दरस-ए-अख़लाक़: समाज में फ़ुज़ूलख़र्ची कम होनी चाहिए

हमारा समाज अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम की परहेज़गारी की दिशा में आगे बढ़े। मतलब यह नहीं है कि हम अमीरुल मोमेनीन की तरह परहेज़गार बन जाएं। क्योंकि न हम बन सकते हैं न हम से इसकी मांग की गयी है लेकिन हमको उन्हीं की राह पर चलना चाहिए यानी फ़ुज़ूलख़र्ची और एक दूसरे की देखादेखी से दूर रहना चाहिए। ऐसी हालत में हम अमीरुल मोमेनीन के शिया कहे जाएंगे। फ़रमाया हैः "हमारे लिए ज़ीनत बनो" हमारे लिए ज़ीनत बनने का क्या मतलब है? मतलब यह है कि तुम्हारा अमल ऐसा हो कि जब कोई तुमको देखे तो कहेः वाह वाह अमीरुल मोमेनीन के शिया कितने अच्छे हैं! अफ़सोस कि हम फ़ुज़ूलख़र्ची का शिकार हैं। हम बरसों से इस बारे में मुसलसल नसीहत करते चले आ रहे हैं ख़ुद अपने आपको, अवाम को और दूसरों को बराबर समझाते रहते हैं और बार-बार कहते हैं, हमें आगे बढ़ना चाहिए और समाज में फ़ुज़ूलख़र्ची को कम करना चाहिए। इमाम ख़ामेनेई 21/09/2016

हमारा समाज अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम की परहेज़गारी की दिशा में आगे बढ़े। मतलब यह नहीं है कि हम अमीरुल मोमेनीन की तरह परहेज़गार बन जाएं। क्योंकि न हम बन सकते हैं न हम से इसकी मांग की गयी है लेकिन हमको उन्हीं की राह पर चलना चाहिए यानी फ़ुज़ूलख़र्ची और एक दूसरे की देखादेखी से दूर रहना चाहिए। ऐसी हालत में हम अमीरुल मोमेनीन के शिया कहे जाएंगे। फ़रमाया हैः "हमारे लिए ज़ीनत बनो" हमारे लिए ज़ीनत बनने का क्या मतलब है? मतलब यह है कि तुम्हारा अमल ऐसा हो कि जब कोई तुमको देखे तो कहेः वाह वाह अमीरुल मोमेनीन के शिया कितने अच्छे हैं! अफ़सोस कि हम फ़ुज़ूलख़र्ची का शिकार हैं। हम बरसों से इस बारे में मुसलसल नसीहत करते चले आ रहे हैं ख़ुद अपने आपको, अवाम को और दूसरों को बराबर समझाते रहते हैं और बार-बार कहते हैं, हमें आगे बढ़ना चाहिए और समाज में फ़ुज़ूलख़र्ची को कम करना चाहिए। 

इमाम ख़ामेनेई

21/09/2016

11/02/2026

दरस-ए-अख़लाक़: समाज में फ़ुज़ूलख़र्ची कम होनी चाहिए