निश्चित तौर पर असत्य पर चलने वाले गिरोहों का लक्ष्य 'अय्यामुल्लाह' पर पर्दा डालना या इस तरह के वाक़यात के रंग को फीका बना देना है। (वो चाहते हैं कि) 11 फ़रवरी (इस्लामी इंक़ेलाब की सालगिरह) के दिन को छिपा दें, 3 नवंबर (अमरीकी जासूसी के अड्डे पर क़ब्ज़े) के दिन को, 9 जनवरी (11 मोहर्रम को क़ुम के अवाम के क़त्ले आम) के दिन को, 29 दिसंबर के (यादगार) दिन को और 17 फ़रवरी तबरेज़ की घटना के दिन को, शहीद सुलैमानी के जनाज़े के जुलूस के दिन को, शहीद होजजी के जनाज़े के जुलूस के दिन को, जो सबके सब 'अय्यामुल्लाह' (ऐतिहासिक दिन) हैं, मिटा दें और इतिहास से ख़त्म कर दें। इनमें हर दिन एक मशाल है जिसे असत्य के मोर्चे की नज़र में बुझा दिया जाना चाहिए। यह क़ुरआन मजीद की शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है। क़ुरआन ने इस तरह के दिनों की याद और ज़िक्र को बाक़ी रखने का हुक्म दिया है। "ऐ पैग़म्बर! इस किताब में मरयम का ज़िक्र कीजिए जब वो अपने घरवालों से अलग होकर (बैतुल मुक़द्दस) के एक पूर्वी मक़ाम पर गयीं" (सूरए मरयम, आयत-16) हज़रत मरयम का अहम वाक़ेया भुलाया नहीं जाना चाहिए। इसे इतिहास में बाक़ी रहना चाहिए। शायद दस से ज़्यादा बार क़ुरआन में इस तरह आया हैः 'याद करो, याद करो...' यह क़ुरआन का तरीक़ा है। इमाम ख़ामेनेई 09/01/2023
23/02/2026
बदलाव लाने की एक शर्त दुश्मन और दुश्मनियों से न डरना है। सर्वशक्तिमान अल्लाह ने पैग़म्बरे इस्लाम से फ़रमाया हैः "और आप लोगों (के ताने) से डर रहे थे हालांकि अल्लाह इस बात का ज़्यादा हक़दार है कि आप उससे डरें।" (सूरए अहज़ाब, आयत-37) लोगों से डरना नहीं चाहिए, उनकी बातों से ख़ौफ़ज़दा नहीं होना चाहिए। हर अच्छे और सार्थक काम और हर अहम काम के लिए मुमकिन है कि कुछ लोगों के विरोध का सामना करना पड़े। आज साइबर स्पेस के दौर में मुख़ालेफ़त का रूप भी ज़्यादातर कठोर और कष्टदायक हो गया है। अगर कोई काम सही, अहम, ठोस और नपे तुले अंदाज़ में अंजाम पा रहा है तो इन बातों का ख़याल नहीं करना चाहिए। बाहरी दुश्मन की भी परवाह नहीं करनी चाहिए। हर वो काम जो मुल्क में भलाई की ओर किया जाए, दुश्मन की ओर से उसके ख़िलाफ़ एक बड़ा मोर्चा खुल जाता है क्योंकि ये लोग इसी सोच में बैठे रहते हैं कि कहाँ से चोट पहुंचाएं, वैचारिक मैदानों में भी और व्यवहारिक मैदानों में भी। उनका वैचारिक मोर्चा यह है कि जब भी मुल्क में कुछ अहम, सही व तार्किक फ़ैसले लिए जाते हैं ये अपने व्यापक प्रोपैगंडों से उन पर तरह तरह के सवाल खड़े कर दे और उस प्रचारिक साम्राज्य के ज़रिए जो ज़ायोनियों के हाथ में है, इन्हें दबा दे और तबाह कर दे। इमाम ख़ामेनेई 03/06/2020
