नए शैक्षिक वर्ष के मौक़े पर इस्लामी इंक़ेलाब के नेता का ख़िताब, परमाणु प्रोग्राम और अमरीका से बातचीत पर पोज़ीशन का एलान
इस्लामी इंक़ेलाब के नेता आयतुल्लाहिल उज़मा ख़ामेनेई ने 23 सितम्बर 2025 मुताबिक़ 1 मेहर 1404 को नए ईरानी शिक्षा वर्ष के आग़ाज़ के मौक़े पर ईरानी क़ौम से टेलीविजन पर ख़िताब किया। आपने ईरानी बच्चों और नौजवानों की सलाहियत का ज़िक्र करते हुए, शिक्षा पर ख़ास तौर पर ध्यान देने की ताकीद की। आपने राष्ट्रीय एकता, परमाणु प्रोग्राम और अमरीका से वार्ता के सिलसिले में दो टूक अंदाज़ में अपनी पोज़ीशन को बयान किया।
स्पीच इस प्रकार हैः
बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम
अरबी ख़ुतबे का अनुवादः सारी तारीफ़ पूरी कायनात के पालनहार के लिए है और दुरूद व सलाम हो हमारे सरदार मोहम्मद और उनकी पाक नस्ल पर ख़ास कर ज़मीनों पर अल्लाह के ज़रिए बाक़ी रखी गई हस्ती पर।
मैं अज़ीज़ ईरानी क़ौम को सलाम अर्ज़ करता हूं। मैंने मुनासिब समझा कि अज़ीज़ अवाम से कुछ चीज़ों के बारे में बात करुं। दो तीन विषय हैं जिनके बारे में अभी व्याख्या करुंगा।
इस बात को शुरू करने से पहले, मैं ज़रूरी समझता हूं कि 'मेहर' महीने (ईरानी कैलेंडर का सातवां महीना, इस महीने के आग़ाज़ के साथ ईरान का शैक्षणिक साल भी शुरू होता है) के आगमन पर मुबारकबाद पेश करूं। मेहर का महीना, पढ़ाई, स्कूल, इल्म और यूनिवर्सिटी का महीना है। मेहर का महीना, करोड़ों नौजवानों, बच्चों और किशोरों के इल्म व सलाहियत की ओर सफ़र का आग़ाज़ है। यही मेहर महीने की ख़ासियत है।
मैं अपने अज़ीज़ अधिकारियों, ख़ास तौर पर शिक्षा विभाग और स्वास्थ्य और मेडिकल विभाग के अधिकारियों को सिफ़ारिश करता हूं कि वे नौजवान ईरानियों की सलाहियतों की अहमियत और क़द्र व क़ीमत को हमेशा मद्देनज़र रखें। ईरानी नौजवानों ने इल्म के मैदान में और ज़िंदगी के दूसरे कई क्षेत्रों में अपनी सलाहियतों का सुबूत दिया है।
मैं यहां यह आंकड़े पढ़कर सुनाता हूं: हाल ही में, दुनिया भर में स्टूडेंट्स की प्रतियोगिताओं में, 12 दिवसीय जंग और दूसरी चुनौतियों के बावजूद, हमारे स्टूडेंट्स ने कुल 40 मेडल हासिल किए जिनमें 11 गोल्ड मेडल थे। यह बहुत अहम और क़द्रदानी के क़ाबिल है। एस्ट्रानमी के ओलंपियाड में, उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले मुल्कों में पहला स्थान हासलि किया। दूसरे विषयों में भी उन्होंने अच्छी पोज़ीशन हासिल की। खेल के मैदान में तो आप इन दिनों ख़ुद ही देख रहे हैं, पहले वॉलीबाल और कुश्ती में। हमारे नौजवान ऐसे ही हैं। अलहम्दुलिल्लाह उनकी सलाहियतें असाधारण हैं, उनसे फ़ायदा उठाना चाहिए।
मैं ज़रूरी समझता हूं कि इन दिनों महान मुजाहिद सैयद हसन नसरुल्लाह की शहादत की बरसी के मौक़े पर उन्हें याद करूं। सैयद हसन नसरुल्लाह इस्लामी दुनिया के लिए एक विशाल संपत्ति थे, न सिर्फ़ शियों के लिए, न सिर्फ़ लेबनान के लिए, बल्कि पूरे इस्लामी जगत के लिए एक संपत्ति थे। अलबत्ता यह संपत्ति ख़त्म नहीं हुयी, यह बाक़ी है। वे चले गए लेकिन जो संपत्ति उन्होंने पैदा की वह सचमुच बाक़ी है। लेबनान के हिज़्बुल्लाह की दास्तान एक ज़िंदा दास्तान है। हिज़्बुल्लाह को हरगिज़ कमतर नहीं समझना चाहिए और इस अहम संपत्ति की ओर से ग़फ़लत नहीं होनी चाहिए। यह लेबनान और ग़ैर लेबनान सबके लिए एक क़ीमती संपत्ति है।
