हम और पश्चिम कॉन्फ़्रेंस का आयोजन:
पश्चिमी सभ्यता के स्वभाव, रणनीति और वर्चस्ववादी शैलियों की पहचान और इस्लामी इंक़ेलाब के नेता के विचार के तहत उससे निपटने की शैलियां, "हम और पश्चिम" कॉन्फ़्रेंस का मुख्य लक्ष्य
तेहरान में इस्लामी क्रांति सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र में, इस्लामी इंक़ेलाब के नेता के विचारों के परिप्रेक्ष्य में "हम और पश्चिम" कॉन्फ़्रेंस के समापन समारोह से संबंधित प्रेस कान्फ़्रेंस हुयी, जिसमें आयतुल्लाह ख़ामेनेई की तहरीरों और तक़रीरों के संरक्षण व प्रकाशन कार्यालय में अध्ययन विभाग के उपप्रमुख मोहम्मद इस्हाक़ी, कॉन्फ़्रेंस के सचिव मूसा हक़्क़ानी, कॉन्फ़्रेंस की नीति परिषद के दो सदस्य मूसा नजफ़ी और मोहम्मद जवाद लारीजानी ने शिरकत की।
मोहम्मद इस्हाक़ी ने अपनी स्पीच में पश्चिमी संस्कृति और सभ्यता के स्वभाव की ओर इशारा करते हुए कहा, "पश्चिमी देशों ने साम्राज्यवाद के ज़रिए वर्चस्ववादी व्यवस्था क़ायम की और इसके मुक़ाबले में इस्लामी इंक़ेलाब भी अपनी कामयाबी के बाद 25 साल में रेज़िस्टेंस का बड़ा मोर्चा बनाने में सफल रहा कि जिसकी सीमाओं का दायरा यहाँ तक कि अमरीका, योरोपीय मुल्कों और उनकी यूनिवर्सिटियों और कालेजों तक फैल चुका है।"
उन्होंने आगे कहा कि इस्लामी इंक़ेलाब के नेता की नज़र से, मानवाधिकार, प्रजातंत्र, सेक्युलरिज़्म और महिला अधिकार के मैदान में पश्चिमी सभ्यता की वैचारिक बुनियाद और सैन्य, आर्थिक और प्रचारिक जैसी व्यवहारिक ताक़तों के स्तंभों को भी इस वक़्त लेजीटिमेसी के संकट का सामना है। ग़ज़ा पट्टी, लेबनान और दूसरे देशों के हालिया वाक़ए बताते हैं कि पश्चिम, मानवाधिकार और राष्ट्रों की आज़ादी का ज़रा भी सम्मान नहीं करता।
इस्हाक़ी ने कहाः इस्लामी इंक़ेलाब की कामयाबी से इन आधारों और बुनियादों को पहले से ज़्यादा चैलेंज का सामना हुआ और आज यह बात ज़ाहिर हो चुकी है कि पश्चिम, राष्ट्रों के अधिकारों, मानवाधिकार, महिला और बाल अधिकार का ज़रा भी सम्मान नहीं करता।
उन्होंने आगे कहा कि पश्चिमी सभ्यता के पतन और दुनिया के अनेक भागों में उसके प्रोजेक्टों के बंद गली में पहुंचने की निशानियां ज़ाहिर हो चुकी हैं। अब उनकी योजनाएं अतीत की तरह पूरी कामयाबी से लागू नहीं हो पातीं और मध्य एशिया, लैटिन अमरीका और वेस्ट एशिया के देशों में वे एक के बाद एक नाकाम हो रही हैं। ये नाकामियां पश्चिमी सभ्यता के लिए जो ख़ुद को मानवता की तरक़्क़ी का ध्रुव समझती है, बहुत भारी है।
इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस में "हम और पश्चिम" कॉन्फ़्रेंस के सचिव मूसा हक़्क़ानी ने कॉन्फ़्रेंस के आयोजन की प्रक्रिया को बयान करते हुए कहाः पश्चिमी सभ्यता और वर्चस्ववादी व्यवस्था की साम्राज्यवादी और वर्चस्ववादी शैलियों, रणनीतियों और स्वभाव की पहचान, इस कॉन्फ़्रेंस का मुख्य लक्ष्य है। इसी तरह इस्लामी जागरुकता, वर्चस्वावादी व्यवस्था के मुक़ाबले में रेज़िस्टेंस का जायज़ा और ईरानी-इस्लामी पहचान की क्षमता का मूल्यांकन, इस इल्मी अभियान के दूसरे अहम बिंदु रहे हैं। हम ने इस मार्ग के लिए, अपने मद्देनज़र लक्ष्य को हासिल करने के लिए 12 मुख्य बिंदुओं को चिंहित किया है।