16/02/2026
इंसान अगर सही दिशा में क़दम उठाएं तो सही दिशा में आगे बढ़ेंगे और अगर ग़लत राह पर लग जाएं तो ग़लत राहों पर ही बढ़ते चले जाएंगे। क़ुरआन में इन दोनों ही बातों की ओर इशारा मौजूद है। सूरए राद (की आयत 11) में इरशाद होता हैः "बेशक अल्लाह किसी क़ौम की उस हालत को नहीं बदलता जो उसकी है जब तक क़ौम ख़ुद अपनी हालत को न बदले।" आयत में सार्थक पहलू को बयान किया गया है, यानी जब आप ख़ुद अपने भीतर सही बदलाव लाएंगे तो अल्लाह भी आपकी ज़िन्दगी में सार्थक घटनाएं व हक़ीक़तें वजूद में लाएगा। दूसरे पहलू की ओर सूरए अनफ़ाल (की 53वीं आयत) में इशारा हुआ हैः "ये इस बिना पर है कि अल्लाह कभी उस नेमत को तबदील नहीं करता जो उसने किसी क़ौम को अता की है जब तक कि वो ख़ुद अपनी हालत तबदील न कर दें।" ये नकारात्मक पहलू है, ये पीछे हटने का पहलू है कि अगर अल्लाह ने किसी क़ौम को कोई नेमत दी और उसने सही दिशा में क़दम नहीं उठाया और सही काम अंजाम नहीं दिए तो अल्लाह उस नेमत को उनसे छीन लेता है। इमाम ख़ामेनेई 03/06/2020
09/02/2026
पैग़म्बरे इस्लाम की पैग़म्बरी से मिलने वाला एक बहुत ही अहम ख़ज़ाना, जिसकी ओर अफ़सोस कि ज़्यादा ध्यान नहीं दिया जाता, दुष्ट लोगों के मुक़ाबले में दृढ़ता और अभेद्य होना है। मानव समाज को जो नुक़सान पहुंचा है, उनमें से एक उनके दुश्मनों का उनके बीच पैठ बना लेना है कि जिसका ज़िक्र पवित्र क़ुरआन में आया हैः "वो काफ़िरों पर सख़्त हैं" (सूरए-फ़तह, आयत-29) इस आयत में 'अशिद्दा' शब्द आया है जिसका मतलब अमल में सख़्ती नहीं है। 'अशिद्दा' उस मानी में कि जिसे फ़ारसी में कर्म करने में शिद्दत कहते हैं, नहीं है। 'अशिद्दा' यानी सख़्त होना, मज़बूत होना, अभेद्य होना, 'अशिद्दा' का यह मतलब है। 'अशिद्दाओ अलल कुफ़्फ़ार' यानी काफ़िरों को इजाज़त न देना कि वो समाज में पैठ बनाएं। इमाम ख़ामेनेई 18/02/2023
02/02/2026
आपने अगर संघर्ष किया और दृढ़ता दिखाई तो अल्लाह की ताक़त आपके साथ होगी। वो लश्कर जिसका अल्लाह मददगार न हो वो कुछ नहीं कर सकता। एक ऐसा लश्कर जिसकी पीठ मज़बूत है, जिसके पास रिज़र्व फ़ोर्स है, अथाह ताक़त का भंडार है, वो सारे काम कर सकता है। एक ऐसा लश्कर जिसकी पीठ मज़बूत है, उसके पीठ पर अल्लाह की ताक़त हो तो क्या ऐसा लश्कर हार सकता है? इसी उसूल के तहत साम्राज्यवाद के क़ब्ज़े में मौजूद सभी सरज़मीनें आज़ाद हो सकती हैं, इसी उसूल के तहत फ़िलिस्तीन भी आज़ाद हो सकता है, इसी उसूल पर अमल से कोई भी राष्ट्र कमज़ोर न रहेगा...अल्लाह की ताक़त उनकी पीठ पर होती है जो मैदान में उतर पड़ते हैं, क़दम बढ़ाते हैं और कोशिश करते हैं, ख़ुद को सभी हालात के लिए तैयार कर लेते हैं। ये लोग अल्लाह की ताक़त पर भरोसा करते हैं। "यह इसलिए है कि अल्लाह अहले ईमान का सरपरस्त है और जो काफ़िर हैं उनका कोई सरपरस्त और कारसाज़ नहीं है" (सूरए मोहम्मद, आयत-11) इमाम ख़ामेनेई 23/5/2016