मैं ज़रूरी समझता हूं कि हालिया 12 दिवसीय जंग के वाक़ए में शहीद होने वालों की याद को चाहे वे सैन्य कमांडर हों, वैज्ञानिक हों या दूसरे लोग, ताज़ा करूं और उनके रिश्तेदारों और घर वालों को दिल की गहराई से सांत्वना पेश करूं।
लेकिन जिन बातों को मैं बयान करना चाहता हूं, वे तीन हैं। पहली बात ईरानी क़ौम की एकता के बारे में है, अलबत्ता इस पर बहुत कुछ कहा जा चुका है, फिर भी इस सिलसिले में एक बिंदु पेश करना चाहता हूं। दूसरी बात यूरेनियम संवर्धन के बारे में है जिसका इतना ज़िक्र होता है, मैं इसकी व्याख्या करना चाहता हूं। तीसरी बात अमरीका से बातचीत के बारे में है जिसके संबंध में लेखकों और वक्ताओं की अलग अलग राय है, कुछ समर्थक, कुछ विरोधी, कुछ तर्क के साथ, कुछ बिना तर्क के। मैं इस बारे में कुछ बिन्दु पेश करना चाहता हूं।
अब पहले बिंदु की ओर आते हैं, यानी ईरानी क़ौम की एकता के बारे में। मेरी सबसे पहली बात यह है कि 12 दिवसीय जंग में ईरानी क़ौम की एकता और एकजुटता ने दुश्मन को मायूस कर दिया। यानी दुश्मन जंग के शुरूआत और बीच के दिनों में ही समझ गया कि वह अपने लक्ष्य में कामयाब नहीं हो सकेगा। दुश्मन का लक्ष्य सिर्फ़ कमांडरों को निशाना बनाना नहीं था, वह तो एक ज़रिया था। दुश्मन ने सोचा था कि फ़ौजी कमांडरों और इस्लामी सिस्टम की कुछ प्रभावी हस्तियों को क़त्ल करके मुल्क में, ख़ास तौर पर तेहरान में, अशांति फैलायी जाएगी। उनके तत्व उपद्रव करेंगे और लोगों को, जिन्हें वे इकट्ठा कर सकें, सड़कों पर ला खड़ा करेंगे और फिर अवाम के ज़रिए इस्लामी गणराज्य के ख़िलाफ़ कोई वाक़या खड़ा कर देंगे। यह मुख्य लक्ष्य था। इसलिए निशाने पर इस्लामी गणराज्य था, सिस्टम को निष्कृय करना था। जैसा कि मैंने एक और बातचीत में भी कहा था,(1) उन्होंने तो इस्लामी गणराज्य के बाद के दौर की भी बैठकर योजना बनायी थी। वे हंगामा खड़ा करना चाहते थे, सड़कों पर उपद्रव करना चाहते थे, गुटों को उभारना चाहते थे और मुल्क में इस्लाम की जड़ों को उखाड़ना चाहते थे। दुश्मन का यही लक्ष्य था।
ख़ैर, यह लक्ष्य पहले ही क़दम पर नाकाम हो गया। कमांडरों की जगह क़रीब क़रीब फ़ौरन दूसरे कमांडरों ने ले ली, उनकी जगह नए लोग नियुक्त हो गए और आर्म्ड फ़ोर्सेज़ में ऑर्डर अपनी परिपक्वता और बुलंद हौसले के साथ बरक़रार रहा। लेकिन सबसे प्रभावी तत्व यानी अवाम, दुश्मन की चालों से बिलकुल प्रभावित न हुए। प्रदर्शन हुए, सड़कें भर गयीं, लेकिन इस्लामी सिस्टम के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि दुश्मन के ख़िलाफ़। अवाम ने मामला ऐसा कर दिखाया कि दुश्मन ने जो सरहदों के बाहर बैठे हैं, अपने एजेंटों से कहा, "मूर्खो! वह कौन सा काम है जो हमने नहीं किया? हमने ज़मीन समतल की, बमबारी की, कई लोगों को शहीद किया, मारा। तुम क्यों कुछ नहीं कर पा रहे हो?" उनके एजेंटों ने जो निश्चित तौर पर ईरान और तेहरान में मौजूद हैं, जवाब दिया कि हम तो कुछ करना चाहते थे लेकिन अवाम ने हमारी ओर ध्यान नहीं दिया, हमसे मुंह मोड़ लिया और मुल्क में ला एंड ऑर्डर के ज़िम्मेदारों ने हमें रोक दिया, हम कुछ कर नहीं सके। इस तरह दुश्मन की योजना, नाकाम हो गयी।
