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Nov. 1, 2026

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टैग्स: दरस-ए-अख़लाक़

दरस-ए-अख़लाक़: अल्लाह की नेमतों को गुनाह में इस्तेमाल न करें

इस बात का हमेशा ख़याल रखना चाहिए कि इन नेमतों को कैसे इस्तेमाल करें? आपकी शारीरिक नेमत, आँख की नेमत, कान की नेमत, हाथ की नेमत, पांव की नेमत, ये सब अल्लाह की नेमतें हैं, वो नेमतें हैं कि जिनकी क़द्र व क़ीमत का इंसान कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता, ये इस क़द्र क़ीमती हैं कि किसी भी भौतिक मानदंड पर उनको तौला नहीं जा सकता। अगर इनसे सही फ़ायदा न उठाएं और यूं ही छोड़ दें या ग़लत राह में इस्तेमाल करें और इन नेमतों को अल्लाह की नाफ़रमानी और गुनाह में इस्तेमाल करें तो ये नेमत की नाशुक्री है। अल्लाह हमें और आपको इन नेमतों से नवाज़ता है (लेकिन) हम इन नेमतों को गुनाह और अल्लाह की नाफ़रमानी में एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करें! ये अल्लाह की नेमतों की नाशुक्री की सबसे बुरी हालत है। वे लोग कितने ख़ुशनसीब हैं जिन्होंने अल्लाह की नेमत को नाशुक्री में नहीं बदला, अल्लाह की नेमत का इंकार नहीं किया। सचमुच ऐसा इंसान कितना ख़ुशनसीब है! हमें इसके लिए बहुत ज़्यादा होशियार रहने की ज़रूरत है।  इमाम ख़ामेनेई 30/04/2017

18/02/2026

दरस-ए-अख़लाक़: समाज में फ़ुज़ूलख़र्ची कम होनी चाहिए

हमारा समाज अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम की परहेज़गारी की दिशा में आगे बढ़े। मतलब यह नहीं है कि हम अमीरुल मोमेनीन की तरह परहेज़गार बन जाएं। क्योंकि न हम बन सकते हैं न हम से इसकी मांग की गयी है लेकिन हमको उन्हीं की राह पर चलना चाहिए यानी फ़ुज़ूलख़र्ची और एक दूसरे की देखादेखी से दूर रहना चाहिए। ऐसी हालत में हम अमीरुल मोमेनीन के शिया कहे जाएंगे। फ़रमाया हैः "हमारे लिए ज़ीनत बनो" हमारे लिए ज़ीनत बनने का क्या मतलब है? मतलब यह है कि तुम्हारा अमल ऐसा हो कि जब कोई तुमको देखे तो कहेः वाह वाह अमीरुल मोमेनीन के शिया कितने अच्छे हैं! अफ़सोस कि हम फ़ुज़ूलख़र्ची का शिकार हैं। हम बरसों से इस बारे में मुसलसल नसीहत करते चले आ रहे हैं ख़ुद अपने आपको, अवाम को और दूसरों को बराबर समझाते रहते हैं और बार-बार कहते हैं, हमें आगे बढ़ना चाहिए और समाज में फ़ुज़ूलख़र्ची को कम करना चाहिए। इमाम ख़ामेनेई 21/09/2016

