि कोरोना से पहले की सतह से भी आगे बढ़ गयी, इन भेंट चढ़ने वालों में बड़ा हिस्सा औरतों और लड़कियों का है और इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि इंसानों की ज़्यादातर तस्करी ढांचागत गिरोहों या लूज़ लेकिन सुनियोजित नेटवर्क्स द्वारा अंजाम पाती है, ज़रूरी नहीं कि कोई एक शख़्स हो।
जब कोई जुर्म नेटवर्क आधारित हो तो व्यक्ति पर आधारित हल से मुश्किल दूर नहीं होगी। एप्सटीन मामला अगर इतने बड़े पैमाने पर रुस्वाई के बाद, एक चेहरे के हटने तक सीमित रह गया तो इसका मतलब होगा कि अस्ल मुश्किल की ओर से लापरवाही हुयी है।
अब सवाल यह हैः डिमांड कहाँ से आ रही है?
पश्चिमी मीडिया के नरेटिव में कभी एप्सटीन को एक अपवाद के तौर पर पेश किया जाता हैः एक ऐसा शख़्स जो पश्चिम के विगत और वर्तमान के अधिकारियों और मशहूर चेहरों के व्यापक हल्क़े से भटका हुआ है। लेकिन एक ज़्यादा सिस्टमैटिक दृष्टिकोण यह सवाल पूछ रहा हैः किस चीज़ ने इस व्यापक भ्रष्टाचार को इतने बरसों तक जारी रहने दिया?
एक जवाब, बाज़ार केन्द्रित संस्कृति में छिपा हैः जब किसी इच्छा के लिए किसी सीमा को न मानें तो वह इच्छा इंसान को पतन की ओर ले जाती है। यहाँ तक कि पश्चिम की पारंपरिक सोच में, इस विषय की ओर से चेतावनियां व्यक्त की गयी हैं। स्कॉटलैंग के मशहूर अर्थशास्त्री, दार्शनिक और लेखक ने वेल्थ ऑफ़ नेशन्ज़ किताब लिखा हैः जिस क़ानून को बनाने का सुझाव व्यापारियों द्वारा पेश हो, उसकी समीक्षा में दुर्भावना को मद्देनज़र रखना चाहिए, क्योंकि उनके हित हमेशा अवाम के हित से समन्वित नही होते।
जब लालच, किसी समाज को आगे ले जाने वाला इंजन बन जाए, तो उस के नतीजे में असीमित इच्छा, अधिक अनुभव की चाहत, अधिक ताक़त, अधिक कंट्रोल जन्म लेता है। एप्सटीन मामला, मानवाधिकार की रक्षा की दावेदार व्यवस्था के सामने यह सवाल रखती हैः अगर मानव सम्मान मूल है, तो फिर कम्ज़ोर इंसान कैसे उपभोग की वस्तु बना जा रहा है और शोषण करने वाने नेटवर्क किस तरह इस हद तक बाक़ी हैं?
न्याय में भेदभाव और नैतिक साख का संकट
पश्चिम अंतर्राष्ट्रीय मंच पर, मानवाधिकार के नाम से राजनीति करता है, पाबंदिया लगाता और दबाव डालता है। लेकिन अपने यहाँ आंतरिक स्तर पर जब एलिट वर्ग या प्रभावी नेटवर्क मानवाधिकार का उल्लंघन करता है तो, जवाब देने से कतराता है।
सन 2008 की एप्सटीन फ़ाइल और वह गुप्त स्कैंडल जो बड़ी तादाद में बेगुनाह बच्चों की बलि चढ़ने का कारण बना, इस दोहरे रवैये का साफ़ नमूना हैः न्याय के दावे और पश्चिम के अस्ली व्यवहार के बीच खाई गहरी है यहाँ तक कि 2019 में गिरफ़्तारी के बाद और जेल में संदिग्ध हालत में उसकी मौत ने जैसा कि सुपरवाइज़र की रिपोर्ट में कैमरों की ख़राबी की बात संदिग्ध है, न्याय के लागू करने में इस दोहरे व्यवहार में एक और परत का इज़ाफ़ा कर दिया। जिस संगठन को क़ानून की प्रभुसत्ता का प्रतीक होना चाहिए, वह, बड़ी आसानी से क़ानून के मूल मानकों को पैरों तले रौंद रहा है।
इस वक़्त पश्चिम इस कोशिश में है कि सारी ग़लती को एक शव के सिर पर मढ़ दे।
अगला एप्सटीन कौन होगा?
