इस्लामी घरानाः इंसान की शख़्सियत समाज की संस्कृति की बुनियाद पर घर के माहौल में बनती है

अगर नस्लें अपने मानसिक व वैचारिक नतीजे, बाद की नस्लों के मन में बिठाना चाहती हैं और समाज अपने अतीत से फ़ायदा उठाना चाहता है तो यह सिर्फ़ घर और परिवार के ज़रिए मुमकिन है। घर के माहौल में ही सबसे पहले एक शख़्स की पूरी शख़्सियत व हैसियत, उस समाज की सांस्कृतिक बुनियादों पर वजूद में आती है और यह माँ बाप ही हैं जो सीधे तौर पर किसी भी क़िस्म के दिखावे से दूर, बिलकुल स्वाभाविक अंदाज़ में इंसान के मन, विचार और व्यवहार पर असर डालते हैं और अपनी मालूमात, आइडियालोजी और आस्था वग़ैरह को अपनी बाद की नस्लों के मन में बिठाते हैं। इमाम ख़ामेनेई 04/01/2001

अगर नस्लें अपने मानसिक व वैचारिक नतीजेबाद की नस्लों के मन में बिठाना चाहती हैं और समाज अपने अतीत से फ़ायदा उठाना चाहता है तो यह सिर्फ़ घर और परिवार के ज़रिए मुमकिन है। घर के माहौल में ही सबसे पहले एक शख़्स की पूरी शख़्सियत व हैसियतउस समाज की सांस्कृतिक बुनियादों पर वजूद में आती है और यह माँ बाप ही हैं जो सीधे तौर पर किसी भी क़िस्म के दिखावे से दूरबिलकुल स्वाभाविक अंदाज़ में इंसान के मनविचार और व्यवहार पर असर डालते हैं और अपनी मालूमातआइडियालोजी और आस्था वग़ैरह को अपनी बाद की नस्लों के मन में बिठाते हैं।
इमाम ख़ामेनेई
04/01/2001

13/02/2026

इस्लामी घरानाः इंसान की शख़्सियत समाज की संस्कृति की बुनियाद पर घर के माहौल में बनती है