11/02/2026

दरस-ए-अख़लाक़: फूट, कमज़ोरी और इज़्ज़त गंवाने का सबब है

इस्लामी जगत की पीड़ा के बहुत से कारण हैं। जब हम फूट का शिकार हों, जब एक दूसरे के हमदर्द न हों जब यहाँ तक कि एक दूसरे का बुरा चाहने वाले बन गए हों तो इसका नतीजा यही है। क़ुरआन फ़रमाता हैः "और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करो और आपस में झगड़ा न करो वरना कमज़ोर पड़ जाओगे और तुम्हारी हवा उखड़ जाएगी।" (सूरए अनफ़ाल, आयत-46) जब तुम आपस में झगड़ा करोगे तो कमज़ोरी पैदा हो जाएगी। 'फ़शल' यानी कमज़ोरी "तज़हबा रीहोकुम" का मतलब "तज़हबा इज़्ज़तोकुम" यानी इज़्ज़त गंवा दोगे। फूट का शिकार हुए तो स्वाभाविक तौर पर मिट्टी में मिल जाओगे, ज़लील हो जाओगे, अपने ऊपर ग़ैरों के वर्चस्व की राह समतल कर दोगे। फूट का नतीजा यही है। अमीरुल मोमेनीन ने क़ासेआ नामी ख़ुतबे में अपने सुनने वालों को इतिहास के अध्ययन की दावत दी है। इस ख़ुतबे में आप फ़रमाते हैं: "पिछले लोगों को देखो, जब वे एकजुट थे तो उनको क्या सम्मान हासिल हुआ, कैसी शान हासिल की! लेकिन जब उनके बीच आपस में जुदाई, फूट और दुश्मनी फैल गयी तो अल्लाह ने इज़्ज़त व सम्मान का लेबास उनके तन से उतार लिया। वो इज़्ज़त व मक़ाम उन्हें हासिल था, वो सम्मान जिससे उनकी शोभा बढ़ी हुयी थी और वो नेमतें जो अल्लाह ने उनको दे रखी थीं, फूट की वजह से उनसे छीन ली गयीं।" इमाम ख़ामेनेई 14/10/2022

05/02/2026

दरस-ए-अख़लाक़ःदिल की गहराई से अल्लाह से दुआ, बंद राहों को खोल देती है

हमारे मुल्क में जिस हद तक अध्यात्म से लगाव पैदा हुआ है, निश्चित तौर पर यह हमारे काम में मददगार होगा। ऐसी स्थितियां भी होती हैं जब इंसान किसी चीज़ के सिलसिले में रास्तों को बंद पाता है लेकिन अल्लाह से दिल की गहराई से ध्यान और पैग़म्बरों व इमामों के वसीले से दुआ से कि जिन पर अल्लाह की ख़ास इनायतें हैं, बंद राहें खुल जाती हैं कि हम सब इसे अपनाए रहेंगे इंशाअल्लाह। हम भविष्य को बहुत ही उज्जवल देख रहे हैं और जानते हैं कि अल्लाह के करम से, उसकी ताक़त से इस मुल्क का भविष्य, अतीत की तुलना में हर रुख़ से चाहे वो भौतिक हो या आध्यात्मिक, बेहतर से बेहतर होता जाएगा। इमाम ख़ामेनेई 04/09/2014

28/01/2026

दरस-ए-अख़लाक़: न मग़रूर हों और न घमंड का शिकार हों

बसीज या स्वंयसेवा के कल्चर में ग़ुरूर व घमंड की कोई जगह नहीं है। ये स्वयंसेवियों का कल्चर है। इंसानों को अपनी पोज़ीशन (और हैसियत) के लेहाज़ से कभी कभी कुछ सम्मान और अहमियत मिल जाती है और उसकी एक शख़्सियत बन जाती है। यह कि हम ख़ुद को देखें और पाएं कि हमारा लोग सम्मान करते हैं, हमारे लिए नारे लगाते हैं, हमको आगे रखते हैं, हमारी तारीफ़ करते हैं तो हम ख़ुद पर घमंड करने लगें, ख़ुद को बड़ा समझने लगें, ख़ुद को दूसरों से बेहतर व श्रेष्ठ समझने लगें, यह स्वंयसेवा के कल्चर के ख़िलाफ़ है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने सहीफ़ए सज्जादिया की मकारेमुल अख़लाक़ नामी दुआ में इस बात की ओर से सचेत किया हैः "मुझे लोगों की निगाहों में ऊंचा दर्जा न दे, मगर यह कि उसी हद तक मुझे मेरी नज़रों में गिरा दे" लोगों के बीच जितना ज़्यादा तुम्हारा क़द बढ़ता जाए, उतना ही ज़्यादा अपनी निगाह में तुमको कम होते जाना चाहिए। तुम्हें ग़ुरूर का शिकार नहीं होना चाहिए। इमाम ख़ामेनेई 29/11/2023

