महान धर्मगुरू आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद हादी मीलानी पर कान्फ़्रेंस के प्रबंधकों से ख़ेताब
महान धर्मगुरू आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद हादी मीलानी पर कान्फ़्रेंस के प्रबंधकों ने 21 दिसम्बर 2025 को इस्लामी इंक़ेलाब के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई से मुलाक़ात की, इस मौक़े पर बात करते हुए आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने आयतुल्लाह मीलानी की हस्ती के बारे में बड़े दिलचस्प बिन्दु बयान किए और कुछ निर्देश दिए।(1)
ख़ेताब इस प्रकार हैः
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
अरबी ख़ुतबे का अनुवादः सारी तारीफ़ पूरी कायनात के पालनहार के लिए है और दुरूद व सलाम हो पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद और उनकी पाकीज़ा नस्ल पर ख़ास कर ज़मीनों पर अल्लाह के ज़रिए बाक़ी रखी गई हस्ती पर।
आप सब लोगों का स्वागत है और मैं आप सभी सम्मानीय लोगों, जनाब आक़ाए मरवी और दूसरे लोगों का बहुत शुक्रिया अदा करता हूं जिन्होंने जनाब मीलानी साहब (रहमतुल्लाह अलैह) को श्रद्धांजलि पेश करने के लिए कान्फ़्रेंस का आयोजन किया। हालांकि मरहूम मीलानी 20 साल तक मशहद में इल्मी, सामाजिक, राजनैतिक और बहुत से कामों में व्यस्त रहे लेकिन उनके निधन के बाद मशहद में उनकी कोई ख़ास निशानी नहीं दिखाई देती थी। जब भी मशहद के मामलों से मेरा वास्ता पड़ता, मैं यह महसूस करता था। एक ज़माने में वह मशहद की केन्द्रीय हस्ती थे, यानी वह धार्मिक शिक्षा केन्द्र का एक अहम स्तंभ शुमार होते थे लेकिन उनके निधन के बाद उन का ज़िक्र और उन का नाम कम लिया गया। उनके छोटे बेटे, मरहूम जनाब सैयद मोहम्मद अली भी ज़्यादा नुमायां नहीं रहे और हम सभाओं वग़ैरह में उन से कम ही मिल पाते थे, लगता है उनका भी निधन हो गया। लेहाज़ा यह जो कॉन्फ़्रेंस आप आयोजित कर रहे हैं, अच्छा काम है कि उनके बारे में शोध किया जाए, काम किया जाए, उन की किताबों को फिर से बढ़ावा दिया जाए। मैंने कुछ बातें नोट की हैं जो उन के बारे में अर्ज़ करुंगा।
पहली बात तो यह कि उनकी शख़्सियत बहुमुखी थी जिन में से हर पहलू के बारे में हर डिग्री से इंसान कुछ जुमले बयान कर सकता हैः एक पहलू उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी, उनकी शख़्सियत और उनकी नैतिक व व्यावहारिक ख़ुसूसियतों के बारे में है, एक दूसरा, उनके इल्मी पहलू पर बात की जा सकती है और उन की इल्मी ज़िंदगी पर बात की जा सकती है, एक और पहूल उनका आत्मज्ञान और अध्यात्म का पहलू है, अलबत्ता उनकी ज़िंदगी में हमारा ध्यान इस ओर नहीं था और हम जानकारी नहीं रखते थे, बाद में मुझे मालूम हुआ कि उनका इरफ़ान और अध्यात्म से भी लगाव था और चिंतन मनन, रियाज़त वग़ैरह जैसी ख़ुबियां रखते थे, ये चीज़ें इंसान उनकी ज़िंदगी में नहीं समझ सकता था, यह भी एक पहलू है, एक और पहलू उनका सामाजिक और राजनैतिक पहलू है। इन सभी पहलुओं के बारे में उन के सिलसिले में बात की जा सकती है जिन में से मैं हर एक पर कुछ जुमले अर्ज़ करुंगा।