अगर यह होना है कि एप्सटीन के बाद कोई और एप्सटीन हो, तो संभवतः वह उस जगह सिर नहीं निकालेगा जहाँ उसे कल देखा गया था; यूएन के मादक पदार्थ और अपराध की रोकथाम करने वाले विभाग की 2024 की रिपोर्ट के मुताबिक़, मानव तस्करी, विश्व स्तर पर बदलते हालात में, अपना रूप बदल कर नए हालात में ख़ुद को ढाल लेती है। और यही चीज़ यानी अगला नेटवर्क ज़रूरी नहीं कि एप्सटीन से मिलता जुलता हो, यहाँ तक कि उस की सोच वही होः पहला यह कि इस करतूत के लिए सेवा देने वालों की नियुक्ति और उसे गुप्त रखा जाना पहले से ज़्यादा डिजिटल हो जाएगा; एडवर्टाइज़मेंट और ख़तरे से ख़ाली पेशकश से लेकर ऑनलाइन पैकेज के गिरोह और नए वित्तीय साधन, दूसरा यह कि नेटवर्क किसी एक प्रतीकात्मक केन्द्र, एक द्वीप, एक घर, एक नाम पर टिके होने के बजाए, अपने फंदों को फैला देते हैं, ताकि सरग़ना के ख़त्म होने से पूरा ढांचा न बिखरे; तीसरे यह कि सभी चीज़ ज़ाहिरी तौर पर ज़्यादा क़ानूनी रूप ले लेती है जैसे चैरिटी, मॉडलिंग, रोज़गार और विलासी सेवाएं।
अगर इस की जड़ को सिर्फ़ जुर्म की नज़र से देखेंगे तो इस का इलाज पुलिस और गिरफ़्तारी में ढूंढेंगे; लेकिन अगर यह बात समझ में आ जाए कि डिमांड कहाँ से उठ रही है, इंसान की बाज़ार केन्द्रित परिभाषा से जहाँ काफ़ी कभी काफ़ी नहीं होता, उस वक़्त इस बाज़ार को बंद करने के लिए उठने वाला क़दम, मानव सम्मान पर आधारित ज़िंदगी और नैतिक मूल्यों की और लौटने के बजाए, जुर्म के मंच के बदलने जैसा क़दम उठता है, न कि उसे ख़त्म करने के लिए।
पश्चिम में, एप्सटीन के अपराधों की कड़ी को इस तरह बयान किया जाता है मानो एक पूरे सिस्टम में एक शख़्स से ग़लती हुयी है; ऐसा सिस्टम जिसका काम व्यक्तिगत गुमराही को न्याय तंत्र द्वारा कंट्रोल करना और भ्रष्टाचार को फैलने से रोकना है। लेकिन तारीख़ बताती है कि यह तंत्र चूंकि मुश्किल की अस्ल वजह पर ध्यान नहीं देता, इस लिए भ्रष्टाचार को कंट्रोल करने में अक्षम है और ये भ्रष्टाचार दूसरी जगहों से सिर उठाता है।
इस्लाम में मसले को दूसरे आयाम से देखा जाता है; ऐसा आयाम जो आग़ाज़ में ही ऐसी गुमराही के सिर उठाने की पृष्ठिभूमि को ख़त्म कर देता है। इस नज़रिए की बुनियाद, मानवीय सम्मान की पात्र के रूप में महिला के अधिकार को आधिकारिक रूप से मान्यता देना है; ऐसा उसूल कि अगर बुनियाद बन जाए तो हमले और शोषण को व्यक्तिग ग़लती के बजाए, स्पष्ट लाल रेखा को पार करना समझा जाता है। शहीद इमाम ख़ामेनेई ने भी इसी परिप्रेक्ष्य में, पश्चिम में इस प्रक्रिया के बारे में बरसों सचेत किया थाः "आज जिस चीज़ का पश्चिम का राजनैतिक तंत्र प्रचार कर रहा है, वही जाहेलियत है जिसे मानव ज़िंदगी से ख़त्म करने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम आए। उस जाहेलियत की निशानी आज दुनिया में, पश्चिम की इस प्रचलित भ्रष्ट सभ्यता में दिखाई देती है; वही अन्याय, वही मानवीय सम्मान की अनदेखी, वही यौन संबंधी मामलों और यौनेच्छा को बढ़ावा देना।"
इस्लाम की मानवीय सम्मान पर आधारित नज़र में, इंसान को सम्मान हासिल है; इच्छा और फ़ायदे, कितना भी जायज़ हो, उसकी एक हद हैः उस हद का नाम मानवीय सम्मान है। इसके विपरीत, पश्चिम की मार्केट केन्द्रित बेलगाम संस्कृति में, इच्छा ऐसे बिंदु पर पहुंच सकती है जहाँ वह सिर्फ़ साधन बन जाए, आनंद, ताक़त या दिखावे का साधन बन जाए।
एप्सटीन स्कैंडल को इस नज़र से देखा जा सकता है; एक ऐसी इच्छा का नतीजा, जब लालच समाज को आगे ले जाने का इंजन बन जाए, उस वक़्त पर्याप्त का कोई अर्थ नहीं रह जाता, यह वही चीज़ है जिसकी ओर से इमाम ख़ामेनेई ने बरसों सचेत किया।
लेकिन ये चेतावनियां उन लोगों को अच्छी नहीं लगीं जिन्हें इस व्यापक भ्रष्टाचार से फ़ायदा पहुंच रहा था; क्योंकि अगर ऐसा संदेश पश्चिम के जनमत तक पहुंच जाए और वह जागरुक हो जाए, उस वक़्त फैले हुए सिस्टम की वैधता पर सवाल उठ जाएगा। यही कारण है कि ईरान के ख़िलाफ़ 28 फ़रवरी को अमरीकी-ज़ायोनी हमले और उसकी ओर से टार्गेट किलिंग, उस आवाज़ को दबाने के लिए थी जो नारी सम्मान और अधिकार की रक्षा करते हुए, एक दिन उसे पश्चिम की वासना के चंगुल से रिहाई दिला देता; इस के साथ ही इतिहास ने बारंबार यह दिखाया है कि टार्गेट किलिंग से संदेश रुकता नहीं है बल्कि उसे एक ट्रिब्यून से हज़ार ट्रिब्यून तक पहुंचा देता है और जिस आवाज़ को दबाया जाता है वह ज़्यादा ऊंचे स्तर पर दुनिया में फैलती है।
27/03/2026