21/01/2026

दरस-ए-अख़लाक़ः पाक नीयत से अंजाम दिया गया अमल ही नजात दिलाएगा

परलोक के जीवन में इंसान की मुक्ति पाक नीयत से किए गए अमल पर निर्भर है। अल्लाह के लिए काम करना और कर्म में पाक नीयत होने से नजात मिलेगी। बहुत से मौक़ों पर ऐसा नहीं होता। बहुत से कामों में इंसान सोचता है कि उसने यह काम अल्लाह के लिए किया है, बाद में जब ख़ुद ज़रा इंसाफ़ के साथ ध्यान देता है तो महसूस करता है कि वह अमल पूरी तरह पाक नहीं है। "तुझसे माफ़ी चाहता हूं उन कर्मों के लिए जिनका मक़सद सिर्फ़ तेरी रज़ामंदी थी लेकिन अमल के दौरान दिखावे की चीज़ जो तेरे अलावा के लिए थी, उसमें शामिल हो गयी" यह उन दुआओं में है जो सुबह की नाफ़िले की नमाज़ और सुबह की वाजिब नमाज़ के बीच पढ़ी जाती है। (जिसमें बंदा) कहता हैः ऐ अल्लाह! मैं तौबा करता हूं उस अमल से जो मैंने चाहा था कि सिर्फ़ तेरे लिए अंजाम दूं लेकिन उसमें " दिखावे की चीज़ जो तेरे अलावा के लिए थी, उसमें शामिल हो गयी" ऐसा जज़्बा और ऐसी नियत शामिल हो गई जो अल्लाह के लिए नहीं थी...जिस जगह भी इंसान के लिए अमल में पाक नियत मुमकिन हो, ग़नीमत है। इमाम ख़ामेनेई 02/05/2016

14/01/2026

दरस-ए-अख़लाक़: अल्लाह की राह में ख़र्च करना बुनियादी उसूल है

धन संपत्ति इकट्ठा करना और अल्लाह की राह में ख़र्च न करना, मूल्यों के ख़िलाफ़, एक गुनाह और शायद महापाप है। ऐसा नहीं है कि चूंकि अपनी संपत्ति से कारोबार करना जायज़ है तो उसकी बुनियाद पर इंसान यह हक़ रखता है कि हलाल तरीक़ों से ही क्यों न हो, धन दौलत इकट्ठा करे और बचाता चला जाए, जबकि समाज को उसकी धन संपत्ति, संसाधन और पूंजि की ज़रूरत हो और वो उसे सामाजिक हित और अल्लाह की राह में ख़र्च न करे, यह जायज़ हो, ऐसा नहीं है। इस्लाम में इन्फ़ाक (अल्लाह की राह में ख़र्च) एक बुनियादी उसूल है, अल्लाह की राह में ख़र्च करना चाहिए। यह नहीं कहा गया कि सौदा न कीजिए, पैसा न कमाइये, ये काम कीजिए लेकिन अल्लाह की राह में ख़र्च कीजिए। इमाम ख़ामेनेई 06/11/2009

07/01/2026

दरस-ए-अख़लाक़: ग़फ़लत से बाहर आना अल्लाह की रज़ामंदी हासिल करने की पहली सीढ़ी

हम इंसानों की मुश्किल यह है कि हम अपनी ग़लतियों को भुला देते हैं। सुधार के लिए ज़रूरी मामलों की ओर से लापरवाही, अपने भीतर सुधार की ओर से लापरवाही है। अगर ये लापरवाहियां ख़त्म हो जाएं और इरादा वजूद में आ जाए तो हर चीज़ में सुधार हो जाता है। “तुम पर लाज़िम है कि अपनी जानों की फ़िक्र करो, जो गुमराह है वो तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं सकता” (सूरए मायदा, आयत-105) सभी कोशिशें और सभी जद्दोजेहद इसी लिए हैं कि हम अल्लाह को ख़ुद से राज़ी रख सकें और उस कमाल तक ख़ुद को पहुंचा सकें जो हमारी पैदाइश में हमारे लिए मद्देनज़र रखा गया है। इमाम ख़ामेनेई 30/10/2005