26/01/2026
अल्लाह फ़रमाता हैः "यह एक किताब है जो हमने आप पर इसलिए नाज़िल की है कि आप लोगों को उनके परवरदिगार के हुक्म से (कुफ़्र की) तारीकियों से निकाल कर (ईमान की) रौशनी की तरफ़ लाएं" (सूरए इब्राहीम, आयत-1) हमने आप पर यह किताब नाज़िल की है कि इंसानों को आप अंधकार से निकाल कर रौशनी तक पहुंचा दें। अंधकार क्या है? अंधकार में वो सभी चीज़ें आती हैं जिनसे पूरे इतिहास में इंसान की ज़िन्दगी कड़ुवाहट से भर गयी, ज़हरीली हो गयी। ये सब अंधकार हैं। जेहालत, यानी अंधकार, ग़रीबी यानी अंधकार, ज़ुल्म यानी अंधकार, भेदभावपूर्ण रवैया अंधकार है, इच्छाओं का ग़ुलाम हो जाना अंधकार है, अख़लाक़ी बुराइयां और सामाजिक ऐब ये सब अंधकार हैं। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि वआलेही वसल्लम ने इन सभी मुद्दों का हल, वैचारिच हल और व्यवहारिक हल भी मानवता के सामने पेश किया है। अगर इन मुद्दों से छुटकारा पाना चाहते हो तो इलाज यह है। पैग़म्बरे इस्लाम की शरीअत और क़ुरआन की शिक्षाएं, मानवीय मुद्दो का हल हैं। यह पैग़म्बरे इस्लाम ने मानवता के सामने पेश किया है। इमाम ख़ामेनेई 03/10/2023
19/01/2026
ताक़त में वृद्धि के संबंध में सिर्फ़ इस बात को न देखें कि हम हथियारों का भंडार बढ़ा रहे हैं, हथियारों की तादाद ज़्यादा कर रहे हैं और नई नई ईजाद कर रहे हैं, बल्कि इस में मुल्क की डिटरेंस ताक़त भी शामिल है, मुल्क की सुरक्षा को बनाए रखना भी है। दुश्मन को एहसास हो कि आप कमज़ोर हैं तो उसमें हमले की हिम्मत पैदा होती है और जब उसको एहसास हो कि आप ताक़तवर हैं तो हमले का इरादा रखता हो तो अपने फ़ैसले पर फिर से ग़ौर करने पर मजबूर हो जाता है। इसीलिए अल्लाह ने फ़रमाया हैः "ताकि तुम उस (जंगी तैयारी) से अल्लाह के दुश्मन और अपने दुश्मन को ख़ौफ़ज़दा कर सको" (सूरए अन्फ़ाल, आयत-60) यह तादाद और ताक़त जिस पर क़ुरआन में बल दिया गया है "अल्लाह के दुश्मन को ख़ौफ़ज़दा कर सको" इससे मुल्क में अमन व सुरक्षा क़ायम होती है, इसलिए आप देख सकते हैं कि काफ़ी मुद्दत तक बार बार कहा करते थे कि फ़ौजी कार्यवाही का विकल्प मेज़ पर मौजूद है। (अब) एक मुद्दत हो गयी यह बात ज़बान पर नहीं लाते, इसमें कोई असर नहीं रहा, ये बात मूल्यहीन हो गयी। इमाम ख़ामेनेई 21/08/2023
12/01/2026
