शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह के बेटे सैयद जवाद नसरुल्लाह के साथ बातचीत

इमाम ख़ामेनेई की शहादत से पूरी दुनिया में जागरुकता की लहर उठी

इमाम ख़ामेनेई की शहादत से पूरी दुनिया में जागरुकता की लहर उठी

शहीद सैयद हसन नसरुल्लाह के बेटे सैयद जवाद नसरुल्लाह ने Khamenei.ir के साथ बातचीत में इस्लामी इंक़ेलाब के शहीद रहबर इमाम ख़ामेनेई की शख़्सियत के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर रौशनी डाली और कहा कि इमाम ख़ामेनेई की शहादत से पूरी दुनिया में जागरुकता की लहर पैदा हुयी। तफ़सीली बातचीत पेश है।

 

जनाब नसरुल्लाह! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने हमें अपना समय दिया। आप परिवार में किस नंबर की संतान हैं?

बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम। मैं परिवार में दूसरी संतान हूँ, शहीद सैयद हादी के बाद; मेरे बाद मेरी बहन ज़ैनब हैं, फिर मोहम्मद अली और फिर सैयद मोहम्मद महदी।

 

आपका जन्म किस वर्ष हुआ?

24 मई 1981; यानी लगभग 45 साल पहले।

 

आपके मन में अपने पिता की पहली छवि क्या है?

मुझे याद है कि स्कूल जाने से पहले, मैं उनके शयनकक्ष में झाँकता था और देखता था कि वे सो रहे हैं और उन्होंने अपना हाथ अपने चेहरे के नीचे रखा हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि कुछ साल पहले, यानी सैयद की शहादत से पहले, मैंने अपनी माँ से पूछा कि क्या मेरी याददाश्त कमज़ोर है या क्या वाकई बचपन और किशोरावस्था में, मैं अपने पिता के साथ कई दिन नहीं बिता पाया; मेरी माँ ने कहा कि वाकई ज़्यादातर समय वे घर पर नहीं होते थे। इसीलिए, मैं सुबह स्कूल जाने से पहले उनके कमरे में झाँकता था। वे हमेशा गाँवों, शिविरों और कार्य एवं प्रचार केंद्रों में होते थे; अगर घर भी आते, तो देर रात को। हम सुबह स्कूल जाते थे और वे अभी भी सो रहे होते थे, फिर जल्दी उठते और अपने दैनिक कार्यक्रम को जारी रखने के लिए बाहर निकल जाते।

बेशक, बचपन में कभी-कभी वे इस अनुपस्थिति की भरपाई करते थे; उदाहरण के लिए, जब उन्हें कार्यालय के बाहर कोई काम होता, तो वे हमें भी अपने साथ ले जाते। मैं भी उनसे कहता कि अगर तुम्हारा काम इस तरह का है, तो ऐसे और काम रखो! कभी-कभी हम बालबेक की ऊँचाइयों पर भी जाते थे; वह जगह जहाँ वे और भाई खुली हवा में बैठकर बैठकें करते थे, यह प्रसिद्ध था।

 

आपके माता-पिता के बीच घर में कैसा रिश्ता था? पारिवारिक जीवन में आपकी माता की क्या भूमिका थी?

मैं कह सकता हूँ कि मेरे पिता, सैयद, और मेरी माता, उम्म हादी, के बीच का रिश्ता सम्मान, स्नेह और शिष्टता का एक आदर्श उदाहरण था। अगर मुझे एक वाक्य में संक्षेप करना हो, तो उनका वैवाहिक जीवन एक इस्लामी, अलवी और फातिमी आदर्श था। हमने कभी उनकी ऊँची आवाज़ नहीं सुनी और कभी नहीं देखा कि उनके बीच कोई मतभेद, झगड़ा या अल्लाह न करे कोई ऐसी बात या इशारा हो जिससे नाराज़गी की बू आती हो; बिल्कुल इसके विपरीत था। अपनी पूरी ज़िंदगी में हमने नहीं सुना कि मेरे पिता ने मेरी माता को 'हाजिया' या 'हाजिया उम्म हादी' के अलावा किसी और लफ़्ज़ से पुकारा हो; उन्होंने एक बार भी उन्हें उनके छोटे नाम से नहीं पुकारा और हमेशा उन्हें उनकी कुनिया (उपाधि) से संबोधित किया।

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प्रश्न: आपको कब और किस उम्र में एहसास हुआ कि आपके पिता का जीवन आम लोगों जैसा नहीं है और वे एक जिहादी व्यक्तित्व हैं? स्वाभाविक है कि ऐसा पद आपके निजी और पारिवारिक जीवन पर भी असर डालता था और आप भी एक बेटे के नाते अपने पिता की इस स्थिति से प्रभावित होते थे। दूसरे लोग अपने माता-पिता के साथ एक सामान्य जीवन जी सकते हैं, लेकिन आप शुरू से ही एक जिहादी जीवन के माहौल में बड़े हुए। आपको यह कब समझ आया और इसका आप पर क्या असर पड़ा?

 

उत्तर: यह बात बचपन से ही धीरे-धीरे हम पर स्पष्ट होती गई; मुझे लगता है कि लगभग सात साल की उम्र से, यहाँ तक कि उस अवधि से पहले भी जब हम बालबेक में थे। हम सन् १९८६ में रहने के लिए बेरूत आए, पहले औज़ाई इलाके में और फिर बिर अल-अब्द में; उससे पहले, हम अभी बहुत छोटे थे और किशोरावस्था तक भी नहीं पहुँचे थे। फिर भी, सुरक्षा चेतावनियों और सावधानियों से हम समझ जाते थे कि कोई ख़तरा है। हमें कहा जाता था कि किसी के लिए दरवाज़ा न खोलें और अगर कोई दरवाज़ा खटखटाए, तो दरवाज़े के पीछे से पूछें कि कौन है। कभी-कभी जिन्हें दुश्मन माना जाता था, वे आते थे और सैयद के बारे में पूछते थे कि क्या वे घर पर हैं या नहीं। हम अंगरक्षकों के साथ स्कूल जाते थे और अंगरक्षकों के साथ वापस आते थे। हम पूछते थे कि बाक़ी बच्चों की तरह स्कूल बस से क्यों नहीं जाते; तो कहा जाता था कि तुम्हें हमारी निगाहों के सामने रहना चाहिए, क्योंकि गंभीर ख़तरा है।

 

८० और ९० के दशक में, लेबनान ने बहुत सी घटनाएँ देखीं और ख़तरा सिर्फ़ इस्राईल की ओर से नहीं था, बल्कि विभिन्न समूह इस्लामी ताकतों को नुकसान पहुँचाना चाहते थे। उस समय, जैसा कि मैंने कुछ भाइयों से सुना है - जिनमें से कई बाद में शहीद हो गए - इस प्रवाह को "खोमैनीवाले" कहा जाता था; यानी वही धार्मिक प्रवाह जिसका नेतृत्व शहीद सैयद अब्बास मूसवी (रहमतुल्लाह अलैह) लेबनान में कर रहे थे। इसलिए, बचपन से ही हम जानते थे कि हमारा जीवन सामान्य नहीं है। सैयद अधिकतर घर पर नहीं होते थे और मेरी माँ हमें समझाती थीं कि वे प्रचार (तबलीग़) के लिए गए हैं, काम पर हैं, मुख़यालयों में हैं और ऐसी ही बातें। जब वे घर आते थे, तो उन लोगों से जो उनसे मिलने आते थे, हम समझ जाते थे कि उनकी कितनी बड़ी जिम्मेदारी है; उनमें से कुछ आज परिषद के सदस्य हैं, कुछ शहीद हो गए, कुछ अभी भी राजनैतिक और जिहादी क्षेत्र में सक्रिय हैं, और कुछ का निधन हो चुका है।

 

अल्लाह की क़सम, मुझे याद नहीं कि हमने कभी शिकायत की हो और कहा हो कि हम बाहर क्यों नहीं जा सकते या परिवार हमेशा साथ क्यों नहीं होता। बेशक, जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती गई, ज़िम्मेदारियों के बढ़ने और भारी होने के कारण सैयद की घर पर उपस्थिति भी कम होती गई, लेकिन साथ ही हमारी समझ और जागरूकता भी बढ़ती गई और हम स्थितियों को बेहतर ढंग से समझने लगे। हमारा नज़रिया यह नहीं था कि हम उनके साथ बाहर क्यों नहीं जाते; हम बस अल्लाह से उनकी सेहत, सलामती और सफलता की दुआ करते थे और उनकी लंबी उम्र माँगते थे; यही हमारे लिए जन्नत थी। सुबहानल्लाह! अल्लाह तआला ख़ुद इंसान को बदलाव देता है और उसके दिमाग़ को दूसरी चीज़ों में लगा देता है। यही चीज़ एक मदद थी ताकि सैयद पूरी एकाग्रता के साथ अपने रास्ते पर चलते रहें और परिवार की ओर से किसी भी चीज़ ने उनके काम में रुकावट न डाली या उनके दिमाग और ख़याल को व्यस्त न किया।

 

प्रश्न: आपके पिता के काम की प्रकृति को देखते हुए, यह स्वाभाविक था कि वे घर पर कम समय बिताते थे। जब वे आपके साथ होते थे, तो वे भावनात्मक और शैक्षिक रूप से इस कमी की भरपाई कैसे करते थे?