हक़्क़ानी ने इन बिंदुओं की व्याख्या में कहाः पश्चिमी सभ्यता क्या है और उसके ज़रूरी अंगों की पहचान, पश्चिमी साम्राज्यवाद का स्वभाव और उसमें प्राचीन साम्राज्यवाद से लेकर पोस्ट मॉडर्न साम्राज्यवाद के सफ़र को तय करने के दौरान आने वाले ऐतिहासिक बदलाव, दुनिया पर पश्चिम के वर्चस्व के तत्व, रणनीतियाँ, उपाय और शैलियाँ, साम्राज्यवादी मुल्क और उनके साम्राज्यवादी व्यवाहर और उनके अधीन रहने वाले इलाकों का इतिहास, दुनिया में साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ इंक़ेलाब, पश्चिमी साम्राज्यवाद और वर्चस्ववाद से मुक़ाबले में ईरानी सभ्यता की सलाहियत, ईरान पर केन्द्रित पश्चिम की वर्चस्ववादी व्यवस्था की रणनीति, उपाय और शैलियां, रेज़िस्टेंस के सिद्धांत और ईरान में वर्चस्ववाद और साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ धार्मिक आंदोलन, साम्राज्यवाद और वर्चस्ववाद के ख़िलाफ़ ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब की शख़्सियतें, साम्राज्यवाद से निपटने के आधार और रणनीतियां, और वर्चस्ववादी व्यवस्था से मुक़ाबले का आदर्श, ज़ायोनी शासन की वर्चस्ववादी और साम्राज्यवादी प्रवृत्ति और इसी तरह अमरीका की वर्चस्ववादी और साम्राज्यवादी प्रवृत्ति, कुछ अहम बिन्दुओं में हैं।
इस बैठक में, कॉन्फ़्रेंस की नीति परिषद के सदस्य मूसा नजफ़ी ने पश्चिमी सभ्यता के संबंध में इस्लामी इंक़ेलाब के विचार और नज़रिए को बयान करने की ज़रूरत की ओर इशारा करते हुए कहाः हालिया दशकों में, इस्लामी इंक़ेलाब में अमल, विचार से आगे निकल गया और वैचारिक बिंदुओं पर कम ध्यान दिया गया, जबकि शहीद मुतह्हरी, इस्लामी क्रांतियों की एक मुसीबत, भविष्य के लिए योजना और प्रोग्राम का न होना बताते थे।
राजनैतिक विचार के मैदान में सरगर्म इस शोधकर्ता ने पूरब-पश्चिम के बीच टकराव की ऐतिहासिक जड़ों की ओर इशारा करते हुए कहाः हमारे और पश्चिम के बीच इख़्तेलाफ़ का इतिहास काफ़ी लम्बा है, प्राचीन ईरान और ईरान-यूनान जंगों से लेकर क़ुस्तुनतुनिया की फ़तह और उंदलुस के पतन तक। लेकिन नया टकराव फ़्रांस की क्रांति के बाद मिस्र में नेपोलियन की घुसपैठ से शुरू हुआ, यह वह वक़्त था जब पश्चिम ख़ुद को दुनिया का केन्द्र और दूसरों को हाशिया समझने लगा।
नजफ़ी ने इस बात की ओर इशारा करते हुए कि इमाम ख़ामेनेई के रानजैतिक विचार सांस्कृतिक आयाम और उसूलों पर आधारित हैं, कहाः इस्लामी इंक़ेलाब के नेता के राजनैतिक विचार सिर्फ़ प्रतिक्रिया नहीं हैं, बल्कि उसूलों से सुसज्जित और स्पष्ट बुनियाद रखते हैं और साथ ही इस्लामी इंक़ेलाब के वैचारिक तत्वों से समन्वित हैं। यह विचार व्यवहार के मैदान में और मुल्क के संचालन के अनेक स्तर पर लागू हुए और व्यवहारिक होने वाले राजनैतिक विचार को दर्शाते हैं।
"हम और पश्चिम" कॉन्फ़्रेंस की नीति परिषद के सदस्य मोहम्मद जवाद लारीजानी ने अपनी स्पीच में कहाः पश्चिम वालों का मानना है कि लिबरल डेमोक्रेसी इतिहास में सबसे अच्छी डेमोक्रेसी है और इसने सरकारों के संचालन में अच्छी सफलता हासिल की है जबकि पश्चिम के व्यवहार में एक अहम बिंदु है जिसे समझना चाहिए और वह यह है कि पश्चिमी समाज सुरक्षा केन्द्रित है जिसमें सुरक्षा को सबसे ज़्यादा अहमियत दी जाती है।