पहले बिंदु के बारे में यानी उनकी शख़्सियत और उनके व्यक्तिगत व्यवहार के बारे में अर्ज़ करुंगा कि वह बहुत अच्छे इंसान थे। पहली बात तो यह कि वह बहुत वेक़ार और गरिमा के साथ आगे बढ़ते थे, बात करते थे, व्यवहार करते थे, साथ ही बहुत मिलनसार थे। (उन में) विनम्रता भी थी, गरिमा भी और वेक़ार भी था और एक आत्मिक सुकून भी उन में महसूस होता था, यहाँ तक कि जब मुश्किल हालात पेश आते तो इंसान महसूस करता था कि उन के पास यह सुकून है।
दोस्तों की दोस्ती के प्रति वफ़ादार थे और उसे निभाते थे, वे अपने दोस्तों का बहुत ख़याल रखते थे। वे हमारे पिता (2) के साथ तबरेज़ में एक स्कूल में पढ़ते थे। वे नजफ़ में पैदा हुए थे और उनके पिता जो मशहूर हैं, शैख़ मोहम्मद हसन मामक़ानी, किताब मकासिब का हाशिया लिखने वाले और अपने ज़माने की इस महान शख़्सियत और वरिष्ठ धर्मगुरू के दामाद थे, जिनका, लगता है 1942 या 1943 में निधन हो गया। ख़ैर वह तो नजफ़ में पैदा हुए और उनके पिता तबरेज़ आ गए और एक दो साल तबरेज़ में रहे, फिर दोबारा नजफ़ वापस चले गए। उस एक दो साल के दौरान, उन के यह बेटे, जो स्कूल जाते थे, हमारे मरहूम पिता और तबरेज़ के एक और धर्मगुरू यानी मरहूम आक़ा सैयद इब्राहीम दरवाज़ेई, जिनके बेटे आक़ा सैयद महदी दरवाज़ेई तेहरान में थे और शायद कुछ लोग उन्हें जानते हों, ये तीनों, एक स्कूल में पढ़ते थे। जनाब मीलानी ने उस दोस्ती के मद्देनज़र, हमारे मरहूम वालिद के साथ ख़ास संबंध रखा। वे कई बार सुबह सवेरे उठते और वहाँ आते और शायद नाश्ता भी वहीं करते थे। एक बार मरहूम आक़ा सैयद इब्राहीम दरवाज़ेई मशहद आए, तो तीनों एक साथ हमारे मरहूम वालिद के घर इकट्ठा हुए। वे वफ़ादार थे, पुरानी दोस्ती की क़द्र करते थे।
वह ऐसे इंसान थे कि अगर उनके पास बैठ जाइये तो उठने का दिल न करे, यानी अगर कोई उन के साथ बैठता था तो उनकी बैठक बहुत दिलचस्प होती थी। वह बहुत ज़िंदा दिल इंसान थे, उन्हें शेर शायरी से लगाव था। मैं ने कुछ तहरीरों में, कुछ किताबों में जिन का उन से संबंध नहीं था, देखा कि उन्होंने शेर भी कहे हैं, अलबत्ता अरबी में शायरी करते थे, उन में शेर शायरी का शौक़ था और इस तरह की दिलचस्पी रखते थे, यानी एक महान शख़्सियत थे। साथ ही यह बात भी ध्यान योग्य है कि वे शैख़ मोहम्मद हसन मामक़ानी के नवासे थे। मरहूम जनाब शैख़ अब्दुल्लाह मामक़ानी के दामाद थे। वे अपने लेक्चर में भी कभी कभी अपने मामूं के बारे में कहते थे कि मरहूम मामूं साहब ने अपनी किताब रेजाल में इस तरह कहा है। कहने का मक़सद यह है कि वे इल्मी घराने में पले बढ़े थे।