 

उत्तर: पहली बात तो यह कि हम बाक़ी बच्चों की तरह अपनी ज़िंदगी जीते थे; स्कूल जाते थे, रिश्तेदारों से मिलते-जुलते थे और अपने शौक और कामों में व्यस्त रहते थे। स्वाभाविक रूप से, कुछ समय ऐसा भी होता था जब सैयद घर पर मौजूद होते थे। मुझे याद है कि सन् २००० की मुक्ति (वापसी) के बाद से लेकर २००६ के युद्ध से पहले तक का समय हमारे पारिवारिक जीवन का स्वर्णिम काल था; हम जानते थे कि वे घर पर हैं, हम साथ बैठकर खाना खाते थे और कुछ समय साथ बिताते थे। यहाँ तक कि जब मुलाक़ातों के बीच अंतर आ जाता था - ख़ासकर २००६ के बाद, जब सैयद से दूरी और उनकी याद का दौर शुरू हुआ - तो उनके साथ बिताया गया वह थोड़ा सा समय भी आपकी याद को और बढ़ा देता था; क्योंकि आप जानते थे कि अब जाना है और पता नहीं अगली मुलाक़ात कब होगी। हम पहले से ही उन प्रश्नों और विषयों को तैयार कर लेते थे जिन पर हम उनकी राय जानना चाहते थे। बेशक, जहाँ तक संभव होता, हम राजनैतिक बहसों में नहीं पड़ते थे, क्योंकि हम नहीं चाहते थे कि घर का समय भी उन्हीं राजनैतिक और काम के मुद्दों में लगे जिनमें उनका लगभग सारा समय बीतता था। मेरे ख़याल से २००६ के बाद भी वे छोटी-छोटी मुलाक़ातें काफ़ी थीं; क्योंकि वे जानते थे कि उस सीमित समय में भी किसी के दिल, रूह और दिमाग को कैसे तृप्त किया जाए।

 

प्रश्न: एक पिता के रूप में उनकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता क्या थी, न कि एक नेता के रूप में?

 

उत्तर: सैयद बहुत दयालु थे और वास्तव में हर चीज़ में उनका एक विशेष व्यक्तित्व था। वे जानते थे कि बड़े, छोटे और हर उम्र के व्यक्ति के साथ कैसे व्यवहार करना है, बिना किसी को ठेस पहुँचाए। वे कहते थे कि मैं आप सब से प्यार करता हूँ, लेकिन आप में से हर एक के साथ उसकी उम्र और विशेषताओं के अनुसार व्यवहार करता हूँ। वे हम में से प्रत्येक की मानसिकता, विचारधारा और स्वभाव को जानते थे। मकरूह या हराम (निषिद्ध) मामलों में वे कोई समझौता नहीं करते थे, लेकिन मज़ाक भी करते थे और उसकी सीमा का पालन करते थे। वे प्यारे, शिक्षक और पूरी तरह से प्रेममय थे। हम बच्चे आपस में प्रतिस्पर्धा करते थे कि उन्हें हर वह चीज़ पहुँचाएँ जिसकी उन्हें शायद ज़रूरत हो; फिर भी, वे हमें सिखाते थे कि अपने निजी काम ख़ुद करें। इसलिए, वास्तव में मैं उनकी किसी एक विशेषता को अलग करके बाक़ी को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता; उनका पूरा अस्तित्व सुंदर था।

 

प्रश्न: आपकी परवरिश में वे किन पहलुओं पर अधिक ज़ोर देते थे?

 

उत्तर: मेरे पिता हमारी उम्र के अनुसार क़दम-दर-क़दम आगे बढ़ते थे। बेशक, घर में शिक्षा की मुख्य बुनियाद हमारा अपनी माँ के साथ दैनिक जीवन था और सैयद ख़ुद भी हमेशा इस बात को स्वीकार करते थे। यहाँ तक कि जब शहीद सैयद हादी - जिन्हें दुर्भाग्यवश कम याद किया जाता है - के बारे में मेरे पिता से पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हादी की मूल शिक्षा और पालन-पोषण उसकी माँ पर वापस जाता है। "रूहुल-अमीन" नामक किताब में भी उन्होंने संकेत दिया था कि उनके कई गुण स्वाभाविक रूप से उनकी माँ की शिक्षा का परिणाम थे।

 

लेकिन सैयद भी हमारी उम्र के अनुसार, उन घटनाओं से जो किसी बैठक या दैनिक जीवन में होती थीं, हमें सबक सिखाते थे। अभी जब आप मुझसे पूछ रहे हैं, तो सबसे पहली बातें जो मेरे दिमाग में आती हैं, वे ये हैं: लोगों को कष्ट देना वर्जित है; बुराई करना और लोगों पर अत्याचार करना वर्जित है; दूसरों की पीठ पीछे बुराई, चुग़ली वर्जित है; लोगों के अधिकारों पर डाका डालना वर्जित है; और लोगों के साथ नरमी बरतना अनिवार्य है। बाद में, जब हम समझदार हो गए, तो उन्होंने यह सब एक सिद्धांत में समेट दिया: ऐसे जियो कि तुम्हें पता हो कि अल्लाह तआला हर पल, हर हरकत और ठहराव में, हर हालत में, हर जगह, जिसके साथ भी हो, तुम्हें देख रहा है; एक पल भी यह मत सोचो कि अल्लाह तुमसे ग़ाफ़िल है; इसलिए अपनी बात, नज़र और कर्म का ख़याल रखो।

 

साथ ही, वे धर्म को कठिन और जटिल नहीं बनाते थे; वे कहते थे कि अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना मुश्किल नहीं है। उनकी ख़ूबी यह थी कि वे बिना किताब और तख़्ती के शिक्षा देते थे और अपने व्यवहार से सिखाते थे। उनका धैर्य, उनका संयम, किसी व्यवहार पर आपत्ति या अस्वीकृति में उनका शिष्टाचार, और जिस तरह से वे हराम और हलाल, मकरूह, सही और गलत को दिखाते थे, यह सब हमारे लिए सबक था। बेशक, जब ज़रूरत होती थी, वे क्रोधित भी हो जाते थे। एक मोमिन (आस्तिक) अगर ग़लती, हराम और पाप के सामने क्रोधित न हो, तो कुछ तो कमी है। वे ख़ुद भी यही कहते थे और कभी-कभी हम सादात (वंशजों) के साथ मज़ाक करते थे और कहते थे कि अगर कोई सैयद थोड़ा गर्म मिजाज़ न हो, तो उसकी जाँच करनी चाहिए!

 

सैयद जब चलते थे तो स्कूल होते थे और जब बैठते थे तब भी स्कूल होते थे। हो सकता है कि आप उनके भाषण के सीधे श्रोता न भी हों, बल्कि आप बस उनके पास बैठे हों और सुन रहे हों कि वे फ़ोन पर किसी मसले को सुलझा रहे हैं; वहीं आप देख सकते थे कि वे किसी समस्या से कैसे निपटते हैं। कुछ लोग जब सुनते हैं कि किसी ने ग़लती की है, तो उनका पहला विचार यह होता है कि उसे कैसे सज़ा दी जाए; लेकिन वे, इसके विपरीत, कहते थे कि मेरा कर्तव्य यह देखना है कि मैं लोगों को उस रास्ते से कैसे दूर रखूँ जो नरक (जहन्नम) की ओर ले जाता है; वरना सबसे आसान काम यह है कि जब कोई, अल्लाह न करे, नर्क के किनारे पर पहुँच जाए और ग़लती करे, तो उसे एक धक्का दे दो और अपना काम खत्म करो। सैयद कहते थे कि यह हमारा काम नहीं है; हमारा काम वही है जो पैग़म्बरों, पैग़म्बर-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि व आलेही व सल्लम) और अहले-बैत (अलैहिमुस्सलाम) का काम था: अल्लाह के बंदों के साथ हिल्म (सहनशीलता), रहमत, कृपा और नरमी। यह विशेषता उनके जीवन के अंतिम वर्षों में अद्भुत रूप से उनके अंदर और अधिक स्पष्ट और उच्चतर हो गई थी।

 

प्रश्न: आपके द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों से, ऐसा प्रतीत होता है कि यही विशेषताएँ उनकी अपार लोकप्रियता के कारणों में से एक थीं।