ख़ैर ये बातें जो मैंने कहीं हैं, उनमें से कुछ या सब पहले भी हमने या दूसरों कहीं हैं। लेकिन जिस बिंदु पर मैं बल देना चाहता हूं, वह यह है कि ये तत्व यानी एकता अब भी मौजूद है। ईरानी राष्ट्र की एकता अब भी बरक़रार है। कुछ हल्क़ें, जिनका स्रोत भी मुल्क से बाहर है, हमें जो सूचनाएं मिली हैं, वे यही ज़ाहिर करती हैं कि वे यह ज़ाहिर करना चाहते हैं कि जंग के आग़ाज़ में जो एकजुटता पैदा हुयी थी, वह सिर्फ़ इन्हीं कुछ दिनों के लिए थी। कुछ दिन गुज़रने के बाद यह कमज़ोर पड़ जाएगी, मतभेद पैदा होंगे, इख़्तेलाफ़ी बातें हावी हो जाएंगी और यह एकता ख़त्म हो जाएगी। ईरान के लोग बिखर जाएंगे और फिर जातीय विभाजन और राजनैतिक मतभेदों को इस्तेमाल कर के ईरानी अवाम को आपस में लड़ाया जा सकेगा और उपद्रव और बग़ावत फैलाई जा सकेगी। वे यही प्रोपैगंडा कर रहे हैं।
मैं यह कहना चाहता हूं कि यह बात पूरी तरह ग़लत है। हाँ, राजनैतिक मामलों में मतभेद मौजूद है; हमारे मुल्क में बहुत सी क़ौमें बस्ती हैं जो सब की सब ईरानी हैं और अपने ईरानी होने पर फ़ख़्र महसूस करती हैं; ये सब कुछ मौजूद है, लेकिन दुश्मन के मुक़ाबले में यह सारी भीड़ एक फ़ौलादी मुक्का बन जाती है जो दुश्मन के सिर पर बरसता है; आज भी ऐसा ही है, अतीत में भी ऐसा ही था और इंशाअल्लाह भविष्य भी ऐसा ही रहेगा। आज का ईरान और इंशाअल्लाह कल का ईरान, वही ईरान है जो 13 और 14 जून को नज़र आया था जब अवाम सड़कों पर निकल आए थे और दुष्ट ज़ायोनी और पेशेवर अपराधी अमरीका के ख़िलाफ़ नारे लगाए थे। यह पहली बात थी जो मैं अर्ज़ करना चाहता था। इसका बिंदु यह था कि यह राष्ट्रीय एकता, अवाम की यह एकजुटता आज भी मौजूद है और भविष्य में रहेगी; अलबत्ता हम सबकी इस के संबंध में ज़िम्मेदारी भी है।
दूसरा बिंदु, यूरेनियम एनरिचमंट का मामला है। विदेश मंत्रालय की सामने वाले पक्षों से बातचीत में यूरेनियम संवर्धन का शब्द बार बार दोहराया जाता है। वे यूरेनियम संवर्धन के बारे में कुछ कहते हैं, हम कुछ कहते हैं। मुल्क के अंदर भी मुख़्तलिफ़ बहसों में यही हाल है। यूरेनियम संवर्धन का शब्द बार बार इस्तेमाल होता है। मैं यूरेनियम संवर्धन के बारे में एक संक्षिप्त बात पेश करना चाहता हूं। आख़िर यूरेनियम संवर्धन क्या है? ऐसा क्या है जिसकी इतनी अहमियत है? सभी बहसें यूरेनियम संवर्धन ही के गिर्द घूमती हैं; यूरेनियम संवर्धन।
मैं कहना चाहता हूं कि यूरेनियम संवर्धन सिर्फ़ एक शब्दावली है, लेकिन इसके बीछे एक पूरी किताब है जिसकी ओर मैं अब संक्षेप में इशारा करुंगा। अगर इस विभाग के माहिर, अवाम से इस बारे में बात करें तो यह अच्छा और उचित है। मैं यहाँ संक्षेप में व्याख्या करुंगा।