मरहूम आयतुल्लाह मीलानी (रहमतुल्लाह अलैह) को अगर इल्मी पहलू से देखा जाए तो इस बात में शक नहीं कि वे अपने ज़माने में एक प्रतिष्ठित इल्मी हस्ती थे, वे एक बड़े धर्मगुरू थे। उन्होंने ज़्यादातर मरहूम आक़ाए नाईनी और मरहूम आक़ाए शैख़ मोहम्मद हुसैन इस्फ़हानी से इल्म हासिल किया था जिन का नाम वे इस तरह लेते थेः मीरज़ाए उस्ताद, अलहाज शैख़ उस्ताद, इस तरह के लफ़्ज़ों से अपने दर्स में उनका ज़िक्र करते थे, फिर भी फ़िक़ह में उनके सोचने का तरीक़ा मरहूम आक़ाए नाईनी के ज़्यादा क़रीब था। चूंकि मैं उनके उसूल की क्लास में नहीं जाता था, इसलिए मैं नहीं जानता कि वे उसूल में कैसा रुजहान रखते थे, लेकिन फ़िक़ह की क्लास में, उनका रुझान ज़्यादा मरहूम आक़ाए नाईनी की तरफ़ था और वे मरहूम आक़ाए नाईनी की शैली में बहस करते, बात करते और काम करते थे।
पढ़ाते वक़्त क्लास में वह बहुत सुकून और संजीदगी की हालत में और अच्छी तरह बयान करते थे, अच्छी तरह बयान करने का मतलब यह कि वह मीठे अंदाज़ में बोलते थे, अच्छी तरह बयान करने का मतलब यह नहीं कि लगातार बोलते रहें बल्कि उनकी बात बहुत मीठी होती थी, जो भी स्टूडेंट उनकी क्लास में सुनता वाक़ई वह उसे समझ जाता था, मतलब यह कि वह इस तरह बात करते थे। वह एक बहुत अच्छे टीचर थे। वाक़ई मशहद के धार्मिक शिक्षा केन्द्र को उन्होंने जीवनदान दिया। मशहद का धार्मिक शिक्षा केन्द्र एक ज़माने में, मरहूम आक़ाज़ादे (3) और मरहूम हाज आक़ा हुसैन (4) के ज़माने में, अपनी चोटी पर था। उनकी शहादत के बाद कई साल तक वह धार्मिक शिक्षा केन्द्र ठहराव का शिकार रहा, यानी फ़िक़ह और उसूल में कोई ऐसी क्लास नहीं थी जो लगाव रखने वाले स्टूडेंट्स को मशहद के धार्मिक शिक्षा केन्द्र से बांध कर रख सकती। उनके आ जाने से धार्मिक शिक्षा केन्द्र को जीवनदान मिला, मशहद का धार्मिक शिक्षा केन्द्र वाक़ई मरहूम मीलानी साहब का एहसानमंद है। उन्होंने मशहद के धार्मिक शिक्षा केन्द्र को हक़ीक़त में दोबारा ज़िंदगी दी और वहाँ क्लास लेना शुरू किया। रातों को फ़िक़ह की क्लास लेते और अलहाज मुल्ला हाशिम मदरसे में किराए पर किसी चीज़ को लेने या देने के विषय पर क्लास लेना शुरू किया। चूंकि मैं उन दिनों 'दर्से ख़ारिज' में नहीं जाता था इसलिए मैंने उस क्लास में शिरकत नहीं की लेकिन बाद में उन्होंने नमाज़ के विषय पर क्लास शुरू की जो बहुत तफ़सीली था, कई साल, शायद आठ दस साल तक जारी रही, फिर ज़कात और ख़ुम्स और इस तरह के विषयों पर क्लास ली जो मेरे ख़याल में किताब की शक्ल में छप चुकी हैं, यानी मैंने उनकी नमाज़ के विषय पर ली गयी क्लासेज़ को किताब की शक्ल में देखा है, मेरे ख़याल में मुसाफ़िर की नमाज़ वग़ैरह का कुछ हिस्सा मैंने देखा है फिर भी मैं उन की जो तहरीरें देखी हैं, वह उनकी इल्मी कमांड को इतने सही अंदाज़ में पेश नहीं करतीं, यानी वह तहरीरों से कहीं ज़्यादा कमांड रखते थे, इल्म के मामले में, वह उन तहरीरों से ज़्यादा विद्वान थे और धार्मिक शिक्षा के लेहाज़ से वह निश्चित तौर पर बहुत बड़े विद्वान थे।