इस्लामी दुनिया यह न भूले कि इस अहम व निर्णायक मसले में इस्लाम के मुक़ाबले में, मुस्लिम क़ौम के मुक़ाबले में, मज़लूम फ़िलिस्तीन के मुक़ाबले में जो खड़ा है वह अमरीका है, फ़्रांस है, ब्रिटेन है। यह इस्लामी जगत न भूले, इसे समझे! अपने लेन-देन में, अपने मामलों में, अपनी समीक्षाओं में यह न भूले कि कौन खड़ा है और उन मज़लूम अवाम और मज़लूम क़ौम पर ज़ुल्म कर रहा है। यह सिर्फ़ ज़ायोनी सरकार नहीं है। अलबत्ता हमें शक नहीं “अल्लाह का वादा सच्चा है और जो लोग यक़ीन नहीं रखते वो आपको (जोश दिलाकर) बेबर्दाश्त न कर दें।” (सूरए रूम-आयत-60) जिन लोगों को अल्लाह के वादे पर यक़ीन नहीं होता वो अपनी बदगुमानियों से आपको डिगा न दें, आपका इरादा कमज़ोर न कर दें। इंशाअल्लाह निश्चित फ़तह जो ज़्यादा दूर नहीं, फ़िलिस्तीन के अवाम और फ़िलिस्तीन की होगी। इमाम ख़ामेनेई 1/11/2013
05/01/2026
भविष्य अगर किसी का है तो वह इस्लाम का है, क़ुरआन का है, आप ईमान से सजे हुए नौजवानों का है, भविष्य आप मोमिन नौजवानों का है। “और अल्लाह से बढ़कर कौन बात का सच्चा है” (सूरए निसा, आयत-122) कौन है जो भविष्य के बारे में अल्लाह से ज़्यादा जानता है?!! अल्लाह ने फ़रमाया है कि भविष्य तो मोमिनों का है, नेक बंदों का है, अल्लाह की राह में संघर्ष करने वालों का है, इसमें कोई शक नहीं। यह अल्लाह का वादा है। अब अगर इसके बाद भी कोई शक और वसवसे का शिकार है, अल्लाह के इन वादों की ओर से इत्मेनान नहीं हो रहा है, सुकून नहीं मिल रहा है, तो तजुर्बे से उसके दिल को सुकून मिल जाना चाहिए। मैं यह बात बार बार कह चुका हूं और इस पर दिल की गहराई से मेरा ईमान भी है कि अगर हमसे कोई भी वादा न किया गया होता तब भी पिछले तीस-चालीस साल से ईरानी क़ौम ने जो तजुर्बे हासिल किए हैं, उनसे भी यह यक़ीन आ जाना चाहिए कि भविष्य इस क़ौम का है, उसे यक़ीन आ जाना चाहिए था कि फ़तह उसकी होगी। इमाम ख़ामेनेई 27/05/2017
29/12/2025
जब हम बड़े मामलों में साम्राज्यवादी ताक़तों के ख़िलाफ़ संघर्ष के विषय में अल्लाह पर यक़ीन की बात करते हैं तो इसके ख़ास मानी होते हैं। इस जगह अल्लाह पर यक़ीन का मतलब उसके वादों पर यक़ीन है। अल्लाह ने क़ुरआने मजीद में कुछ वादे किए हैं, इन वादों के ख़िलाफ़ नहीं हो सकता। अल्लाह ने वादा किया हैः “ऐ ईमान वालो! अगर तुम अल्लाह की मदद करोगे तो अल्लाह तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हे साबित क़दम रखेगा” (सूरए मोहम्मद, आयत-7), इसी तरह वादा किया हैः “जो कोई अल्लाह (के दीन) की मदद करेगा अल्लाह ज़रूर उसकी मदद करेगा।” (सूरए हज, आयत-40), और इसी तरह वादा किया हैः “बेशक अल्लाह, अहले ईमान की तरफ़ से दिफ़ा करता है” (सूरए हज, आयत-38) ये अल्लाह के वादे हैं। “बेशक अल्लाह कभी वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता” (सूरए आले इमरान, आयत-9) अल्लाह अपने वादों की ख़िलाफ़वर्ज़ी नहीं करता। इमाम ख़ामेनेई 04/06/2023