 

उत्तर: यह लोकप्रियता और वह अद्भुत शवयात्रा— इन सब दबावों के बावजूद — अल्लाह तआला का काम था। जब इंसान अपनी रूह और दिल को अल्लाह के हवाले कर देता है, तो अल्लाह ख़ुद उसकी मोहब्बत और स्वीकार्यता को लोगों के दिलों में डाल देता है; जैसा कि हमने इमाम ख़ुमैनी और इमाम ख़ामेनेई (अल्लाह उन दोनों की रूह को पाक रखे) के बारे में देखा। उन्होंने अल्लाह के लिए ख़ुलूस (ईमानदारी) अपनाई और यहाँ तक कि अल्लाह की राह में अपने आपको फ़ानी (मिटा) दिया; वे न केवल (अपने आपको) मिटा दिए, बल्कि अपना पूरा अस्तित्व अल्लाह के लिए दे दिया, और अल्लाह तआला ने भी उनकी मोहब्बत को अपने बंदों के दिलों में डाल दिया। एक हदीस (रिवायत) इस भावार्थ के साथ आई है कि जब अल्लाह किसी बंदे से मोहब्बत करता है, तो वह उसकी मोहब्बत को लोगों के दिलों में डाल देता है। अल्लाह नेक बंदों को पसंद करता है और ये बुज़ुर्ग उसके नेक बंदों में से थे और उसके दीन (धर्म) के स्तंभों में से थे।

 

जब आपके भाई शहीद हो गए, तो लेबनान के अंदर और बाहर एक बड़ी घटना घटी। बहुतों को यक़ीन नहीं हो रहा था कि हिज़्बुल्लाह के महासचिव का बेटा मोर्चे पर जंग करता हुआ शहीद हो गया। माँ-बाप का बच्चे के प्रति प्यार भी एक ख़ास जगह रखता है। कृपया अपने पिता और शहीद सैयद हादी के रिश्ते की, और शहादत के समय उनके व्यवहार की कोई याद बताइए; ख़ासकर अगर कोई बात पहले कभी न कही गई हो।

 

हो सकता है कि उन्होंने कोई ख़ास बात कही हो, लेकिन अब मुझे याद नहीं आ रही। सच में, उन्होंने कभी इस बात पर न तो भगवान का एहसान जताया कि उन्होंने अपना बेटा कुर्बान किया, और न ही लोगों पर। फिर भी, कुछ दिखने में छोटी-सी बातों का बहुत बड़ा मतलब था। क़ैदियों के आदान-प्रदान (एक्सचेंज) के मामले में, उन्होंने सिर्फ़ हादी के बारे में और बाक़ी शहीदों और क़ैदियों से अलग हटकर बातचीत करने से इनकार कर दिया—मेरा मतलब उन शहीदों से है जिनके पाकीज़ा शव क़ैद में थे। बाद में जब पाकीज़ा शव वापस आए और शहीद हादी को दफ़नाया गया, और सालों बाद जब अलहाज एमाद (रहमतुल्लाह अलैह) को दफ़नाया गया और शहीदों के कब्रिस्तान को व्यवस्थित किया गया, तब भी उन्होंने यह नहीं होने दिया कि सैयद हादी की कब्र बाक़ी शहीदों की कब्रों से कोई अलग पहचान या विशेषाधिकार रखे। उन्होंने साफ कहा कि मेरा बेटा भी बाक़ी शहीदों की तरह ही शहीद हुआ है; किसी ने उसकी कब्र पर ऐसी कोई चीज न रखी जो उसे दूसरे शहीदों से अलग करे। यहाँ तक कि इस मामले में भी उन्हें उन माताओं और शहीदों के परिवारों का ध्यान था जो वहाँ आते थे। इसलिए सैयद की इस अत्यधिक विनम्रता के कारण, हादी साल 1997 से लेकर मेरे पिता की शहादत से पहले तक और आज तक भी, बहुत से शहीदों की तरह मज़लूम (उपेक्षित) और कम-जाना-पहचाना ही रहा।

 

आपको अपने भाई की शहादत की ख़बर कैसे मिली?

यह किस्सा हँसी-ग़म दोनों वाला है! हादी उस घर को तैयार कर रहा था जहाँ उसे शादी के बाद रहना था और वह गृहस्थ जीवन शुरू करने की तैयारी कर रहा था। इससे कुछ समय पहले, पूरा परिवार सैयद के साथ ईरान आया था; यह 1990 में हमारे जाने के बाद की हमारी लगभग आख़िरी और इकलौती पारिवारिक यात्रा थी।

उस दिन, सबसे पहली चीज़ जिसने मुझे बताया कि कुछ हुआ है, वह तब थी जब मैं हमारी बस्ती के प्रवेश द्वार पर स्थित गार्ड रूम के पास पहुँचा। हमारी एक अच्छी पड़ोसिन मेरी तरफ आई और बोली, तुम्हारा नाम क्या है? मैंने कहा, जवाद। उसने कहा, मतलब तुम हादी नहीं हो? मैंने कहा, नहीं, मैं हादी नहीं हूँ। मैंने अपने पीछे खड़े अपने दोस्त से कहा, ख़ैर, हो सकता है हादी, मेरा भाई, ने अपने भाई के बेटे को मारा हो या किसी को परेशान किया हो! अल्लाह जाने। फिर मैं घर की तरफ गया। गार्डों का सन्नाटा और उस औरत का सवाल धीरे-धीरे मुझे यह एहसास दिलाने लगा कि कुछ हुआ है। जब मैं पहुँचा, तो मेरी बहन ज़ैनब ने दरवाजा खोला और मैंने उसके आँसू देखे; मुझे वहीं समझ आ गया कि कोई ख़बर आई है।

जब मैं अंदर गया, तो अलहाज एमाद (रहमतुल्लाह अलैह) आगे आए और बोले, अंदर हॉल में आओ। हमारे घर में पिताजी के लिए एक ख़ास हिस्सा था; मैं वहाँ गया। पहले मैंने सोचा कि पिताजी टीवी देख रहे होंगे; फिर देखा कि नहीं, अलहाज एमाद और कुछ दूसरे लोग कमरे में थे और पिताजी अकेले लाइब्रेरी में बैठे थे। मैं अंदर गया, उन्हें चूमा और शोक व्यक्त किया। फिर अलहाज एमाद ने हमें आवाज़ दी और कहा, आओ। हम गए और देखा कि उन्होंने वीडियो प्लेयर पर टीवी पर एक फ़िल्म चला रखी थी ताकि हम शहीदों के पाकीज़ा शव को, जो जमीन पर पड़े थे, देख सकें और पहचान सकें कि कौन हादी है और कौन अली कोसरानी, ताकि वे ख़बर की पुष्टि कर सकें।

आप कह रहे हैं कि कुछ लोगों को यक़ीन नहीं हो रहा था, जबकि शहीद सैयद हादी का पाकीज़ा शव भी दुश्मन के क़ब्जे में चला गया था—यानी इस्राईलियों ने मैदान-ए-जंग से उनका शव ले लिया था और उसकी तस्वीर भी जारी कर दी थी। इसके बावजूद, कुछ घटिया लोग इसी बात को सैयद पर नुक्ताचीनी करने का बहाना बनाना चाहते थे; हालाँकि यह कोई साधारण गौरव की बात नहीं थी, बल्कि एक शान और ईश्वरीय निशानी थी। इसके बावजूद, सैयद ने हादी का बचाव केवल एक बार किया, जब उसकी शहादत की जगह के बारे में बदनामियाँ फैलाई जा रही थीं।

ख़ैर, हमने शवों की पहचान की और हादी को उसकी जुड़ी हुई भौंहों से पहचाना। इस्राईलियों ने उसका शव अदला-बदली तक फ़्रिज में रखा और उसे सामूहिक क़ब्रों वाले क़ब्रिस्तान' में नहीं दफ़नाया।

सैयद, इस मुसीबत के सामने बहुत धैर्यवान और अल्लाह पर भरोसा रखने वाले थे। हमने कभी उन्हें अति-प्रतिक्रिया करते हुए या बिखरते हुए नहीं देखा, सिवाय जब उन्होंने इमाम ख़ुमैनी के निधन की ख़बर सुनी—तब का वह पल मुझे याद है—या जब वे अपनी फुफी को शोक व्यक्त कर रहे थे। उनका दिल बहुत नरम था। मुझे याद है कि एक बार उन्होंने फ़ोन पर अपनी चाची को शोक व्यक्त करने के बाद फ़ोन रखा और अकेले में रो पड़े। लेकिन हादी और दूसरे शहीदों के मामले में वे बहुत मजबूत थे और लोगों के सामने ख़ुद को संभाले रखते थे, हालाँकि स्वाभाविक रूप से इमाम हुसैन (अबा अब्दिल्लाह) के मातम में वे रोते थे।

 

प्रश्न: जब पिताजी परिवार के साथ होते थे, क्या वे शहादत के बारे में बात करते थे और क्या आपके बीच यह विषय उठता था?