यूरेनियम संवर्धन का मतलब यह है कि यूरेनियम के वैज्ञानिक और माहिर, कच्चे यूरेनियम को, जिसकी खदानें ईरान में मौजूद हैं, नई और जटिल टेक्नॉलोजी की कोशिशों के ज़रिए एक बहुत ही क़ीमती पदार्थ में तबदील करें जो अवाम की ज़िंदगी के विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव रखता है; यूरेनियम एनरिचमंट की यही परिभाषा है। यानी ज़मीन की खदान से हासिल होने वाली एक चीज़ को नई टेक्नॉलोजी, अत्यधिक मेहनत, उच्चस्तरीय महारत और उच्चस्तरीय सलाहियत के ज़रिए एक ऐसे पदार्थ में तबदील किया जाता है जो संवर्धित यूरेनियम कहलाता है; इसे अनेक स्तर तक संवर्धित किया जाता है और यह अवाम की ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर प्रभाव डालता है, यानी अवाम मुख़्तलिफ़ पहलुओं से संवर्धित युरेनियम से फ़ायदा उठाते हैं और यह उनकी ज़िंदगियों पर असर डालता है; मिसाल के तौर पर खेती में, जहाँ इसके दूरगामी असर हैं; मिसाल के तौर पर उद्योग और पदार्थ में, पोषण के मामले में जो खेती से संबंधित है; पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन पर असर डालता है; रिसर्च और शिक्षा और वैज्ञानिक रिसर्च के क्षेत्र में असर डालता है; बिजली की पैदावार में भी जहाँ इसका असर ज़ाहिर है। आज दुनिया के विकसित मुल्कों में बिजली घर यूरेनियम से चलाए जाते हैं (जबकि) हम ज़्यादातर इन बिजली घरों को पेट्रोल और गैस से चला रहे हैं कि जिसके नुक़सान ये हैं कि इसकी लागत बहुत ज़्यादा है, और यह पर्यावरण और हवा को दूषित करता है; जबकि संवर्धित यूरेनियम और परमाणु बिजली घरों से हासिल होने वाली बिजली से प्रदूषण शून्य है, इसकी लागत बहुत कम है, (बिजली घरों की) उम्र बहुत लंबी है और इसके दूसरे बहुत से फ़ायदे हैं जिन्हें माहिर लोगों को अवाम के सामने बयान करना चाहिए। मेरे ख़याल में अगर हम संवर्धित यूरेनियम के मुख़्तलिफ़ इस्तेमाल की लिस्ट बनाएं तो यह एक लंबी लिस्ट होगी।
हमारे पास यह बहुत ही अहम टेक्नॉलोजी नहीं थी। हम यूरेनियम संवर्धन की सलाहियत नहीं रखते थे। दुश्मन भी हमें यह टेक्नॉलोजी देने पर तैयार नहीं थे, और न ही कोई और हमें दे रहा था। कुछ साहसी अधिकारियों और कुछ ज़िम्मेदार और सही मानी में अज़ीम वैज्ञानिकों ने यूरेनियम के संवर्धन की प्रक्रिया को 35 साल पहले मुल्क में शुरू की और उसे इस स्थान तक पहुंचाया। आज हम यूरेनियम एनरिचमेंट के मामले में उच्च स्तर पर हैं। अलबत्ता जो मुल्क परमाणु हथियार बनाना चाहते हैं वे इस संवर्धन को 90 फ़ीसदी तक ले जाते हैं; चूंकि हमें हथियार की ज़रूरत नहीं है और हमारा परमाणु हथियार न बनाने का फ़ैसला है, हम इसे इतना ऊपर नहीं ले गए, हमने उसे 60 फ़ीसदी तक पहुंचाया है जो बहुत ही आला और बेहतरीन स्तर है और मुल्क के कुछ ज़रूरी कामों के लिए ज़रूरी है; हम इसे इस स्थान तक लाने में कामयाब हुए हैं। हम दुनिया के उन 10 मुल्कों में से एक हैं जिनके पास यह सलाहियत है; यानी मैं आपसे अर्ज़ करूं कि दुनिया के 200 से ज़्यादा मुल्कों में, सिर्फ़ 10 मुल्क हैं जो यूरेनियम एनरिचमंट कर सकते हैं और उन दस मुल्कों में से एक इस्लामी गणराज्य ईरान है।