22/12/2025
ग़ज़ा में दुश्मन के दरिंदगी और बेरहमी से भरे जुर्म, जिसकी मिसाल मानवता पर ढाए गए ज़ुल्म के इतिहास में बहुत कम है, (फ़िलिस्तीनी) मर्दों, औरतों, जवानों और बच्चों के ठोस इरादों पर क़ाबू पाने में ज़ायोनियों की कमज़ोरी की निशानी हैं। अल्लाह का दुरूद व सलाम हो इस महान व साबित-क़दम क़ौम, ग़ज़ा के अवाम और हमास की सरकार पर जिन्होंने क़ुरआन मजीद की इन अमर आयतों की अमली तसवीर पेश कर दी। “और हम ज़रूर तुम्हें आज़माएंगे ख़ौफ़ व ख़तर, और कुछ भूख (व प्यास) और कुछ मालों, जानों और फलों के नुक़सान के साथ (यानी इनमें से किसी न किसी चीज़ के साथ) ऐ रसूल! ख़ुशख़बरी दे दीजिए उन सब्र करने वालों को कि जब भी उन पर कोई मुसीबत आ पड़े तो वो कहते हैं कि बेशक हम सिर्फ़ अल्लाह ही के लिए हैं और उसी की तरफ़ पलट कर जाने वाले हैं। यही वो (ख़ुशनसीब) हैं, जिन पर उनके परवरदिगार की तरफ़ से दुरूद (ख़ास इनायतें और नवाज़िशें) हैं और रहमत व मेहरबानी है और यही लोग हेदायत-याफ़्ता हैं।” (सूरए बक़रह, आयत-155) और “मुसलमानो! ज़रूर तुम्हें तुम्हारे मालों और जानों के बारे में आज़माया जाएगा और तुम्हें अहले किताब मुशरेकीन से बड़ी दिल आज़ार बातें सुनना पड़ेंगी और अगर तुम सब्र व ज़ब्त से काम लो और तक़वा अख़्तियार करो तो बेशक यह बड़ी हिम्मत और हौसले का काम है।” (सूरए आले इमरान, आयत-186) हक़ और बातिल की इस लड़ाई में अंत में जीत हक़ की ही है और सब्र व दृढ़ता का प्रदर्शन करने वाली फ़िलिस्तीन की यह क़ौम दुश्मन को हराकर रहेगी। “और अल्लाह बड़ा ताक़तवर (और) ग़ालिब है।” (सूरए अहज़ाब, आयत-25) इमाम ख़ामेनेई 07/12/2008
15/12/2025
शहीद हम से कहते हैं: “और अपने पसमांदगान के बारे में भी, जो अभी उनके पास नहीं पहुंचे हैं, ख़ुश और मुतमइन हैं कि उन्हें कोई ख़ौफ़ नहीं है और न ही कोई हुज़्न व मलाल है” (सूरए आले इमरान, आयत-170) ईरानी क़ौम को चाहिए कि शहीदों के संदेश को सुनने के बाद अपनी एकता, अपनी एकजुटता, अपना जज़्बा और अपनी कोशिश ज़्यादा करे। शहीदों का संदेश हमारे लिए यह है। सभी को ज़िम्मेदारी महसूस करनी चाहिए और हम सब यह ख़याल रखें कि कोशिश के बिना, अल्लाह की राह में संघर्ष के बिना, कठिनाइयों को बर्दाश्त किए बिना कोई क़ौम किसी मंज़िल तक नहीं पहुंचती। अब हमारे लिए भी अगर कठिनाइयां हैं तो इंशाअल्लाह ये कठिनाइयां बर्दाश्त करके ईरानी क़ौम उचाइयों पर पहुंच जाएगी और ये कठिनाइयां हमें चोटियों पर पहुंचा देंगी। इमाम ख़ामेनेई 21/11/2021
08/12/2025