 

उत्तर: हम अपने मन में भी सैयद की शहादत के बारे में बात करने की कल्पना नहीं कर सकते थे, आपस में तो बिल्कुल नहीं। बेशक, यह भावनात्मक पक्ष था; वरना हम शहीदों और प्रतिरोध (मुक़ावमत) की राह में जीते थे और सैयद हर समय हत्या (तर्रार) के खतरे में थे, इतना कि कई बार वे हमें जल्दी से घर से निकालकर कुछ दिनों या थोड़ी अवधि के लिए अज्ञात घरों में रखते थे। बेशक, यह मुक्ति (सन् २०००) से पहले की बात है; ८० के दशक के बाद भी कई बार सैयद की हत्या के प्रयास या तो पकड़े गए या नाकाम हुए और उनकी ख़बर बाहर आई। जैसा कि मैंने कहा, बालबेक में भी लोग हमारे दरवाज़े पर दस्तक देते थे और संदिग्ध वाहन घर के पास रुकते थे और उनकी आवाजाही पर नज़र रखते थे। ९० के दशक में भी इस्राईलियों ने कई बार उनकी हत्या की कोशिश की। इसलिए, शहादत एक ऐसा ख़तरा था जो उन्हें हर दिन धमकाता था।

 

उदाहरण के लिए, बेरूत बंदरगाह विस्फोट के दिन, मैं घर पर था कि अचानक मैंने देखा कि ज़ाहिया (उपनगर) में ज़मीन हिल गई, हर जगह कंपन था, धुएं ने आसमान को ढक लिया और यहाँ तक कि दक्षिण (लेबनान) के लोगों ने भी झटके महसूस किए। मैं घर से नीचे आया और धुआँ देख रहा था, लेकिन सदमे के कारण मैं दूरी का सही-सही अंदाजा नहीं लगा पा रहा था; धुआँ इतना विशाल था कि मुझे लगा जैसे तीन इमारतों के पीछे से उठ रहा है। मैं सड़क पर चल रहा था और मेरा दिल तेज़ धड़क रहा था; मुझे लगा कि सैयद को निशाना बनाया गया है। थोड़ी देर बाद कहा गया कि विस्फोट बंदरगाह में हुआ है। वहीं मेरा दिल थोड़ा शांत हुआ और मैं वापस लौटा ताकि जाकर देखूँ कि क्या हुआ है। संक्षेप में, मुझे राहत मिली कि हमला सैयद पर नहीं था।

 

स्वाभाविक रूप से, सैयद की जान और सेहत को लेकर हमेशा चिंता और फिक्र रहती थी, लेकिन अंततः हम मोमिन (आस्तिक) थे और काम को अल्लाह तआला पर छोड़ देते थे। इंसान चाहे कितना भी कर ले, उसका असली रक्षक अल्लाह ही है। यहाँ तक कि हाजी नबील (सुरक्षा प्रमुख) मुझसे कहते थे कि यह मत सोचो कि मैं कुछ कर रहा हूँ; मैं अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ, लेकिन जो उन्हें बचाता है वह अल्लाह है। इसलिए, यह चिंता एक रोज़मर्रा की फिक्र नहीं बन जाती थी जो हमारी ज़िंदगी और काम को रोक दे।

 

प्रश्न: आपकी शहादत से पहले, आख़िरी बार आपने अपने पिता को कब देखा था?

 

उत्तर: उनकी शहादत से लगभग तीन महीने पहले और मेरी दादी के निधन के लगभग एक महीने बाद; मेरी दादी का २५ मई २०२४ को निधन हुआ था।

 

प्रश्न: क्या यह एक छोटी मुलाक़ात थी?

 

उत्तर: जब वे मेरी दादी को देखने आए, तो यह एक छोटी मुलाक़ात थी; उन्होंने (दादी के लिए) सूरह यासीन पढ़ी और दुआ की। लगभग एक महीने बाद, हम लगभग डेढ़ घंटे के लिए अपनी चाचियों और चाचाओं के साथ बैठे; बेशक, हर एक के साथ अलग-अलग, क्योंकि सुरक्षा स्थितियों ने सभी को एक साथ इकट्ठा होने की अनुमति नहीं दी। यह आख़िरी बार था जब मैंने उन्हें क़रीब से देखा। बेशक, मैं फ़ोन पर उनके संपर्क में था और कहता था कि मैं उन्हें देखना चाहता हूँ और उन्हें याद करता हूँ; लेकिन किस्मत कुछ और ही थी।

 

प्रश्न: उस आमने-सामने की मुलाक़ात के बाद, कोई और बात हुई? क्या आपको शहादत से पहले की आख़िरी फ़ोन कॉल याद है?

 

उत्तर: शहादत से आठ दिन पहले मैंने उनसे बात की थी। शनिवार को फ़ोन किया, लेकिन वे व्यस्त थे। आमतौर पर हमारी बातचीत का समय सुबह की नमाज़ (फज्र) के बाद होता था और उस दिन सुबह की नमाज़ के बाद भी वे व्यस्त थे। मैंने हाजी नबील, शहीद इब्राहिम जज़ीनी से बात की। मुझे याद नहीं कि रविवार को उनसे बात हुई हो; मुझे नहीं लगता। सोमवार से, घटनाएँ एक के बाद एक शुरू हुईं और वे शुक्रवार को शहीद हो गए।

 

प्रश्न: आपको कब पक्का पता चला कि आपके पिता शहीद हो गए हैं?

 

उत्तर: हमले के क्षण, ज़ाहिया बुरी तरह हिल गया। मेरे कुछ दोस्तों ने बाद में मुझे अपने दफ्तरों (जो ज़ाहिया के आसपास थे) के अंदर की वीडियो दिखाईं कि कैसे सब कुछ हिल रहा था। हम जहाँ थे, वहाँ भी हिलावट महसूस हुई; जैसे २००६ में इमाम हसन कॉम्प्लेक्स पर बमबारी की गई थी। उसी क्षण मैं नींद से चौंक गया, जबकि मैं एक बेचैन और दुःस्वप्न जैसा सपना देख रहा था। कुछ घंटों बाद, इस्राईलियों ने घोषणा की कि उन्होंने 'अमुक' को निशाना बनाया है। हम विश्वास और अविश्वास के बीच थे। सहयोगी आए और कहा कि अभी कोई ख़बर नहीं है और इंशा अल्लाह भलाई है। कुछ भी स्पष्ट नहीं था और हम वास्तव में कुछ नहीं जानते थे।

 

सच कहूँ तो शायद मैं उन लोगों को दोष नहीं दे सकता; किसी में भी ऐसी ख़बर किसी दूसरे को देने की ताक़त नहीं है, विशेष रूप से सैयद के परिवार को। शनिवार को, जब हिज़्बुल्लाह ने एक बयान जारी किया, तो हमें यक़ीन हो गया। कुछ लोग मुझे मोबाइल के ज़रिए ढूंढ़ रहे थे ताकि टीवी घोषणा से पहले मुझे ख़बर दे सकें और जान सकें कि मैं कहाँ हूँ। ये ऐसे पल हैं जिन्हें मैं न तो याद करना पसंद करता हूँ और न ही उनके बारे में बात करना।

प्रश्न: क्या आपकी कभी परिवारिक रूप से रहबर-ए-इंक़ेलाब (ईरान के सर्वोच्च नेता) से मुलाक़ात हुई?

 

उत्तर: नहीं, कभी भी पूरा परिवार एक साथ आक़ा (रहबर) की सेवा में नहीं पहुँचा था; न सैयद की शहादत से पहले और न ही उसके बाद। मेरे

 

पिता को बहुत शर्म (हया) थी और वे किसी के लिए मुश्किल या बोझ बनना पसंद नहीं करते थे। उन्हें हमेशा कहा जाता था कि आप ख़ुद आएँ, परिवार और बच्चों को भी ले आएँ, लेकिन वे मानते नहीं थे। शहादत के बाद भी ऐसा नहीं हुआ कि सारा परिवार एक साथ आक़ा की सेवा में पहुँचा हो; ऐसी परिस्थितियाँ थीं जिनकी बारीकियों की हमें ख़बर नहीं थी।

प्रश्न: पहली बार आपकी रहबरे इंक़ेलाब से कब मुलाक़ात हुई?