अलबत्ता इन दूसरे 9 मुल्कों के पास परमाणु बम भी है, जबकि हम हैं जिनके पास परमाणु बम नहीं है और न ही होगा और हमारा इरादा परमाणु हथियार इस्तेमाल करने का नहीं है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन की सलाहियत हमारे पास है। हम उच्चस्तीय टेक्नॉलोजी से संपन्न उद्योग में दस मुल्कों में शुमार होते हैं; और उन वैज्ञानिकों ने जिनका मैंने ज़िक्र किया, इस काम की बुनियाद रखी, इसमें बहुत ज़्यादा रक़म लगायी लेकिन उनका सबसे अहम काम इस विभाग में अनगिनत लोगों की ट्रेनिंग थी। यह वह रिपोर्ट है जो इस विभाग के ज़िम्मेदारों ने हमें दी है, यानी यह एक डॉक्यूमेंट्री और भरोसेमंद रिपोर्ट हैः आज मुल्क में दर्जनों मशहूर वैज्ञानिक और माहिर शिक्षक (2) सैंकड़ों रिसर्च स्कॉलर और हज़ारों की तादाद में ट्रेंड परमाणु रिसर्च टीमें इस विषय से संबंधित अनेक विभागों में काम कर रही हैं। अब उन्होंने (दुश्मनों ने) आकर फ़ुलां फ़ुलां जगहों के प्रतिष्ठानों पर बमबारी कर दी; बात यह है कि यह इल्म है; इल्म ख़त्म होने वाली चीज़ नहीं है, इल्म बम और धमकियों से ख़त्म नहीं होता; यह मौजूद है। मैंने अर्ज़ किया, दोहराता हूं, दर्जनों मशहूर वैज्ञानिक, माहिर और कुशल उस्ताद, सैकड़ों रिसर्च स्कॉलर और हज़ारों की तादाद में परमाणु क्षेत्र के विभिन्न विभागों के लिए ट्रेंड लोग जो अब मिसाल के तौर पर स्वास्थ्य क्षेत्र में हैं, मैंने इलाज में परमाणु टेक्नॉलोजी के इस्तेमाल का ज़िक्र नहीं किया था; इलाज, संवर्धित यूरेनियम के अहम इस्तेमाल में से एक है। इलाज के मुख़्तलिफ़ विभागों में बहुत से लोग काम कर रहे हैं; इसी तरह खेती के मैदान में, इसी तरह उद्योग के मैदान में, इसी तरह मुख़्तलिफ़ मैदानों में काम कर रहे हैं, मेहनत कर रहे हैं।
अलबत्ता इन कई दशकों के दौरान, जिनमें हमने देश में ये काम किए हैं, हम पर, ईरान पर, देश के ज़िम्मेदारों पर, हमारी सरकारों पर बहुत ज़्यादा दबाव भी रहा है जिनके ज़रिए वे चाहते थे कि ईरान इस काम को छोड़ दे लेकिन हमने हथियार नहीं डाले और न ही डालेंगे। हम इस मामले में और हर दूसरे मामले में दबाव के आगे नहीं झुके और न ही आगे झुकेंगे। अब यह अमरीकी सरकार (3) अड़ी हुई है कि ईरान के पास यूरेनियम संवर्धन की क्षमता नहीं होनी चाहिए, पहले वाले कहते थे कि यूरेनियम का उच्च स्तरीय संवर्धन न करें या अपना संवर्धित यूरेनियम देश में न रखें, यह बातें वे कहते थे जिन्हें हमने माना नहीं। यह साहब कहते हैं कि पूरी तरह से यूरेनियम संवर्धन ही न हो। (इसका) क्या मतलब है? इसका मतलब है कि इस महान उपलब्धि को, जिसे हासिल करने में हमारे देश ने इतनी मेहनत की, इतना ख़र्च किया, इतनी मुश्किलें झेलीं, उन सारी कोशिशों के फल, उन सारे कामों के नतीजों को तुम मिट्टी में मिला दो, बर्बाद कर दो और नष्ट कर दो! यूरेनियम संवर्धन न होने का यही मतलब है। तो ज़ाहिर है, ईरान जैसा सम्मानीय राष्ट्र ऐसी बात कहने वाले के मुंह पर थप्पड़ मारेगा और इस बात को कभी नहीं मानेगा। यह यूरेनियम संवर्धन से जुड़ी (बात) थी जिसे हमने बयान किया।
