शादी की उम्र का मसला भी, जिस पर इस्लामी किताबों में ताकीद की गयी है कि शादी की उम्र कहीं ज़्यादा न हो जाए और जवानों को जल्दी शादी कर लेनी चाहिए, अख़लाक़ी बुराइयों के ख़तरे से बचाने के लिए है। अलबत्ता इसका मतलब यह नहीं है कि कम उम्र में शादी कर दी जाए, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, जी नहीं, जवान लड़के और लड़कियां, मर्द और औरत जहाँ तक हो सके सही वक़्त पर शादी कर लें तो यह इस्लाम की नज़र में ज़्यादा पसंदीदा है, ख़ुद उनके लिए भी निश्चित तौर पर बेहतर है और समाज के लिए भी बहुत अच्छा है। इसलिए जब हम हेजाब के मसले को देखें तो इसे औरत को वंचित करने वाले साधन की नज़र से न देखें। यह अस्ल में एक संपत्ति है, हेजाब सुरक्षा मुहैया करता है, सुरक्षा देता है। इमाम ख़ामेनेई 27/12/2023
21/02/2026
अगर फ़ैमिली में औरत को मनोवैज्ञानिक व नैतिक नज़र से सुरक्षा हासिल हो, सुकून व इत्मेनान हो तो हक़ीक़त में शौहर उसके लिए लेबास समझा जाता है जैसा कि वह शौहर के लिए लेबास है। जैसा कि क़ुरआन मजीद ने मुतालबा किया है कि उनके दरमियान मोहब्बत और लगाव रहे और फ़ैमिली में "औरतों के लिए भी वैसे ही हुक़ूक़ हैं जैसे मर्दों के हैं।" (सूरए बक़रह, आयत-228) अगर औरत, अपने घर में अपने अस्ल मोर्चे पर अपने मसलों को कम कर सके तो निश्चित तौर पर वह सामाजिक सतह पर भी यह काम कर सकेगी। इमाम ख़ामेनेई 04/01/2012
14/02/2026
अगर नस्लें अपने मानसिक व वैचारिक नतीजे, बाद की नस्लों के मन में बिठाना चाहती हैं और समाज अपने अतीत से फ़ायदा उठाना चाहता है तो यह सिर्फ़ घर और परिवार के ज़रिए मुमकिन है। घर के माहौल में ही सबसे पहले एक शख़्स की पूरी शख़्सियत व हैसियत, उस समाज की सांस्कृतिक बुनियादों पर वजूद में आती है और यह माँ बाप ही हैं जो सीधे तौर पर किसी भी क़िस्म के दिखावे से दूर, बिलकुल स्वाभाविक अंदाज़ में इंसान के मन, विचार और व्यवहार पर असर डालते हैं और अपनी मालूमात, आइडियालोजी और आस्था वग़ैरह को अपनी बाद की नस्लों के मन में बिठाते हैं। इमाम ख़ामेनेई 04/01/2001
13/02/2026
औरत की एक सबसे अहम ज़िम्मेदारियों में घर की देखभाल है। सब जानते हैं कि मैं महिलाओं की राजनैतिक व सामाजिक सरगर्मियों के ख़िलाफ़ नहीं हूं, इसमें कोई हरज नहीं है। लेकिन अगर 'घरदारी' को गिरी नज़रों से देखने लगें तो यह गुनाह होगा, घरदारी एक काम है, बहुत अहम काम है, सबसे ज़्यादा अहम व गंभीर काम, भविष्य बनाने वाला काम है, माँ बनना बहुत महान काम है। हम लोगों से सोच विचार से काम न लेने की वजह से एक ग़लती हो गयी। मुल्क में एक दौर ऐसा भी गुज़रा कि अफ़सोस! इस मसले में लापरवाही हो गयी और आज हम उसके ख़तरों को अपनी आँखों से देख रहे हैं। इमाम ख़ामेनेई 01/05/2013
24/01/2026