इतनी बड़ी इल्मी शख़्सियत होने के साथ ही वे धार्मिक शिक्षा केन्द्र के मामले में भी गंभीर थे, जब वे मशहद आए, अच्छे स्टूडेंट्स की तलाश में रहे। शुरू शुरू में जब वे मशहद आए और उन्होंने अच्छे स्टूडेंट्स को अलग किया जिसकी वजह से उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा। वे आला दर्जे के स्टूडेंट्स को तलाश करना और उन पर ध्यान देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने मदरसा क़ायम किया, उन्होंने दो तीन मदरसे क़ायम किए क्योंकि जिस वक़्त उन्होंने मदरसा क़ायम किया, उस वक़्त उन से मेरा ज़्यादा संपर्क नहीं था, इसलिए मुझे उनके मदरसों की स्थिति की ज़्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन इस मसले की ओर उनका ध्यान था, धार्मिक शिक्षा केन्द्र और इस तरह की चीज़ों की ओर से वे जागरुक थे। तो यह उनका इल्मी पहलू है।
जहाँ तक इरफ़ान की बात है तो मरहूम सैयद अब्दुल ग़फ़्फ़ार साहब माज़ंदरानी से उनका आध्यात्मिक व आत्मिक लगाव था। मरहूम आक़ाए सैयद अब्दुल ग़फ़्फ़ार, मरहूम आक़ाए क़ाज़ी (5) और इस दर्जे के इराक़ और नजफ़ के दूसरे धर्मगुरू और आत्मज्ञानियो की श्रेणी में थे। उन की जो किताब छपी है, जो मैंने कुछ साल पहले देखी थी, जहाँ तक मुझे लगता है कि मरहूम सैयद अली ने यह काम किया कि उन्हें लिखे गए ख़त इकट्ठा किए और छपवाए, उस में मरहूम आक़ाए सैयद अब्दुल ग़फ़्फ़ार के उन्हें लिखे गए ख़त हैं, जिन में वे उन्हें निर्देश देते हैं और साफ़ है कि उन्होंने सवाल किया होगा, जिसके जवाब में वे निर्देश दे रहे हैं। तो उन से मरहूम मीलानी का आत्मिक लगाव था। अलबत्ता हम उस वक़्त देखते थे कि वे उन लोगों से संपर्क रखते थे जो अध्यात्म और आत्मज्ञान में माहिर थे, यह हम ने बहुत बार देखा था, मरहूम अलहाज मुल्ला आक़ा जान (6) जब मशहद आते तो उन से संपर्क में रहते, मजलिस पढ़ते, मैंने देखा था कि आक़ाए मीलानी के घर में, मरहूम हाज मुल्ला आक़ा जान मजलिस पढ़ते थे। या कुछ दूसरे जैसे मशहद में 'नूर' के नाम से मशहूर जनाब नक़ीबी (7) उन से संपर्क रखते थे। इस तरह के संबंध थे और यह चीज़ सभी देखते थे लेकिन यह कि वह अध्यात्म और आत्मज्ञान के मैदान में किसी उस्ताद से सीखते हों या ज़रूरी आध्यात्मिक अमल और मख़सूस इबादतें और इस तरह की चीज़ें करते हों, यह हम आक़ाए मीलानी के बारे में नहीं सोचते थे, लेकिन ऐसा था। यह चीज़ बाद में समझ में आती है कि ऐसा था। मरहूम आक़ाए तबातबाई (8) उन से बहुत संपर्क में रहते थे। तबातबाई साहब क़रीब क़रीब हर साल गर्मियों में मशहद आते थे और मेरे ख़याल में दो तीन हफ़्ते ठहरते थे और इस दौरान उनकी नमाज़ में शिरकत के पाबंद