और अब अगला विषय, जो तीसरा विषय है: राजनीतिक हल्क़ों के बयानों में अमरीका से वार्ता का मुद्दा बहुत अधिक उठाया जाता है; इस पर विभिन्न राय हैं। मैंने कहा कि कुछ लोग इसे लाभदायक समझते हैं, ज़रूरी समझते हैं, कुछ लोग इसे हानिकारक समझते हैं, कुछ लोग बीच की राय रखते हैं; विचार भिन्न-भिन्न हैं। जिस बात को मैंने अब तक इन कई बरसों में समझा है, देखा है, महसूस किया है और जिसका अनुभव किया है, वह मैं अपनी प्यारी जनता के सामने रख रहा हूँ।
कृपा करके राजनैतिक ज़िम्मेदारी रखने वाले और राजनैतिक कार्यकर्ता भी इन बातों पर ग़ौर करें, इन बातों पर सोचें, समझ-बूझ से काम लें और ज्ञान और जागरूकता की बुनियाद पर फ़ैसला करें। मेरा कहना यह है कि मौजूदा हालात के मद्देनज़र, हो सकता है बीस या तीस साल बाद हालात अलग हों, इससे हमें अभी सरोकार नहीं, मौजूदा स्थिति में, अमरीकी सरकार से वार्ता, पहले तो यह कि हमारे राष्ट्रीय हितों के लिए बिल्कुल मददगार नहीं होगी, हमारे लिए बिल्कुल लाभदायक नहीं होगी और न ही हमसे कोई नुक़सान दूर करेगी, यानी यह एक लाभहीन काम है, जिसका देश के लिए कोई फ़ायदा नहीं और जो कोई नुक़सान दूर नहीं करेगा, निश्चित रूप से इसका ऐसा कोई असर नहीं होगा। यह पहली बात है।
दूसरे यह कि इसके विपरीत, इसके कई नुक़सान भी हैं। यानी फ़ायदा तो छोड़िए, दूसरी बात यह है कि मौजूदा हालात में अमरीका से वार्ता, देश के लिए बड़े नुक़सानों का कारण है जिनमें से कई तो भरपाई योग्य भी नहीं हैं, इसके ऐसे नुक़सान भी हैं। अब मैं उन्हें विस्तार से बयान करूँगा।
जब हम कहते हैं कि यह हमारे फ़ायदे में नहीं है, हमारे लिए लाभकारी नहीं है तो इसकी वजह यह है कि अमरीकी पक्ष पहले ही बातचीत के नतीजे तय कर चुका है, यानी उसने साफ़ कर दिया है कि वह केवल उन्हीं वार्ताओं को मानता है जिनका नतीजा ईरान में परमाणु गतिविधियों और यूरेनियम संवर्धन की समाप्ति हो। यानी हम अमरीका के साथ बातचीत की मेज़ पर बैठें और उससे हुई बातचीत का नतीजा वही बात हो जो उसने पहले ही कह दी है कि "यही होना चाहिए!" यह तो बातचीत नहीं है, यह ज़बरदस्ती है, यह दबाव है। ऐसे पक्ष के साथ बातचीत करना, बैठना, जिसके लिए बातचीत का नतीजा वही होना ज़रूरी है जो वह चाहता है, वही हो जो वह कहता है! क्या यह बातचीत है? दूसरा पक्ष आज इस तरह बात कर रहा है, कहता है कि हम वार्ता करें और वार्ता का नतीजा यह निकले कि ईरान के पास यूरेनियम संवर्धन की क्षमता न हो! अब इस व्यक्ति (2) ने यूरेनियम संवर्धन की बात की है, इससे कुछ दिन पहले, इसके सहायक ने कहा था कि ईरान के पास मीज़ाइलें भी नहीं होनी चाहिए! न लम्बी दूरी की मीज़ाइलें, न मध्यम दूरी की मीज़ाइलें और न ही कम दूरी की मीज़ाइलें! यानी ईरान के हाथ इतने बंधे और ख़ाली हों कि अगर उस पर हमला भी किया जाए, तो वह इराक़ में या किसी अन्य स्थान पर अमरीकी अड्डे पर जवाबी हमला भी न कर सके, इस बात का यही मतलब है; हम बातचीत करें ताकि यही नतीजा निकले! तो यह फ़ायदा नहीं