 

उत्तर: पहली बार वह था जब हम इमाम ख़ुमैनी (रह) की शवयात्रा में शिरकत के लिए ईरान आए थे। मेरी उम्र आठ साल थी और हम तेहरान के पुराने मुसल्ला गए थे। उस दिन जो भाषण दे रहे थे, वे इमाम ख़ामेनेई (अल्लाह उनकी रूह को पाक रखे) थे। मैं ऐसी जगह बैठा था जहाँ से मिंबर साफ़ नहीं दिख रहा था; इसलिए मैं ख़ुद को उस तरफ़ ले गया जहाँ से मैं उन्हें देख सकूँ और हर कुछ पल चोरी-छिपे उनकी तरफ़ देखता रहता था।

कभी-कभी इन सालों में — उदाहरण के लिए, आक़ा के जनाज़े के बाद — मैं सोचता था कि रहबर के प्रति यह मोहब्बत हमारे दिलों में कैसे बोई गई। पिताजी की इसमें बड़ी भूमिका थी, लेकिन मूल बात तो अल्लाह का काम था। इन मुलाक़ातों से पहले, इंसान किसी को इस तरह कैसे प्यार कर सकता है? या इमाम ख़ुमैनी को, जिन्हें उसने कभी देखा ही नहीं, कैसे प्यार कर सकता है? यह दिखाता है कि यह मोहब्बत अल्लाह का काम है।

जहाँ तक मुझे याद है, आक़ा से मेरी पहली सीधी मुलाक़ात सन् १९९९ में हुई थी। पिताजी आमतौर पर हमें अपने साथ आक़ा की मुलाक़ात पर नहीं ले जाते थे। वे निजी और काम के मामलों को बहुत गंभीरता से अलग रखते थे और बिल्कुल पसंद नहीं करते थे कि ये दोनों आपस में मिलें या किसी को उनकी वजह से शर्मिंदगी उठानी पड़े। उस समय मैं ईरान में था और जब पिताजी आए, तो उन्होंने मुझे बुलवाया और कहा कि मैं तुम्हें एक बहुत खूबसूरत जगह ले जाना चाहता हूँ; हमारी एक अहम मुलाक़ात है। उनकी बात से मैं समझ गया कि उनका मतलब आक़ा से मुलाक़ात है। उन्होंने कहा कल इस समय अपने लिए कोई काम मत रखना, मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे साथ हो। जब हम बैत-ए-रहबरी (नेता के आवास) के परिसर में पहुँचे, तो मुझे यक़ीन हो गया कि हमें आक़ा से मिलना है। पिताजी और उनके साथी बैठक में गए। हॉल के सामने एक छोटा-सा बगीचा था जहाँ नमाज़ के लिए कालीन बिछाया गया था। सैयद आक़ा से पहले बाहर आए और अपने साथ के सभी सुरक्षाकर्मियों — जिनमें से कुछ २०२४ के युद्ध में शहीद हो गए — को बहुत सावधानी से हिदायतें दे रहे थे कि आक़ा पर ज़ोर न डालें, कठोर व्यवहार न करें, (हाथ मिलाते समय) बाएँ हाथ से हाथ मिलाएँ और उनके दाएँ हाथ को न छुएँ; यहाँ तक कि वे कहते थे कि कुछ माँगना मत और कोई अनावश्यक बात मत करना। लेकिन मैंने 'कुछ माँगना मत' वाले हिस्से का पालन नहीं किया! इसलिए मैंने आक़ा अख़्तरी (सैयद मोहम्मद अख़्तरी) से कहा कि मुझे आक़ा से एक अंगूठी चाहिए। मैं बचपन से आक़ा अख़्तरी को जानता था; मैं उन्हें दूतावास में देखता था, वे हमारे घर आते-जाते थे और पिताजी के साथ उनके बहुत अच्छे संबंध थे और वे पिताजी को बहुत प्यार करते थे। उसी वक्त, आक़ा ने मुझे एक अंगूठी भेज दी।

प्रश्न: क्या पिताजी घर पर इमाम ख़ामेनेई के बारे में बात करते थे या उनसे जुड़ी कोई ख़ास याद या बात बताते थे?

 

उत्तर: हमें नहीं पता था कि आक़ा के साथ उनकी बैठकों में क्या होता है; बैठकें कामकाजी होती थीं। यहाँ तक कि कई बार हमें पता भी नहीं होता था कि पिताजी की आक़ा से मुलाक़ात हुई है, जब तक कि वे लेबनान वापस न आ जाएँ या थोड़ी देर बाद हमें पता चले कि वे ईरान गए थे और उनकी मुलाक़ात हुई थी। उनके आने-जाने और यहाँ तक कि बेरूत और कार्यस्थल पर उनके सामान्य मेहमान भी पूरी तरह गुप्त रहते थे; यहाँ तक कि उनके कई सहयोगियों को भी इसकी ख़बर नहीं होती थी। इसलिए, ये मामले घर पर चर्चा और बातचीत का विषय नहीं थे।

बेशक, कभी-कभी वे कहते थे, जैसे, जब मैं आक़ा की सेवा में था, तो ऐसी घटना हुई; ये छोटी-छोटी बातें भी हमारे लिए दिलचस्प होती थीं। वे कहते थे कि निजी मुलाक़ातों में, आम हॉल में नहीं, बल्कि आक़ा के पुस्तकालय (लाइब्रेरी) में बैठते हैं। एक बार जब उन्होंने पुस्तकालय में एक साथ तस्वीर खिंचवाई, तो आक़ा ने उनसे कहा था कि कुछ लोग तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं और तुम्हारे साथ तस्वीर लेना चाहते हैं; यानी आक़ा की बेटियाँ और बहूएँ। सैयद कहते थे कि चूँकि यह अनुरोध स्वयं आक़ा ने किया था, इसलिए मैंने स्वीकार कर लिया। वे आक़ा के बच्चों और परिवार के प्रति उनके प्यार से अवगत थे। आक़ा का परिवार सैयद के प्रति अपने अत्यधिक स्नेह के लिए जाना जाता था। हम भी जानते थे कि हमारे पिता में कितनी शर्म और विनम्रता थी।

 

प्रश्न: क्या वे अपनी बातचीत या, उदाहरण के लिए, यादगार तस्वीरों के बारे में कुछ बताते थे?

 

उत्तर: नहीं, वे कुछ नहीं बताते थे। उनकी बातें या तो कामकाज की होती थीं, या यदि उनका आध्यात्मिक (इरफ़ानी) पहलू होता था, तो आध्यात्मिक लोग रहस्यों (राज़) को उजागर नहीं करते हैं। कभी-कभी आख़िरी वर्षों में, वे नमाज़ के बाद की दुआओं (तक़ीबात) या किसी ख़ास इस्तिख़ारे (अच्छाई/बुराई जानने की दुआ) के बारे में मुझे लिखकर देते थे और मैं संकेतों से समझ जाता था कि यह बात उन्होंने आक़ा से ली है और कुछ दिन पहले ही उनकी सेवा में रहे हैं। वे न केवल नेतृत्व और मामलों में आक़ा की सूक्ष्म दृष्टि पर, बल्कि उनके आध्यात्मिक ज्ञान (इरफ़ान) और अंतर्दृष्टि (बसीरत) पर भी पूर्ण विश्वास रखते थे।

 

प्रश्न: क्या उनके बीच आध्यात्मिक (इरफ़ानी) मामलों में भी संबंध था?

 

उत्तर: हाँ, निश्चित रूप से। हम ख़ुद भी आक़ा के आध्यात्मिक ज्ञान (इरफ़ान) पर विश्वास रखते हैं। यह बात सन् २००६ में आम जनता के सामने स्पष्ट हो गई; जब आक़ा ने विजय की ख़बर दी और कहा कि हिज़्बुल्लाह एक क्षेत्रीय ताक़त बन जाएगा, और वैसा ही हुआ। मेरे पिता ने एक बार किसी से कहा था कि जब हमारे पास आक़ा (नेता) मौजूद हैं, तो हम कुछ आत्मज्ञानियों को देखने के लिए दूर क्यों जाएँ। बेशक, वे उन साधकों का सम्मान करते थे और ख़ुद भी कभी-कभी उनसे मिलने जाते थे और बात करते थे; लेकिन उनका मतलब यह था कि जब तुम एक स्पष्ट, निकट और सुखद स्रोत के पास हो, तो दूर क्यों जाओ। इंसान कभी-कभी कुछ लोगों से सवाल पूछने या स्पष्टीकरण माँगने में संकोच करता है, लेकिन मेरे पिता आक़ा के साथ अधिक सहज थे; चाहे आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, राजनैतिक या इसी प्रकार के मामले हों, क्योंकि ८० के दशक की शुरुआत से ही उनके साथ उनका घनिष्ठ और पुराना संबंध था। एक बार मैंने अपने पिता से पूछा कि आक़ा के साथ इस गहरे संबंध का क्या कारण है, तो उन्होंने कहा कि मेरा इमाम ख़ामेनेई से संबंध ८० के दशक की शुरुआत से है; यानी या तो जब वे राष्ट्रपति बने, या उससे कुछ समय पहले।

 

प्रश्न: अपने पिता की शहादत के बाद, क्या आपने आक़ा (नेता) से मुलाकात की?