थे। मरहूम आक़ाए मीलानी गर्मियों में मग़रिब और इशा की नमाज़ नए प्रांगण यानी मौजूदा आज़ादी नामी प्रांगण में पढ़ाते थे, मरहूम जनाब तबातबाई उस नमाज़ में शिरकत करने के पाबंद थे और उन से बहुत लगाव था, जो ख़ुद इस बात की दलील थी कि उन में एक आध्यात्मिक व आत्मज्ञान का पहलू मौजूद है। उनकी करामतों के बारे में कई वाक़ए भरोसेमंद हवाले से नक़्ल किए जाते हैं, मैंने कई वाक़ए भरोसेमंद सूत्रों से सुने हैं। एक वाक़ेया मरहूम आक़ाए अलहाज आक़ा मुर्तुज़ा हायरी के ज़रिए से लोगों तक पहुंचा है जो लिखा गया है और छप भी गया है और कुछ दूसरों ने इसका हवाला भी दिया है, इस तरह के मामले भी देखे गए जिन से साफ़ पता चलता है कि आध्यात्मिक पहचान और आत्मज्ञान के स्वामी थे। तो यह उनके आध्यात्मिक पहलू के बारे में बात है।
अब उनके राजनैतिक और सामाजिक पहलू की कुछ बातें। जिद्दो जेहद के आग़ाज़ में वह आंदोलन के स्तंभों में से एक थे। सन 1962-1963 में जब धर्मगुरुओं का आंदोलन शुरू हुआ तो इस बात में शक नहीं कि मरहूम मीलानी साहब, आंदोलन के अहम स्तंभों में गिने जाते थे। पहले तो उनके घोषणापत्र बहुत प्रभावी होते थे। हम (क़ुम) के हुज्जतिया मदरसे में थे, एक बोर्ड था जिस पर एलान लगे होते थे, जहाँ घोषणापत्र लगाए जाते थे और हम खड़े होकर उन्हें पढ़ते थे। मैंने एक बार देखा कि मीलानी साहब का एक बयान् आया, उसकी टेक्स्ट इतनी प्रभावी, संजीदा और ठोस थी कि इंसान उस टेक्स्ट की ख़ूबसूरती और ताक़त से जोश में आ जाता था। वह ऐसे थे, उनकी फ़ारसी की तमाम तहरीरें इसी तरह की हैं। मुझे याद नहीं कि मैंने उनकी अरबी तहरीर देखी हो लेकिन उनकी फ़ारसी तहरीर बहुत संजीदा, ठोस और बहुत आकर्षक थी। फि जब इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) को जेल में डाला गया था और उनके ख़िलाफ़ सख़्त और कड़े फ़ैसलों की संभावना थी तो तमाम शहरों से पहले दर्जे के धर्मगुरू तेहरान आए। निश्चित तौर पर उस समूह का नेतृत्व जनाब मीलानी कर रहे थे। हालांकि जनाब शरीअतमदारी (9) भी थे, वे भी ऐसे धर्मगुरू थे जिनकी तक़लीद होती थी, लेकिन धर्मगुरुओं में जनाब मीलानी की ओर ज़्यादा ध्यान और उनका वेक़ार बहुत ऊंचा और नुमायां था और तेहरान आने वाले धर्मगुरुओं के उस समूह में निश्चित तौर पर सबसे प्रभावी सबसे प्रतिष्ठित मरहूम जनाब मीलानी साहब (रहमतुल्लाह अलैह) थे।
और 15 ख़ुर्दाद सन 1342 हिजरी शम्सी मुताबिक़ 5 जून 1963 का वाक़ेया पेश आय तो वे घटनाओं के केन्द्र में मौजूद थे। इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) ने मुझे एक ज़िम्मेदारी दी कि मैं मशहद जाऊं और हर एक धर्मगुरू को वह बात बताऊं। दो बातें थीं: एक बात व्यक्तिगत रूप से जनाब मीलानी और मरहूम अलहाज आक़ा हसन क़ुम्मी के लिए थी, दूसरी बात सार्वजनिक थी, वह क्या बात थी, उस से फ़िलहाल कोई मतलब नहीं