आयतुल्लाहिल उज़्मा ख़ामेनेई ने बत्तीसवें राष्ट्रीय नमाज़ सम्मेलन के नाम पैग़ाम में नमाज़ के जीवनदायक और गहरे अर्थों से भरे फ़रीज़े की ओर इशारा किया और बल दिया कि नमाज़ की शिक्षा और उसे क़ायम करना, नमाज़ की रूहानी बारीकियों का बयान और उसे लाज़मी तौर पर पढ़ना, धर्म का प्रचार व प्रसार करने वाले तंत्रों, धर्मगुरूओं और धर्म पर अमल करने वालों का निश्चित फ़रीज़ा है और इस दिशा में काम के लिए नए तरीक़ों को अपनाया जाए।
09/10/2025
शरीअत के सभी वाजिब हुक्म और सभी हराम कामों से दूरी के हुक्म, इंसान की आत्मिक जड़ों को मज़बूत करने और लोक-परलोक के सभी मामलों को सुधारने के लिए हैं, चाहे वह व्यक्तिगत स्तर पर सुधार हो या सामाजिक स्तर पर सुधार हो, ये अल्लाह की तरफ़ से निर्धारित दवाओं का पैकेज है, हाँ इतना ज़रूर है कि इस पैकेज में कुछ तत्व निर्णायक हैसियत रखते हैं और नमाज़ इन तत्वों में शायद सबसे बुनियादी तत्व है। मुल्क के नौजवान तबक़े में दूसरों से ज़्यादा नमाज़ को अहमियत दी जानी चाहिए। नमाज़ से नौजवान का दिल रौशन हो जाता है, उम्मीदों के दरीचे खुल जाते हैं, आत्मा में ताज़गी आ जाती है, सुरूर की कैफ़ियत आ जाती है और यह स्थिति ज़्यादातर नौजवानों से मख़सूस है। इमाम ख़ामेनेई 10/08/1992
08/10/2025
इंसान अपनी व्यक्तिगत ज़िन्दगी में कभी कभी मेहनतों, कठिनाइयों और मुसीबतों के असर में और सामाजिक ज़िन्दगी में कभी कभी बदलाव लाने वाली घटनाओं के प्रभाव में अल्लाह के ज़िक्र के तत्व (तारीफ़, हम्द व शुक्र) के क़रीब हो जाता है, इसी तरह कभी कभी इच्छाओं के प्रभाव में, भोग विलास की महफ़िलों में बैठकर इससे दूर हो जाता है। वह तत्व जो इन सभी हालात में इंसान को ‘ज़िक्र’ की जन्नत के क़रीब कर देती है या और ज़्यादा क़रीब हो जाने में मदद करती है, नमाज़ है। नमाज़ मन की तैयारी से हो तो आदमी को अल्लाह की निकटता के ज़्यादा क़रीब कर देती है, उसे बुलंदी पर पहुंचाती है। इसलिए नमाज़ किसी भी हालत में छूटनी नहीं चाहिए। इमाम ख़ामेनेई 7 सितम्बर 2002
20/08/2025
क़ुरआन मजीद ने सत्ता के मालिक मोमिन की तारीफ़ करते हुए उनके फ़रीज़ों में सबसे ऊपर “नमाज़ क़ायम करने” का नाम लिया हैः "ये वे लोग हैं कि अगर हम उन्हें ज़मीन में इक़्तेदार अता करें तो वे नमाज़ क़ायम करेंगे।" (सूरए हज आयत-41) (मोमिन के) व्यक्तिगत कर्म में यह फ़रीज़ा नमाज़ में कैफ़ियत लाने के मक़सद से है और सामूहिक कर्म में नमाज़ के चलन के लिए है। नमाज़ में कैफ़ियत लाने का मतलब है कि नमाज़ी ख़ुद को ख़ुदा के सामने हाज़िर समझते हुए नमाज़ अदा करे, नमाज़ी नमाज़ को “अल्लाह से मुलाक़ात की जगह” के तौर पर देखे। इमाम ख़ामेनेई 02/09/2013
06/08/2025
कुछ लोग ख़याल करते हैं, “बेशक नमाज़ बेहायई और बुराई से रोकती है” (सूरए अन्कबूत, आयत-45) का मतलब यह है कि अगर नमाज़ पढ़ ली तो गोया बेहयाई और बुराई का अंत हो जाएगा, नहीं, इसका मतलब यह है कि जब नमाज़ पढ़ ली तो आपके भीतर मौजूद वह नसीहत करने वाला जज़्बा जो नमाज़ पढ़ने से सरगर्म हो जाता है, बार बार आपको बेहयाई और बुराई से रोकता रहता है। बुराई को स्पष्ट कर देता है और यह बार बार कहना और दोहराते रहना दिल में उतर जाता है और उसका असर होता है और दिल में विनम्रता की कैफ़ियत पैदा हो जाती है, इसलिए आप देखते हैं कि नमाज़ को बार बार पढ़ते रहने का हुक्म है। मुल्क के नौजवान वर्ग को दूसरों से ज़्यादा नमाज़ की ओर ध्यान व अहमियत देना चाहिए, नमाज़ के ज़रिए जवान का दिल रौशन हो जाता है और उम्मीद की किरण पैदा हो जाती है, आत्मा में शादाबी और ऊंचाई आ जाती है। ख़ुशी का एहसास होने लगता है। यह हालात आम तौर पर जवानों से तअल्लुक़ रखते हैं। इमाम ख़ामेनेई 19 नवंबर 2008