24/12/2025

दरस-ए-अख़लाक़: वक़्त पर नमाज़ और क़ुरआन की तिलावत आत्म-निर्माण के लिए ज़रूरी

आप सभी प्यारे नौजवानों से मेरी सिफ़ारिश, आत्म-निर्माण की है। आत्म-निर्माण बहुत अहम है, व्यक्तिगत पहलू से भी और सामाजिक पहलू से भी। क़ुरआन से लगाव, क़ुरआन के साथ संपर्क, नमाज़ में ध्यान, नमाज़ को वक़्त पर पढ़ना, दुआओं पर ध्यान, ये सब चीज़ें मेरी नज़र में आत्म-निर्माण के लिए ज़रूरी हैं। ये ग़लतियों के वक़्त आपको सही सलामत गुज़रने में मदद करती हैं। डर लड़खड़ाने की एक मंज़िल है, संदेह लड़खड़ाने की एक मंज़िल है, कमज़ोरी का एहसास लड़खड़ाने की एक मंज़िल है, अनुचित प्रेरणा लड़खड़ा जाने की एक मंज़िल है, ग़लतियों और बहकने के बहुत से अवसर हमारी राह में पाए जाते हैं ख़ास तौर पर सामाजिक मामलों में काम करने वालों के लिए। इसलिए इन लोगों को आत्म-निर्माण की ज़्यादा ज़रूरत है और वो इस बात के ज़रूरतमंद हैं कि अपनी आत्मिक व मानसिक बुनियादों को मज़बूत करें। मेरी नज़र में जब आपकी आत्मिक व मानसिक बुनियादें मज़बूत होंगी तो वैचारिक मैदान में भी, फ़ैसले करने के मैदान में भी और व्यवहारिक मैदान में भी आप अपने भीतर ज़्यादा ताक़त व क्षमता पैदा कर लेंगे और हमें अपनी नौजवान नस्ल में इन चीज़ों की ज़रूरत है। इमाम ख़ामेनेई 17/05/2020

18/12/2025

दरस-ए-अख़लाक़ः नौजवान, नमाज़ से आत्मिक ताज़गी हासिल करता है

नमाज़ से नौजवान का दिल प्रकाशमान हो जाता है, वह उम्मीद हासिल करता है, आत्मिक ताज़गी हासिल करता है, ख़ुशी हासिल करता है। इस स्थिति का संबंध नौजवानों से है और ज़्यादातर जवानी के दिनों से इसका संबंध है, वे इसका आनंद ले सकते हैं। अगर अल्लाह हमको और आपको तौफ़ीक़ दे कि पूरे ध्यान के साथ नमाज़ पढ़ सकें तो देखेंगे कि पूरे ध्यान से पढ़ी जाने वाली नमाज़ से इंसान का दिल नहीं भरता। इंसान जिस वक़्त पूरे ध्यान के साथ नमाज़ पढ़ता तो उसको वो आनंद मिलता है जो किसी भी भौतिक चीज़ में नहीं मिलता। ये ध्यान का नतीजा है। नमाज़ में ध्यान न होना और नमाज़ पढ़ते वक़्त सुस्ती, पाखंडियों की निशानियों में से है। जो लोग नौजवानी से ही नमाज़ पढ़ते हैं और पूरे ध्यान से नमाज़ पढ़ते हैं, ये चीज़ उनके अख़लाक़ और अच्छी आदतों का हिस्सा बन जाती है और फिर उनको नमाज़ में (ध्यान लगाने में) मुश्किल नहीं होती। ज़िन्दगी के आख़िरी हिस्से तक हमेशा अच्छी तरह नमाज़ अदा करते हैं। इमाम ख़ामेनेई 19/11/2008

10/12/2025

दरस-ए-अख़लाक़ः पैग़म्बर की शरीयत और कुरान की शिक्षाएं मानवता की पीड़ाओं का इलाज हैं

अंधेरा वह सब चीज़ें हैं जो पूरी तारीख़ में इन्सानों की ज़िंदगियों में अंधेरे भरती रही हैं, उनकी ज़िदंगी में कड़वाहट और ज़हर भरती रही हैं, यह अंधेरे हैं। जेहालत अंधेरा है, ग़रीबी अंधेरा है, ज़ुल्म अंधेरा है, भेदभाव अंधेरा है, ख़्वाहिशों में डूब जाना, अंधेरा है, नैतिक भ्रष्टाचार, सामाजिक बुराइयां, यह सब अंधेरे हैं। यह वो अंधेरे हैं जिनसे पूरी तारीख़ में इन्सानियत ने तकलीफ़ें उठायी हैं। ईमान न होना अंधेरा है, लक्ष्यहीनता होना अंधेरा है, यह इन्सानियत की गहरी तकलीफ़ें हैं। पैग़म्बरे इस्लाम ने इन तकलीफ़ों का इलाज, रूहानी इलाज और व्यवहारिक यानी अमल से किया जाना वाला इलाज इन्सानियत के सामने पेश किया है। इमाम ख़ामेनेई 3 अक्तूबर 2023