है। यहाँ उस बात से मतलब है जो जनाम मीलानी साहब से संबंधित थी, मैं उनकी सेवा में गया और उन से कहा कि आक़ाए ख़ुमैनी ने कहा है कि आप मजलिस पढ़ने वालों पर ज़ोर डालें कि वह 7 मोहर्रम से, फ़ैज़िया की घटना को मिंबरों पर बयान करें और 9 मोहर्रम से धार्मिक अंजुमनों पर ज़ोर डालें कि वे इस बात को बयान करें। यह पैग़ाम था जो मैं ने उन तक पहुंचाया। उन्होंने कहा कि 9 मोहर्रम से? मैं पहले ही यह सिफ़ारिश कर चुका हूं। उन्होंने नाम लियाः मैंने आक़ाए ख़ुमैनी से कहा है, आक़ाए शरीअतमदारी से कहा है, आक़ाए नजफ़ी से कहा है। उन्होंने नाम लेकर बताया कि मैंने इन लोगों से बात की है। यानी यह बात पूरी तरह ज़ाहिर थी कि वे पूरी तरह मामले से अवगत हैं और काम कर रहे हैं और यही सोच, जो क़ुम में मिसाल के तौर पर इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) के ज़रिए सामने आयी, फैली और उस पर अमल हुआ, उन में भी मौजूद थी। यानी आंदोलन में उनकी मौजूदगी इस तरह की थी और उनके पास इस मामले की प्लानिंग थी। अलबत्ता उनकी प्लानिंग, इमाम ख़ुमैनी की प्लानिंग से कुछ अलग थी लेकिन उन्होंने प्लानिंग कर रखी थी, इस मामले के लिए उनके पास प्लानिंग थी।
राजनैतिक और सामाजिक मैदानों में वे बहुत बड़े दिल के इंसान थे, यानी वह हर तरह के लोगों से जो आंदोलन और राजनीति वग़ैरह के मैदान में सरगर्म थे, संपर्क रखते थे, जैसे मरहूम बाज़ुर्गान और डॉक्टर सहाबी वग़ैरह से उनका संपर्क था। मैं शायद दो बार या तीन बार मशहद से तेहरान जाना चाहता था, मैं उनके पास अलविदा कहने के लिए गया, उन्होंने कहा कि आप तेहरान जाएंगे तो क्या आप बाज़ुर्गान साहब से मुलाक़ात के लिए जेल भी जाएंगे? वह उस वक़्त जेल में थे, सन 1964 और 1965 की बात है, मैंने कहा जी हाँ। उन्होंने कहा कि उन को मेरा सलाम पहुंचा दीजिएगा। उन्होंने दो बार या तीन बार मेरे ज़रिए बाज़ुर्गान साहब को सलाम कहलवाया। ज़ाहिर है कि वह उन लोगों से भी संपर्क में थे। अलबत्ता वह इस बात से सख़्त परहेज़ करते थे कि कोई उन्हें "राष्ट्रीय मोर्चा" जैसे किसी राजनैतिक दल से जोड़े। उन्होंने ख़ुद मुझसे कहा था कि अगर कोई मुझे राष्ट्रीय मोर्चा जैसे राजनैतिक दल से जोड़े, तो मैं उस से राज़ी नहीं रहूंगा, मैं उसे माफ़ नहीं करुंगा, वह इस तरह के थे, लेकिन उनके संपर्क का दायरा बहुत बड़ा था।
कुछ मुद्दत तक वे आंदोलन के मसलों में हमारे नज़रियों से थोड़ा दूर नज़र आए जिस पर हम ने एतेराज़ भी किया लेकिन अब जब ख़त छपे तो मालूम होता है कि उस दौरान उनका आक़ाए शरीअतमदारी के साथ काफ़ी पत्राचार चल रहा था और वह काम में व्यस्त थे। लेकिन हमें उन की इस सरगर्मी के बारे में सूचना नहीं थी। उन ख़तों में, जो लोग लिखते थे कि हम उन वरिष्ठ धर्मगुरुओं के साथ हैं जो इमाम ख़ुमैनी की रिहाई के लिए तेहरान में इकट्ठा हुए हैं, शायद सब से ज़्यादा उन्हीं का नाम था और वहाँ वह सब से ज़्यादा लोगों के ध्यान का केन्द्र बने हुए थे।