11/06/2025
इक्तीसवीं राष्ट्रीय नमाज़ कान्फ़्रेंस के नाम इस्लामी इंक़ेलाब के नेता के पैग़ाम में अव्वले वक़्त और पूरे ध्यान व एकाग्रता के साथ नमाज़ पढ़ने पर ताकीद की गयी है।
26/12/2024
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने नमाज़ की इक्तीसवीं राष्ट्रीय कान्फ़्रेंस के नाम एक संदेश में धर्मगुरू हुज्जतुल इस्लाम वलमुस्लेमीन मोहसिन क़राअती की निष्ठावान कोशिशों की सराहना करते हुए नमाज़ियों को अव्वले वक़्त नमाज़ पढ़ने और उनके मन व आत्मा सहित व्यक्तिगत और सामाजिक कर्म में नमाज़ के प्रभाव के लिए पूरे ध्यान व तनमयता से नमाज़ पढ़ने पर ताकीद की है। उन्होंने कहा कि यह ताकीद दूसरों की तुलना में जवानों से ज़्यादा है।
25/12/2024
आप सभी प्यारे नौजवानों से मेरी सिफ़ारिश, आत्म-निर्माण की है। आत्म-निर्माण बहुत अहम है, व्यक्तिगत पहलू से भी और सामाजिक पहलू से भी। क़ुरआन से लगाव, क़ुरआन के साथ संपर्क, नमाज़ में ध्यान, नमाज़ को वक़्त पर पढ़ना, दुआओं पर ध्यान, ये सब चीज़ें जो मेरी नज़र में आत्म-निर्माण के लिए ज़रूरी हैं। इमाम ख़ामेनेई 17 मई 2020
21/11/2024
ज़ीक़ादा महीने के रविवार के दिन तौबा व इस्तेग़फ़ार के दिन हैं और इस दिन (ज़ीक़ादा महीने के हर रविवार) का विशेष अमल है। महान धर्मगुरू व आत्मज्ञानी अलहाज मीर्ज़ा जवाद आक़ाए मलेकी ने अलमुराक़ेबात में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही वसल्लम के हवाले से नक़्ल किया है कि उन्होंने अपने साथियों से फ़रमायाः तुम लोगों में कौन कौन तौबा करना चाहता है? सभी ने कहा कि हम तौबा करना चाहते हैं। बज़ाहिर वह ज़ीक़ादा का महीना था। इस रवायत के मुताबिक़, पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया कि इस महीने में आने वाले हर रविवार को यह नमाज़ पढ़ो। अरमुराक़ेबात में इस नमाज़ की तफ़सील बयान की गयी है। कुल मिलाकर यह कि ज़ीक़ादा महीने के दिन, जो 'हराम महीनों' में पहला महीना है, बड़े मुबारक और बर्कत वाले दिन व रात हैं, बर्कतों से भरे हुए हैं। इनसे फ़ायदा उठाना चाहिए। इमाम ख़ामेनेई 09/09/2015 नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा • ग़ुस्ल और वज़ू करे • दो दो रकत करके चार रकत नमाज़ पढ़े। हर रकत में सूरए हम्द के बाद तीन बार सूरए तौहीद और एक एक बार सूरफ़ फ़लक़ और नास पढ़े। • सलाम के बाद 70 बार इस्तेग़फ़ार करे। फिर कहेः "ला हौला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाहिल अलीयिल अज़ीम" इसके बाद कहे "या अज़ीज़ो या ग़फ़्फ़ारो इग़फ़िर ली ज़ुनूबी व ज़ुनूबा जमीइल मोमेनीना वल मोमेनाते फ़इन्नहू ला यग़फ़ेरुज़्ज़ुनूबा इल्ला अंत" स्रोतः मरहूम अलहाज मीर्ज़ा जवाद आक़ाए मलिकी की किताब अलमुराक़ेबात
12/05/2024
बहुत से लोग नमाज़ के लफ़्ज़ों के मानी को नहीं समझते या बहुत थोड़ा समझते हैं, वो भी अगर नमाज़ की हालत में और उसके लफ़्ज़ों को अदा करते हुए इस बात की ओर ध्यान रखें कि वो अल्लाह से बात कर रहे हैं तो इसका असर होगा। मतलब ये कि इंसान नमाज़ पढ़ते हुए मानसिक तौर पर हाज़िर रहे और अल्लाह के सामने अपनी हाज़िरी को महसूस करे तो असर होगा।
27/03/2024
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम सारी तारीफ़ पूरी कायनात के मालिक के लिए और दुरूद व सलाम हो हज़रत मोहम्मद और उनकी पाक नस्ल ख़ास तौर पर पूरी कायनात के लिए अल्लाह की आख़िरी हुज्जत इमाम महदी पर जिन पर हमारी जाने क़ुरबान हों।
06/01/2024