है, यह ऐसी वार्ता है जिसमें हमारा कोई फ़ायदा नहीं है और यब पूरी तरह से हमारे नुक़सान में है, यही इस बातचीत का नतीजा है। यह वार्ता नहीं है; यह ज़बरदस्ती है, अमरीका की ज़बरदस्ती और दबाव को सहना है। जब कोई इस्लामी देश ईरान के साथ डील कर रहा हो तो इस तरह की उम्मीदें, इस तरह के बयान, ईरानी राष्ट्र को न पहचानने की वजह से हैं, इस्लामी गणराज्य को न समझने की वजह से हैं, इस लिए हैं कि वह नहीं जानता कि इस्लामी देश ईरान का दर्शन, उसका आधार और उसकी शैली क्या है, जब वह ये बातें नहीं जानतातो इस तरह बात करता है, हम मशहद वालों की ज़बान में कहें तो "यह बात, कहने वाले के मुंह से बड़ी है।" और इस बात की, कि हम ऐसी चीज़ के लिए वार्ता करें, कोई अहमियत नहीं है। तो यह हमारे फ़ायदे में नहीं है।
और रही बात नुक़सान की, तो मैंने कहा कि इसके नुक़सान हैं। यह ज़्यादा अहम है कि इसके नुक़सान हैं, यह ज़्यादा अहम है। दूसरे पक्ष ने धमकी दी है कि अगर तुमने वार्ता नहीं की तो ऐसा और वैसा होगा, हम बमबारी करेंगे, हम यह करेंगे, इस तरह की बातें, कुछ अस्पष्ट और कुछ साफ़-साफ़, यानी धमकी: या तो बातचीत करो वरना अगर तुमने वार्ता नहीं की तो ऐसा होगा और वैसा होगा! यह धमकी है। तो ऐसी बातचीत को स्वीकार करना इस्लामी गणतंत्र ईरान के दबाव में आने का संकेत होगा। अगर आपने इस धमकी के तहत जाकर वार्ता की, तो इसका मतलब यह है कि हम हर धमकी के सामने तुरंत डर जाते हैं, काँपने लगते हैं और सामने वाले पक्ष के सामने हथियार डाल देते हैं, इसका यही मतलब है। अगर यह दबाव स्वीकार कर लिया गया तो फिर इसका कोई अंत नहीं होगा। आज वे कहते हैं कि अगर तुम्हारे पास यूरेनियम संवर्धन होगा तो हम ऐसा कर देंगे और वैसा कर देंगे, कल वे कहेंगे कि अगर तुम्हारे पास मीज़ाइलें होंगी तो हम ऐसा कर देंगे और वैसा कर देंगे; फिर वे कहेंगे कि अगर तुमने अमुक देश से संबंध न रखे तो हम यह करेंगे और वह करेंगे; अगर तुमने अमुक देश से संबंध रखे तो हम ऐसा करेंगे और वैसा करेंगे! लगातार धमकियाँ, और हम मजबूर होंगे कि दुश्मन की धमकियों के सामने पीछे हटें। यानी ऐसी वार्ता को स्वीकार करना जो धमकी के साथ जुड़ी हो, कोई सम्मानीय राष्ट्र बर्दाश्त नहीं करता, कोई भी समझदार राजनीतिज्ञ इसका समर्थन नहीं करता है। तो स्थिति यह है।
अलबत्ता दूसरा पक्ष शायद अब यह कहे कि मैं इसके बदले में आपको यह-यह छूट दूंगा! वह झूठ बोलता है, जो कुछ वह छूट देने के नाम पर कहता है, वह झूठ है। दस साल पहले, हमने अमरीकियों के साथ एक समझौता किया था जिसका नाम हमारे देश में 'बरजाम' (JCPOA) है,उस समझौते में तय हुआ था कि हम परमाणु मामलों में यह यह काम करेंगे, अमुक प्रोडक्शन सेंटर बंद करेंगे; साढ़े तीन फ़ीसदी संवर्धित यूरेनियम, जो हम उस समय तैयार कर रहे थे, बाहर भेज देंगे या उसे नष्ट कर देंगे यानी उसका एनरिचमेंट ख़त्म कर देंगे, और भी कुछ दूसरी शर्तें थीं। बदले में दूसरा पक्ष प्रतिबंध हटा लेगा और दस साल बाद, ईरान का मामला अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में सामान्य हालत में लौट जाएगा। उस समय जब देश के ज़िम्मेदार लोग हमारे पास आए और 'दस साल' कहा, तो मैंने कहा कि 'दस साल' एक उम्र होती है, आप 'दस साल' क्यों मान रहे हैं?