उन्होंने इमाम (ख़ुमैनी) को एक ख़त लिखा था, जो मेरे ख़याल में एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है, सन 1964 में जब इमाम (ख़ुमैनी) को तुर्की जिला वतन किया गया, उन्होंने अपने घर में एक बैठक की और मशहद के धर्मगुरुओं को बुलाया। हम में से कुछ नौजवानों को भी, जो उस वक़्त आंदोलन के लिए काम कर रहे थे, बुलाया गया था, हम भी मौजूद थे। मशहद के धर्मगुरुओं में से मरहूम अलहाज शैख़ मुज्तबा (10) और दूसरे सभी धर्मगुरू मौजूद थे। उनके बेटे खड़े हुए और वह ख़त जो आक़ाए मीलानी ने इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) को लिखा था, पढ़ कर सुनाया। इमाम (ख़ुमैनी) के सपोर्ट में बहुत ज़बर्दस्त ख़त है, बहुत ठोस और संजीदा ख़त है। उस में उनकी जिला वतनी पर अफ़सोस का इज़हार है। उस ख़त के ये जुमले मुझे याद हैं: ख़ामोशी रज़ामंदी का भाई है और जो शख़्स हमारे साथ नहीं है, वह हमारे ख़िलाफ़ है। (11) यह इबारत उस ख़त में शामिल थीं। जब हज़रत अबूज़र को जिला वतन किया जा रहा था, तब अमीरुल मोमेनीन का जो कथन था उसका उन्होंने ख़त में हवाला दिया था।(12) अमीरुल मोमेनीन अलैहिस्सलाम के जुम्ले वहाँ ज़िक्र किए थे। मेरे ख़याल में यह एक विश्वस्नीय दस्तावेज़ है, जिस में वह ख़ुद भी वहाँ बैठे हुए थे और उन के बेटे ने खड़े होकर वह ख़त पढ़कर सुनाया और सब ने सुना।
कहने का मतलब यह है कि वह एक व्यापक शख़्सियत के मालिक थे, इल्मी, नैतिक, आध्यात्मिक, राजनैतिक और सामाजिक लेहाज़ से एक महान, बहुमुखी और अनगिनत ख़ूबियों वाली शख़्सियत और मशहद के धार्मिक शिक्षा केन्द्र पर कभी न भुलाया जाने वाला हक़ रखने वाले धर्मगुरू।
उम्मीद है इंशाअल्लाह यह कॉन्फ़्रेंस जो आप ने आयोजित की है, वह अवाम के सामने उन की शख़्सियत को इससे भी ज़्यादा सामने लाएगी जो अब तक लोगों के सामने पेश की गयी है।
आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत और बर्कत हो।
1- इम मुलाक़ात के आग़ाज़ में मशहद आस्तानए क़ुद्स रज़वी के मुतवल्ली हुज्जतुल इस्लाम वलमुस्लेमीन अहमद मरवी ने एक रिपोर्ट पेश की।
2- आयतुल्लाह सैयद जवाद ख़ामेनेई
3- आयतुल्लाह मीरज़ा मोहम्मद आक़ाज़ादे ख़ुरासानी
4- आयतुल्लाह सैयद हुसैन तबातबाई क़ुम्मी
5- आयतुल्लाह सैयद अली क़ाज़ी
6- मुल्ला आक़ा ज़ंजानी
7- हुज्जतुल इस्लाम सैयद अब्दुल हुसैन नक़ीबी सीस्तानी
8- 'अलमीज़ान' तफ़सीर के लेखक आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद हुसैन तबातबाई
9- आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद काज़िम शरीअत्मदारी
10- आयतुल्लाह हाज शैख़ मुज्तबा क़ज़्वीनी
11- बेहारुल अनवार, जिल्द-74, पेज-421,
12- इब्ने अबिल हदीद, शरहे नहजुल बलाग़ा, जिल्द-8, पेज-253
21/12/2025