03/12/2025

दरस-ए-अख़लाक़: दुआ ज़िन्दगी की मुश्किलों में इंसान के दिल को मज़बूत रखती है

दुआ, दिल में अल्लाह से इश्क़ बरक़रार रखती है। सभी भलाइयों और अच्छाइयों का स्रोत अल्लाह की पाक ज़ात है। दुआ और अल्लाह से बात व लगाव, यह मोहब्बत इंसान के दिल में पैदा कर देती है। दुआ ज़िन्दगी की मुश्किलों के सामने इंसान को सब्र व हौसला देती है। हर वो शख़्स जो अपनी ज़िन्दगी के दौरान किसी दुर्घटना का शिकार होता है, मुश्किलें और कठिनाइयां उसे घेर लेती है। दुआ इंसान को ताक़त व सामर्थ्य देती है और इंसान को हादेसात के समय ताक़त व दृढ़ता देती है। इसलिए रिवायतों में दुआ को मोमिन का हथियार कहा गया है। इमाम ख़ामेनेई 21/10/2005  

26/11/2025

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अंतिम जीत, जो ज़्यादा दूर नहीं, फ़िलिस्तीनी जनता और फ़िलिस्तीन की होगी। 

03/11/2023

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  • Iraqi tribal sheikhs welcomed in Mashhad, with a greeting from the Leader conveyed to them
  • The face of deception: The US and the crimes it dares to defend
  • Martyr Imam Khamenei believed that Al-Aqsa Flood would have far-reaching impacts
Français
  • Le magazine « Le Bon Côté de l’Histoire », n° 35
  • Accueil des cheikhs des tribus irakiennes à Machhad, avec le message de bienvenue du Guide de la Révolution
  • L’irrationalité des dirigeants américains
Español
  • Irreparable: crónica de los fracasos del régimen sionista
  • El día que estuve contigo
  • La sepultura purificada del Líder mártir de la Revolución Islámica y de los mártires de su familia
Русский
  • Ослабление США — не лозунг!
  • Карта мира снова меняется!
  • Показатели мощи США — в свободном падении!
हिंदी
  • यहाँ आने वाले सभी अज़ीज़ों को सलाम...
  • इस्लामी इंक़ेलाब के शहीद रहबर के रौज़े के पास "अमरीका मुर्दाबाद", "इस्राईल मुर्दाबाद" के नारे
  • अमरीकियों को आज्ञाकारी नौकर चाहिए
Azəri
  • Zəncanda 80 şairin iştirakı ilə "Şəhid Ağa" adlı beynəlxalq şeir gecəsi keçirilib
  • İnqilabın Ali Rəhbərinin Müqəddəs Müdafiə Həftəsi və şəhid Seyid Həsən Nəsrullahın şəhadətinin ildönümü münasibətilə müraciəti
  • İslam İnqilabı Rəhbərinin "İranın şəhid Ağası"nın vida və dəfn mərasimi münasibətilə müraciəti
العربية
  • تكريمٌ لأهل الوفاء.. شيوخ العشائر في رحاب الرضا (ع)
  • الإمام الشهيد السيد علي الخامنئي.. قلبٌ معلّق بالزهراء (سلام الله عليها) ومجالسٌ عامرةٌ بذكرها
  • عند مضجع القائد الشهيد.. عزاءٌ يفيضُ وفاء
اردو
  • یہاں آنے والے سبھی عزیزوں کو سلام...
  • رہبر شہید انقلاب اسلامی کے مزار کے جوار میں "امریکا مردہ باد" اور "اسرائیل مردہ باد" کے نعرے
  • "کشور دوست کے میڈل جیتنے والے" پروگرام میں سائنس اور اسپورٹس کے میدانوں میں تمغے جیتنے والوں کے اعزاز میں تقریب کا آغاز

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