 

उत्तर: जुलूसे जनाज़े के कार्यक्रम से पहले मैं ईरान आया और आक़ा के पीछे नमाज़ पढ़ी।

 

प्रश्न: आपके साथ कौन था?

 

उत्तर: मैं अकेला था और परिवार में से कोई मेरे साथ नहीं था। उस समय हम अभी युद्ध की स्थिति में थे।

 

प्रश्न: जनाज़े से कितने दिन पहले?

 

उत्तर: जुलूसे जनाज़े में शिरकत से लगभग एक सप्ताह पहले मैं यहाँ (ईरान) था; नमाज़ के लिए मुझे बुलाया गया और मैं आया। मैं आख़िरी व्यक्ति था जो आक़ा का हाथ चूमने की प्रतीक्षा कर रहा था। उनका चेहरा ऐसा था कि कोई भी उन्हें उस हालत में नहीं देखना चाहता; थकान और शोक पूरी तरह उनके चेहरे पर स्पष्ट था। मुझे अपनी पिछली मुलाक़ातें याद थीं; हर बार जब मैं उनकी सेवा में पहुँचता था, उनका चेहरा खुला और मुस्कुराता हुआ होता था और उनका मिलना मन को प्रसन्न कर देता था, लेकिन इस बार यह पूरी तरह अलग था। जब मैं हॉल और परिसर से बाहर निकला, तो मैंने मन ही मन कहा कि काश मैं न आता और आक़ा को इस हालत में न देखता। उनकी उम्र बढ़ चुकी थी और उनकी दाढ़ी पूरी तरह सफ़ेद हो चुकी थी, लेकिन उस दिन जब मैंने आक़ा को देखा तो मुझे लगा जैसे मेरा अपना दिल बूढ़ा हो गया हो। मैं उनके चेहरे पर थकान और शोक देख रहा था। हमने दो शब्दों से अधिक बात नहीं की; वे बहुत थके हुए थे। मैंने उनका हाथ चूमा, उन्होंने मेरी माँ का हाल पूछा और कहा कि उन्हें मेरा सलाम कहना, फिर चले गए।

दूसरी बार जब मैं उनसे मिलने आया, तो जुलूसे जनाज़े में शिरकत के बाद था; जहाँ तक मुझे याद है, बारह दिवसीय युद्ध से पहले। एक बैठक हुई और मैं, मेरे भाई सैयद महदी और मेरी बहन ज़ैनब उपस्थित थे। फिर हम हॉल के पीछे गए और आक़ा के बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगे। जैसे ही वे आए, उन्होंने मुस्कुराकर सलाम किया; उसी एक मुस्कान ने हमारा सारा दुःख दूर कर दिया। मैंने उन्हें चूमा। सुबहानल्लाह! वास्तव में उनमें अद्भुत आकर्षण था। वे बिल्कुल उसी तरह थे जैसा मैंने सैयद (पिता) के बारे में कहा: जब तुम काफ़ी दिनों से उनका इंतज़ार कर रहे हो और उनकी याद में तरस रहे हो, और फिर एक घंटा उनके साथ बैठते हो, तो बहुत सारे दुःख, चिंताएँ और सवाल समाप्त हो जाते हैं। उस पल भी जब आक़ा दरवाजों के पीछे से और मिंबर के पास से बाहर आए, मैंने उन्हें चूमा, सलाम किया और उनसे मेरे लिए दुआ करने को कहा। सैयद महदी ने भी ऐसा ही किया। वह छोटी सी मुलाक़ात हमारे दुःख और शोक के एक बड़े हिस्से को हल्का करने के लिए काफ़ी थी।

यहाँ तक कि कुछ समय पहले, जब मेरे भाई सैयद महदी आक़ा की सेवा में पहुँचे और उन्होंने उनके सिर पर पगड़ी (अमामा) रखी, तो उनसे कहा कि मैं सैयद (हसन) को नहीं भूलता और उन्हें कभी भूला नहीं हूँ; सैयद के दर्जे हर दिन जन्नत में ऊँचे होते जाते हैं। यह कैसी बात है? इसका एक आध्यात्मिक (इरफ़ानी) पहलू है; आक़ा केवल दिलासा देने, शोक व्यक्त करने और सहानुभूति के लिए कोई भावुक बात नहीं कह रहे हैं कि सैयद के दर्जे हर दिन जन्नत में ऊँचे होते जाते हैं।

 

प्रश्न: कुछ लोग कहते हैं कि सैयद हसन के बाद हिज़्बुल्लाह अब वह हिज़्बुल्लाह नहीं रहा और कमज़ोर हो गया है।

 

उत्तर: पहली बात तो यह कि हम युद्ध के मैदान के बीच में हैं और युद्ध में उतार-चढ़ाव होते हैं; एक दिन हमारे पक्ष में होता है और एक दिन दुश्मन के पक्ष में। भौतिक गणनाओं में, किसी आंदोलन के नेता का मारा जाना या यहाँ तक कि एक इमाम और रहबर (नेता) की शहादत को पराजय माना जा सकता है, लेकिन हम कर्बला की संतान हैं; यह दृढ़ संकल्प, प्रतिरोध और बलिदान देने की तत्परता, इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) के ख़ून से उपजी है। यदि किसी जिहादी और ईमानी आंदोलन में — जैसा कि इमाम ख़ामेनेई ने हिज़्बुल्लाह के आंदोलन का वर्णन किया है — नेताओं और सादात की शहादत का मतलब हार हो, या यदि हम इस्लामी गणतंत्र के बारे में, जो इमाम ख़ुमैनी (रह) की क्रांति की निरंतरता है और कर्बला की संस्कृति पर आधारित है, ऐसा सोचते हैं, तो वास्तव में हम अपने ही सिद्धांतों के साथ विरोधाभास में पड़ जाते हैं। इमाम ख़ुमैनी कहते थे कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह कर्बला और इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) की आशूरा से है। इसलिए, हमारे आंदोलन का मूल इमाम हुसैन के ख़ून, बलिदान और शहादत के कारण जीवित है। हो सकता है कि जिन्होंने इस राह में ख़ून नहीं दिया, वे इस भावना को पूरी तरह न समझ सकें — बेशक, शायद वे इस पर ईमान रखते हों — लेकिन जिसने ख़ुद ख़ून दिया है, वह समझता है कि उसका संबंध और भागीदारी कहीं अधिक गहरी, गंभीर और मूल्यवान हो गई है। दूसरे शब्दों में, जो व्यक्ति दुश्मन से ख़ून का बदला लेना चाहता है, वह इस राह पर और अधिक दृढ़ और स्थिर हो जाता है।

इमाम ख़ामेनेई (रह) की शहादत, सैयद की शहादत और उन कमांडरों की शहादत जो उनसे पहले या इन दो कालखंडों के बीच शहीद हुए, आंदोलन को और अधिक बल और गति देती है और हर कोई इस ख़ून का प्रभाव देखेगा। आज लेबनान में आगे बढ़ने और बलिदान देने के लिए, बस यह एक वाक्य काफ़ी है: सैयद शहीद हो गए; अब हमारे पास क्या बचा है? इसलिए हमें राह के अंत तक जाना है। हम अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुके हैं और हमारी सबसे क़ीमती चीज़ हमने अर्पित कर दी है। अब इमाम ख़ामेनेई (रह) की शहादत के बाद, कौन अमेरिका और इस्राईल की क्षेत्र में शोषणकारी, अत्याचारी और वर्चस्ववादी योजना, उनकी वचनभंगता, विश्वासघात और लालच के बारे में संदेह कर सकता है? लगभग ४५ से ४७ वर्षों के बलिदान, शहादत, कुर्बानी, संघर्ष और युद्ध के बाद, कौन समर्पण करने को तैयार है?