इस्लाम ने सही मानी में औरत को सम्मान दिया है। अगर उसने घर में माँ के रोल और माँ के सम्मान पर बल दिया है या घर के दायरे में रह कर एक महिला के घरेलू रोल, प्रभाव, अधिकार व फ़रीज़े तथा सीमाओं पर ताकीद है तो इसका मतलब हरगिज़ यह नहीं है कि इस्लाम एक महिला को सामाजिक मामलों मे, सामाजिक जिद्दोजेहद में भाग लेने और पब्लिक सरगर्मियों में शामिल होने से मना करता है। उसको एक अच्छी माँ और एक अच्छी बीवी भी होना चाहिए और सामाजिक मामलों में भी भाग लेना चाहिए। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा इसी तरह की सामाजिक शख़्सियत का प्रतीक हैं और हज़रत ज़ैनबे कुबरा सलामुल्लाह में मुख़्तलिफ़ पहलुओं का इकट्ठा होना एक और नमूना है। इमाम ख़ामेनेई 27/07/2005
17/01/2026
पुराने ज़माने में ज़्यादातर कहा जाता था कि लड़की को निभाना चाहिए, जैसे वो इस बात को मानते ही नहीं थे कि लड़के को भी निभाना चाहिए। नहीं! इस्लाम यह बात नहीं कहता; इस्लाम कहता है कि लड़की और लड़के दोनों को निभाना चाहिए। दोनों को एक दूसरे के सार्थक पहूल को देखना चाहिए और यह तय करना चाहिए कि घरेलू ज़िन्दगी एक दूसरे से इश्क़ व मोहब्बत के साथ, पूरी तरह इत्मेनान, सुकून और पारदर्शी तरीक़े से गुज़ारेंगे, जारी रखेंगे और इसकी हिफ़ाज़त करेंगे। अगर ऐसा हो गया जो कि इंशाअल्लाह इस्लामी तरबियत के साथ मुश्किल भी नहीं है तो ऐसी फ़ैमिली वैसी स्वस्थ फ़ैमिली होगी जैसी इस्लाम चाहता है। इमाम ख़ामेनेई 2/08/1995
10/01/2026
घर से बाहर के काम में मसरूफ़ होने की वजह से औरतें, बच्चों की पैदाइश से दामन बचाती हैं और इंसानी फ़ितरत के बरख़िलाफ़, ज़नाना जज़्बात का गला घोंटती हैं, अल्लाह उनके इस काम से राज़ी नहीं है। जो औरतें बच्चों की पैदाइश, औलाद की परवरिश, बच्चे को दूध पिलाने और मोहब्बत से अपनी गोद में पालने और बड़ा करने पर दूसरे कामों को, जो उनके बिना भी अंजाम पा सकते हैं, प्राथमिकता देती हैं, एक बड़ी ग़लती का शिकार हैं। इंसान के बच्चे की तरबियत का बेहतरीन तरीक़ा यह है कि माँ की मोहब्बत के साए में परवरिश पाए। वो औरतें जो अपनी औलाद को इस तरह की अल्लाह की नेमत से वंचित रखती हैं, ग़लती का शिकार हैं। उनकी वजह से औलाद को भी नुक़सान पहुंचता है, ख़ुद भी नुक़सान उठाती हैं और समाज का भी नुक़सान करती हैं। इमाम ख़ामेनेई 10/03/1997
03/01/2026
इंसान ने जाहेलियत के ख़िलाफ़, जो औरत पर ज़ुल्म किया करती थी, जद्दोजेहद की, अध्यात्म, विचार और मानवीय मूल्यों के मैदान में भी, राजनैतिक मैदान में मौजूदगी के लेहाज़ से भी और सबसे बढ़कर परिवार की सतह पर भी। अध्यात्म के मैदान में औरत, तरक़्क़ियों की ओर इंसान के रूहानी सफ़र में आगे आगे रहने वालों में है। इस्लाम औरत की बैअत, औरत के मालिक होने और मूल राजनैतिक व सामाजिक मैदानों में औरत की भागीदारी का पूरी तरह समर्थन करता है। घर के भीतर इस्लामी नज़र से मर्द का फ़रीज़ा है कि वह औरत की एक फूल की तरह देखभाल करे। इमाम ख़ामेनेई 24/08/2000
27/12/2025