उन्होंने इस प्राथमिकता के संबंध में मिसाल पेश करते हुए कहाः 11 सितम्बर से पहले अमरीका और योरोप में किसी को न्यायिक हुक्म के बिना 24 घंटे से ज़्यादा हिरासत में रखना मुमकिन नहीं था और यातना देना क़ानूनन मना था, हालांकि व्यवहार में ऐसा होता था लेकिन इस घटना के बाद ऐसे क़ानून पारित हुए जिसमें संदिग्ध लोगों को मनमानी मुद्दत तक जेल में रखने की इजाज़त दी गयी। यहाँ तक कि ब्रिटेन में भी पूछताछ की कुछ शैलियों जैसे वॉटरबोर्डिंग को वैध समझा गया। इस बदलाव का कारण, पश्चिमी विचार में सुरक्षा को प्राथमिकता दिया जाना है।
"हम और पश्चिम" कॉन्फ़्रेंस की नीति परिषद के सदस्य ने आगे कहाः इस्लामी गणराज्य में पश्चिम के मुक़ाबले के संबंध में दो उसूल हैं। पहला एक तरह की रक्षात्मक मुद्रा है, यानी हम यह सोचते हैं कि अमरीका से हाथ मिलाने के अलावा कोई चारा नहीं है। दूसरे उसूल की बुनियाद एक तरह की बहादुरी है, यह कि मुल्क की रक्षा के लिए कुछ उसूलों से पीछे हटें। तीसरा आधार पश्चिम के संबंध में कुछ भरोसा है, यानी पश्चिम के बुरे व्यवहार के बावजूद, कुछ हद तक उन पर भरोसा करना चाहिए।
लारीजानी ने कहा, दूसरा सिद्धांत रेज़िस्टेंस का है। इस उसूल में, अमरीका के मुक़ाबले में किसी भी तरह की रक्षात्मक मुद्रा मना है। हम इल्म, कला और राष्ट्रीय क्षमताओं के मैदान में नाकाम नहीं हुए हैं। रेज़िस्टेंस के उसूल इमाम ख़ुमैनी (रहमतुल्लाह अलैह) और इस्लामी इंक़ेलाब के नेता की शिक्षाओं के आधार पर, परेशानी को नकारने, आंतरिक सलाहियतों पर भरोसा, राष्ट्रीय सम्मान और स्वाधीनता की रक्षा पर बल देता है। यह उसूल पश्चिम के साथ संवाद को मना नहीं करता, लेकिन उसे राष्ट्रीय हितों और नियमों के अधीन क़रार देता है।
उन्होंने अंत में कहा कि इस्लामी इंक़ेलाब के नेता का एटम बम के संबंध में फ़तवा यह बताता है कि अहले बैत के मत में असीमित हिंसा का विचार नहीं है, यहाँ तक कि जंग की हालत में भी, हम बर्बर नहीं हो सकते कि इसके संबंध में ज्यूरिसप्रूडेंस में ठोस सीमा और उसूल मौजूद हैं।
याद रहे कि इस्लामी क्रांति सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र वैज्ञानिक व शोध केन्द्रों के सहयोग से 9 नवम्बर को "हम और पश्चिम" शीर्षक के तहत कॉन्फ़्रेंस कर रहा है जिसका लक्ष्य पश्चिमी सभ्यता, जीवन शैली और विचार पर छाए हुए उसूलों और बुनियादों की आलोचनात्मक समीक्षा, पश्चिमी सभ्यता के साम्राज्यवादी और वर्चस्ववादी स्वभाव, रणनीतियों और शैलियों की पहचान और वर्चस्ववादी व्यवस्था के मुक़ाबले में रेज़िस्टेंस की बहस और इस्लामी-ईरानी पहचान की सलाहियतों की परख और इस्लामी जागरुकता है।
"हम और पश्चिम" कॉन्फ़्रेंस पिछले साल 4 नवम्बर 2024 को एक बैठक के साथ शुरू हुयी और पूरे साल ईरान के मुख़्तलिफ़ शहरों में 54 बैठकें हुयीं। ये बैठकें दो तरह की थीं आफ़ लाइन और ऑनलाइन। इसी तरह कुछ मुल्कों में अंतर्राष्ट्रीय बैठकें हुयीं जिनमें इस्लामी इंक़ेलाब से साम्राज्यवाद के टकराव के मुख़्तलिफ़ पहलुओं की समीक्षा हुयी। इस कॉन्फ़्रेंस के दूसरे भाग में 533 लेखों की समीक्षा की गयी और अंत में 385 लेखों को क़ुबूल किया गया। इस कॉन्फ़्रेंस के आयोजन के दौरान मुल्क की 46 इल्मी शख़्सियतों और यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसरों से इंटरव्यू लिए गए।
02/11/2025