इसलिए, यह शहादत न केवल आंदोलन को रोकती है, बल्कि अधिक प्रेरणा, अधिक दृढ़ता और उच्च अंतर्दृष्टि (बसीरत) पैदा करती है। जो कोई भी आज पीछे रह जाता है, उसे नुकसान उठाना पड़ता है। शायद इसकी एक बरकत यह भी है कि हम इस कठिन परिस्थिति में आ गए हैं। ख़ुद सैयद कहते थे कि यह दौर छटनी, परीक्षा और पंक्तियों के अलग होने का दौर है; लोग और जमावड़े एक-दूसरे से पहचाने जाते हैं। सैयद के शब्दों में, अल्लाह तआला विजय (फतह) को ख़ुल्लास (विशुद्ध और खरे) लोगों को देता है; यानी उस शुद्ध और ईमानदार समूह को जिसने इस राह में अल्लाह के क़रीब आने के अलावा कोई और कदम नहीं उठाया है। यह भी मामले की एक बरकत और सकारात्मक पहलुओं में से एक है और सब कुछ अंधकारमय नहीं है। अल्लाह का वादा हमेशा यही रहा है कि जन्नत (बेहश्त) उन परीक्षाओं, कठिनाइयों और आपदाओं का प्रतिफल है जो मोमिन (आस्तिक) इस दुनिया में झेलते हैं। कठिनाई और आसानी में, या तो हमें ईमान वाला होना चाहिए या फिर धर्म सिर्फ़ हमारी ज़ुबान पर लगी बात (लक़लक़ा-ए-ज़बान) हो और हम जितनी भी बातें कहते हैं, वे सिर्फ़ मीडिया और दिखावे के लिए हो। अल्हम्दुलिल्लाह, हम भी शहीदों के परिवारों की गिनती में शामिल हो गए हैं और शहीदों के परिवारों के साथ खड़े हैं। मुजाहिदीन और शहीदों के परिवारों ने साबित कर दिया है कि वे बलिदान, ईमान और वफ़ादारी वाले हैं और इंशा अल्लाह, वे ही विजय और निकट भविष्य की फतह के योग्य होंगे।

 

प्रश्न: इन दिनों कुछ मीडिया में कहा जा रहा है कि इस्लामी गणतंत्र (जम्हूरी-ए-इस्लामी) ने प्रतिरोध (मुक़ावमत) समूहों को अकेला छोड़ दिया है। इस बारे में आपकी क्या राय है?

 

उत्तर: पहली बात तो यह कि ये ज़ायोनी प्रचार मशीनें और किराए के टट्टू हैं। इस्लामी गणतंत्र आपको कैसे अकेला छोड़ सकता है, जबकि शुरुआती दिनों में, जब वह स्वयं अपनी सबसे कमज़ोर स्थिति में था और थोपे गए युद्ध (ईरान-इराक युद्ध) के बीच में था, उसने आपको अकेला नहीं छोड़ा? अब वह क्यों छोड़ दे? अकेला छोड़ना, कमज़ोरी और विश्वासघात, अली-बिन-अबी-तालिब (अलैहिस्सलाम), इमाम ख़ुमैनी और इमाम ख़ामेनेई (रह) की संतानों का काम नहीं है। हम यह बात घर के अंदर से जानते हैं। मैं अपने पिता के पास बैठता था और देखता था कि आक़ा (रहबर) और इस्लामी गणतंत्र की मौजूदगी उन्हें कितना आश्वासन देती थी।

बस एक उदाहरण देता हूँ। कभी-कभी मैं उनके साथ मज़ाक करता था और कहता था कि मैं जानता हूँ लोगों का आपसे प्यार कितना ज़्यादा है और आपका स्थान कितना ऊँचा है; यहाँ तक कि जब मैं ईरान आता हूँ, तो यह प्यार लेबनान की तुलना में और अधिक स्पष्ट रूप से देखता हूँ, क्योंकि यहाँ के लोग इसे बहुत स्पष्ट रूप से दिखाते थे। एक बार मैं अपने पिता के पास बैठा था और वे किसी से फ़ोन पर बात कर रहे थे, कह रहे थे कि यह मामला ठीक हो जाएगा या ऐसा ही कुछ। उस मुद्दे के आंतरिक विवरण थे और मैंने जानबूझकर नहीं सुना — यानी मैं ख़ुद को उसमें प्रवेश करने का कोई हक़ नहीं देता था — लेकिन उनके एक वाक्य ने मेरा ध्यान खींचा। उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं, वह जो चाहे मुझे भेज दे; मैं यह मामला आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) के साथ हल कर लूँगा, मैं ख़ुद उनसे कहूँगा।

अकेला छोड़ना, कृतघ्नता और विश्वासघात, वह व्यवहार है जो साम्राज्यवादी और ज़ालिम अपने गुलामों के साथ करते हैं। लेकिन जैसा कि सैयद (पिता) कहते थे, हम वली-ए-फ़क़ीह के यहाँ मान-सम्मान वाले और प्रिय हैं। इस्लामी गणतंत्र और हिज़्बुल्लाह के बीच, इमाम ख़ामेनेई और सैयद हसन के बीच, और हमारे तथा विभिन्न पदों पर हमारे भाइयों, विशेष रूप से आईआरजीसी  में, एक ऐसा संबंध है जो प्रेम, पहचान और लगाव पर आधारित है। मैं पहचान के आधार पर बात कर रहा हूँ। जो कोई भी हाजी क़ासिम सुलैमानी और दूसरे कमांडरों तथा शहीदों को जानता है जिनका हिज़्बुल्लाह से सीधा संबंध था, वह जानता है कि उनका पिछले शहीद कमांडरों और सैयद के साथ कितना गहरा संबंध था। वहाँ एक वास्तविक भाईचारा है; जो इन छोटे और मज़दूर लोगों की समझ और कल्पना से परे है। उनके पास गाली-गलौज, शंका पैदा करना, असमंजस और अश्लीलता के अलावा कोई तर्क नहीं है। दुर्भाग्यवश, लेबनान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — और वह भी केवल अपने और अपने गुट के लिए — के बहाने, सभी पवित्र चीज़ों (मुक़द्दसात) का अपमान किया जाता है और कोई सीमा नहीं रखी जाती। बस इन प्रचारिक मशीनरी के उदाहरणों, व्यवहारिक और नैतिक पृष्ठभूमि, यहाँ तक कि व्यक्तिगत जीवन को देख लें, तो आपको 'सूअर के मुंह से सिर्फ़ घुर घुर की आवाज़ बाहर आती है' का मतलब समझ आ जाएगा।

ख़ैर, हमें इन बातों से ज़्यादा निराश नहीं होना चाहिए। अमीरुल मोमिनीन अली-बिन-अबी-तालिब (अलैहिस्सलाम) ने अपने उस स्थान और मरतबे के साथ, जिसे पूरी दुनिया स्वीकार करती है, साठ या सत्तर साल गालियाँ सुनीं; हम तो फिर भी कहाँ! लेकिन इमाम ख़ामेनेई की खूबसूरत व्याख्या यह है कि यह सच है कि हम मज़लूम हैं, लेकिन हम ताक़तवर भी हैं; इंशा अल्लाह।

 

प्रश्न (आख़िरी): सैयद हसन नसरुल्लाह का परिवार इमाम ख़ामेनेई (रह) की शहादत के समय कहाँ था?

 

उत्तर: मैं अपने घर पर नहीं था। उस रात हमारी पारिवारिक सभा नहीं थी, हालाँकि विशेष रूप से सैयद की शहादत के बाद हम ऐसी सभाएँ (दोर-हमी) करने की कोशिश करते हैं। बेशक, उससे पहले भी हम एक साथ आते-जाते थे, लेकिन इतने ध्यान से नहीं कि सभी बहनें और भाई ज़रूर इफ़्तार की मेज़ पर साथ हों। मैं उस रात एक रिश्तेदार के घर इफ़्तार कर रहा था।

जैसे-जैसे माहौल धीरे-धीरे अस्पष्ट होता गया — न कोई ख़बर थी, न कोई पुष्टि, न कोई खंडन — बिल्कुल वैसा ही माहौल था जैसा मेरे पिता की शहादत वाली रात को था। हम बेचैन थे और हमारे पास निश्चित ख़बर नहीं थी; एक तरफ़, हमारे दिल में कुछ कह रहा था कि कुछ हुआ है, और दूसरी तरफ़, इज़राइली दावा कर रहे थे और दूसरी तरफ़ खंडन हो रहा था। यहाँ तक कि हमारे बच्चे भी उस पल निश्चित नहीं थे। उसी रात, जब आक़ा (रह) की शहादत हुई, मैंने अपने उस रिश्तेदार से जो मेरे बग़ल में बैठा था, कहा कि मेरी अनुभूति बिल्कुल मेरे पिता की शहादत वाली रात जैसी है। मैंने कहा कि यह मेरे पिता की शहादत की दूसरी रात है।

बेशक, इस शोक के साथ-साथ, एक पहलू से, एक प्रकार की शांति भी थी। यहाँ मैं फिर से आक़ा के आध्यात्मिक (इरफ़ानी) पहलू पर आता हूँ। हम वीडियो में देखते थे कि एक युवा उनकी सेवा में आता था और कहता था कि मेरे लिए दुआ करें कि मैं शहीद हो जाऊँ, आक़ा कहते थे कि इंशा अल्लाह ७०, ८० या ९० साल की उम्र में शहीद होना; अभी जाओ, पढ़ाई करो और अपने समाज के लिए उपयोगी बनो। वास्तव में, उन्होंने अपने बारे में भी यही कहा था; कि उनकी शहादत बुढ़ापे में होगी। इतनी महानता वाला व्यक्ति, वाकई अपने युग का अनोखा (यगाना-ए-दौरान) था। मैंने बहुत से लोगों को देखा और जाना है, लेकिन आक़ा की दृढ़ता, भव्यता और व्यक्तित्व, मामलों के प्रति उनकी समझ और दृष्टि, उनके विचार और लेखन, सब कुछ बताता था कि आप एक अलग इंसान और एक अलग आदर्श के सामने हैं। अल्लाह तआला ने उनके जीवन का अंत शहादत के साथ किया, यह केवल एक व्यक्तिगत अंत नहीं था; इसे एक व्यापक क्षितिज से देखा जाना चाहिए कि इस ख़ून का उपयोग इस्लामी गणतंत्र और इस रास्ते की रक्षा के लिए कैसे किया गया।