एक दूसरे के प्रति मियां-बीवी की आपसी ज़िम्मेदारियां अलग अलग हैं लेकिन इनमें संतुलन पाया जाता है। अल्लाह क़ुरआन में सूरए बक़रह की आयत 228 में इरशाद फ़रमाता हैः “और दस्तूरे शरीअत के मुताबिक़ औरतों के कुछ हुक़ूक़ हैं जिस तरह मर्दों के हुक़ूक़ हैं” जितना हक़ उन (बीवियों) का है उतना ही हक़ उनके (शौहरों) का है यानी जितनी एक बात हक़ के तौर पर उन (औरतों) से संबंधित है उतनी ही एक बात उनके सामने वाले पक्ष (पुरूष) से भी संबंध रखती है, मतलब यह कि उनके भी कांधों पर उतनी ही ज़िम्मेदारी है। यानी किसी पर जो भी ज़िम्मेदारी डाली गयी है उसके बदले में उसे एक हक़ भी दिया गया है। जिसे भी जो विशेष हक़ दिया गया है उसके मुक़ाबले में एक ज़िम्मेदारी भी रखी गयी है, पूरी तरह से संतुलन। इमाम ख़ामेनेई 04/01/2023
06/12/2025
घराने में औरत कभी बीवी की भूमिका में सामने आती है, कभी माँ की भूमिका में सामने आती है। इनमें से हर एक की अपनी विशेषताएं हैं। पत्नी की भूमिका में औरत सबसे पहले आराम और शांति की प्रतीक है: और अल्लाह ने इंसान की जिंस से ही उसका जोड़ा बनाया ताकि वह उसके साथ आराम और शांति हासिल करे। (सूरए रअद, आयत 189) आराम और शांति! क्योंकि जीवन उथल-पुथल और उलझनों से भरा है। जीवन के इस बहाव में मर्द काम-काज की व्यस्तताओं और चिंताओं में उलझा होता है। जब वह घर आता है तो उसे आराम और शांति की ज़रूरत होती है। वह चैन व सुकून चाहता है। यह चैन व सुकून, पत्नी घर में पैदा करती है: "लेयस्कुने इलैहा" (यानी) मर्द, औरत के पहलू में आराम और शांति महसूस करे। औरत आराम व चैन का स्रोत है। औरत, बीवी के रूप में, पूरी तरह प्रेम, आराम और शांति है ... शहीदों की पत्नियों की किताबें पढ़िए, प्रेम, आराम और शांति उनमें अच्छी तरह दिखाई देती है। इमाम ख़ामेनेई 2 फ़रवरी 2023
29/11/2025
लड़का और लड़की, दुल्हन और दूल्हा आपस में मोहब्बत के रिश्ते को मज़बूत करें क्योंकि मोहब्बत वह बंधन है जो उनको एक दूसरे के साथ बांधे रखता है, दोनों को एक दूसरे से जोड़े रखता है और उन्हें जुदा होने से बचाता है, मोहब्बत बहुत अच्छी चीज़ है। मोहब्बत होगी तो वफ़ादारी भी होगी, बेवफ़ाई, ख़ुदग़र्ज़ी और बेवफ़ाई उनके बीच नहीं होगी। मोहब्बत होगी तो माहौल में मिठास होगी। माहौल ख़ुशगवार, सहन करने और फ़ायदा उठाने के लायक़ हो जाएगा। इमाम ख़ामेनेई 15/12/1997
25/11/2025
लड़का और लड़की, दुल्हन और दूल्हा आपस में मोहब्बत के रिश्ते को मज़बूत करें क्योंकि मोहब्बत वह बंधन है जो उनको एक दूसरे के साथ बांधे रखता है, दोनों को एक दूसरे से जोड़े रखता है और उन्हें जुदा होने से बचाता है, मोहब्बत बहुत अच्छी चीज़ है। मोहब्बत होगी तो वफ़ादारी भी होगी, बेवफ़ाई, ख़ुदग़र्ज़ी और बेवफ़ाई उनके बीच नहीं होगी। मोहब्बत होगी तो माहौल में मिठास होगी। माहौल ख़ुशगवार, सहन करने और फ़ायदा उठाने के लायक़ हो जाएगा। इमाम ख़ामेनेई 15/12/1997
22/11/2025