जैसा कि मैंने कहा, हमने अपनी सबसे क़ीमती चीज़ अर्पित कर दी; लेकिन इसके बदले में, वे उस आयत का प्रतीक थे "जिन्होंने वह अहद व पैमान सच्चा कर दिखाया जो अल्लाह से किया था...।" (सूरए अहज़ाब, आयत-23) चाहे सैयद हों या इमाम ख़ामेनेई, दोनों ने अल्लाह के साथ किए गए अपने अहद को पूरा किया। यह हमारे लिए और उन सभी के लिए, जिनके बाल सफ़ेद हो रहे हैं, एक प्रेरणा है कि अभी भी समय है; लेकिन हमें डर और शैतानी वसवसों (प्रलोभनों) के सामने वफ़ादार, स्थिर और दृढ़ रहना चाहिए, और पहले से भी अधिक मज़बूती से इस राह को जारी रखना चाहिए।

लेकिन बहुत सरल शब्दों में, और किसी भी इंसान की तरह, मैं कहता हूँ कि आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई (अल्लाह उनकी उम्र को लंबी और मुबारक करे) का आना, हमारे दुःख, शोक और दर्द के एक हिस्से को शांत कर गया। एक रहबर (नेता) को खो देना, जिसके साथ आपका केवल एक औपचारिक संबंध है, एक बात है, लेकिन उस रहबर को खो देना जो आपका प्रिय और प्यार है, दूसरी बात है। मैं हमेशा कहता था कि मैं इमाम रज़ा (अलैहिस्सलाम) की ज़ियारत और इमाम ख़ामेनेई को देखने के लिए ईरान आता हूँ, और सभी जानते हैं कि मैं किस उत्साह के साथ आक़ा (रहबर) की दीदार (मुलाक़ात) की प्रतीक्षा करता था। मेरे लिए दीदार का दिन ईद जैसा होता था; जैसे आपको अपनी जीवन भर की तपस्या का इनाम मिलने वाला हो। इमाम ख़ामेनेई को देखने के लिए मेरी प्रतीक्षा और तैयारी ऐसी ही थी। आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा ख़ामेनेई (उनकी उम्र लंबी हो) की मौजूदगी भी वाकई हमारी आँखों का नूर, हमारे दिल और जान की शांति और हमारे घावों पर मरहम है। मैं हमेशा इस वाक्य को दोहराता हूँ: इंशा अल्लाह वे नूर (प्रकाश) हैं, नूर से हैं, नूर, मोहब्बत, विलायत (नेतृत्व) और इताअत (आज्ञाकारिता) के मालिक हैं, और इस स्थान के योग्य हैं।

मेरी मान्यता है, जो हम सुनते हैं, उसके आधार पर, कि इंशा अल्लाह यह एक ईश्वरीय योजना है और हज़रत साहिब-उज़-ज़मान (इमाम मेहदी, अलैहिस्सलाम) की निगरानी में है। यह केवल एक भावनात्मक अनुभूति नहीं है, बल्कि एक विश्वास है। बेशक, भावनात्मक रूप से भी, सैयद मुज्तबा वाकई दिलों के मालिक हैं। मैं अपनी, अपने परिवार और अपने करीबियों की बात कर रहा हूँ। सभी कहते हैं कि उन्हें बता दें कि हम उनके साथ ही हैं; उसी मोहब्बत, उसी इताअत और उसी विलायत के साथ, और आपका हमारे दिलों में वही स्थान है।

सुबहानल्लाह! यह अल्लाह का काम है; वरना इतनी सारी मोहब्बत और मोमिनों (आस्तिकों) और दोस्तों के दिलों में यह गहरी पैठ कहाँ से आती है?

इमाम ख़ामेनेई (रह) की शहादत का प्रभाव दुनिया की उम्मतों, विशेष रूप से अरब दुनिया के लोगों की प्रतिक्रिया में देखा जाना चाहिए। मैंने उन्हीं दिनों सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं को ख़ुद फॉलो किया था। केवल ईरानी ही नहीं थे जो इमाम ख़ामेनेई से माफ़ी माँग रहे थे और कह रहे थे कि हमने आपको नहीं पहचाना; कुछ अरब देशों में भी लोग कह रहे थे कि हमें धोखा दिया गया, हमारी आँखें बंद कर दी गईं और जानबूझकर ऐसा किया गया कि हम आपको पहचान न सकें, आपसे नफरत करें और आपसे मोहब्बत न करें; और फिर, वे उनकी प्रशंसा कर रहे थे। ये इमाम की शहादत की बरकतें हैं।

एक व्याख्या जो मुझे इन बुज़ुर्गों के बारे में सही लगती है, वह यह है: अपने पिता की शहादत से पहले, मैं सोचता था कि अल्लाह ने उन्हें २००० और २००६ की विजय, इतनी सारी लोकप्रियता और यह वैश्विक स्थान दिया है; तो अल्लाह उनका और कैसे सम्मान करेगा? फिर, अल्लाह ने शहादत के माध्यम से उन्हें सम्मानित किया। तब मुझे समझ आया कि लोकप्रियता और वैश्विकता से ऊपर, पवित्रता (क़ुद्सियत) है; और पवित्रता केवल शहादत के साथ पूर्ण होती है।

हदीस-ए-क़ुदसी (पवित्र वाणी) में आया है कि "जब मैं अपने बंदे से मोहब्बत करता हूँ, तो मैं उसे क़त्ल कर डालता हूँ; और जब मैं उसे क़त्ल कर डालता हूँ, तो उसके ख़ून का बदला मुझ पर है और मैं स्वयं उसका ख़ून बहा हूँ।" अल्लाह इन बुज़ुर्गों से मोहब्बत करता था, उन्हें अपने पास बुला लिया और शहादत को सबसे अच्छे तरीक़े से उनकी क़िस्मत में किया, यहाँ तक कि उनके शहादत का तरीका भी उनके मरतबे के अनुकूल था। अल्लाह तआला ने हर छोटे-बड़े पहलू में उनका काम अपने हाथ में ले लिया। इसलिए, उनकी उम्र अल्लाह के लिए थी, उनका जीवन अल्लाह के लिए था, उनकी शहादत अल्लाह के लिए थी और उनका ख़ून भी अल्लाह के लिए ही रहेगा।

कितनी बड़ी तो निवेश है! हो सकता है कि मैं और आप कुछ पलों के लिए अल्लाह के लिए ख़ुलूस (ईमानदारी) रखें, फिर कहीं भूल जाएँ या अपने जीवन का एक हिस्सा इस राह से अलग कर लें; लेकिन ये बुज़ुर्ग अपनी जवानी की शुरुआत से लेकर अपने जीवन के अंत तक, शहादत के क्षण तक और यहाँ तक कि अपनी शहादत के बाद भी, अल्लाह के लिए एक शुद्ध निवेश थे।

 

प्रश्न: सैयद जी! आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने हमें अपना समय दिया। यदि कोई और बात बाक़ी है, तो कृपया बताएँ।

 

उत्तर: अल्लाह आपको बचाए रखे। मैं वाकई बहुत ख़ुश हूँ कि यह बातचीत हुई। मैं हमेशा सोशल मीडिया पर इमाम-ए-शहीद (शहीद इमाम) का परिचय कराने के लिए दृढ़ रहा हूँ; मैं कहता था कि मैं लड़ूंगा ताकि साइबर स्पेस में इमाम-ए-शहीद से संबंधित पृष्ठ सक्रिय रहें और दिखाई दें। विरोधी मेरे बारे में बुरी बातें कहते थे, लेकिन इससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मेरे विचार से हमारा कर्तव्य है कि हम इमाम-ए-शहीद को दुनिया से परिचित कराएँ और सभी को बताएँ कि वे कौन थे। मेरे पिता कहते थे कि हमें रहबर (नेता) का परिचय कराना चाहिए, क्योंकि वे दुनिया के सबसे मज़लूम इंसान हैं। इसलिए, मैं भी जितना हो सके, हर संभव प्रयास करने की कोशिश करूँगा। आप यह जान लें कि लेबनान के बहुत से युवा भी आक़ा (रहबर) से प्यार करते हैं।

03/08/2026