उन्होंने तरह-तरह के तर्क दिए, आख़िरकार तय हुआ कि 'दस साल' न मानेंलेकिन बहरहाल उन्होंने मान लिया। वह 'दस साल' इन्हीं दिनों पूरे हो रहे हैं, वह दस साल की अवधि, जिसमें ईरान का मामला IAEA में सामान्य होना था, इन्हीं दिनों ख़त्म हो रही है। आज आप देखें, न सिर्फ़ मामला सामान्य नहीं हुआ, बल्कि देश के परमाणु मसले सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र और IAEA में कई गुना बढ़ गए हैं! दूसरे पक्ष की हालत यह है, उसका वादा यह है! हमने वे सारे काम किए जो हमें करने थे, दूसरे पक्ष ने प्रतिबंध नहीं हटाए, अपने किए हुए वादों में से कोई भी पूरा नहीं किया और आख़िरकार खुद ही, जैसा की आम शब्दों में कहा जाता है, उस समझौते को फाड़ कर फेंक दिया जो तय हुआ था, पूरी तरह से JCPOA से निकल गया और उसे ख़ारिज कर दिया।
अगर आप दूसरे पक्ष से वार्ता करें और वह बात मान जाएं जो वह चाहता है, तो यह देश की हार और एक राष्ट्र की इज़्ज़त को रौंदना है,अगर आपने उसकी धमकी को, जिसके साथ वह आपसे बात कर रहा है, मान लिया, तो हालात यह होंगे, और अगर नहीं मानेंगे तो आज की तरह ही विवाद और (समस्याएं) बनी रहेंगी। इसलिए यह वार्ता, सही अर्थ में वार्ता नहीं है। हमें अनुभव नहीं भूलने चाहिए, पिछले दस साल के उस तजुर्बे को नहीं भूलना चाहिए। हमारी बात अमरीका के बारे में है, इस लिए फ़िलहाल मैं यूरोप का मुद्दा नहीं उठाना चाहता।
हमारा यह सामने वाला पक्ष हर चीज़ में वादा तोड़ता है, हर मामले में झूठ बोलता है, धोखा देता है, हर समय सैन्य धमकियां देता है, अगर उसका बस चले तो लोगों की हत्या करता है, जैसा कि उसने हमारे शहीद कमांडर, शहीद सुलैमानी को शहीद किया, या परमाणु केंद्रों पर बमबारी करता है, अगर उसका बस चले तो ऐसे काम करता है। दूसरे पक्ष की हालत यह है, ऐसे पक्ष से वार्ता नहीं की जा सकती, भरोसे और विश्वास के साथ बैठकर बात नहीं की जा सकती, न बात सुनी जा सकती है और न ही कोई समझौता किया जा सकता है।
मेरे ख़याल में अमरीका से परमाणु मामले पर और शायद दूसरे मामलों पर बातचीत पूरी तरह से बंद गली में पहुँच गई है, यानी उसके लिए कोई सही रास्ता मौजूद नहीं है, यह सिर्फ़ बंद गली है। ग़ौर करें, देखें। हां यह उसके फ़ायदे में है; यह वार्ता अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति के फ़ायदे में है, वह घमंड से सिर ऊँचा करेगा, कहेगा कि मैंने ईरान को धमकाया और उसे बातचीत की मेज़ पर बैठा दिया,वह दुनिया में इसे अपनी जीत बताएगा लेकिन हमारे लिए यह बिल्कुल नुक़सानदायक है और हमारा कोई फ़ायदा नहीं है।
और आख़िर में जो मैं कहना चाहता हूँ, वह यह है कि देश की प्रगति, विकास और मज़बूती ही समाधान है, हमें मज़बूत होना होगा। सैन्य ताक़त ज़रूरी है, वैज्ञानिक मज़बूती ज़रूरी है, सरकारी, ढांचागत और संगठनात्मक मज़बूती ज़रूरी है। हमारे होशियार और दर्दमंद विशेषज्ञों को बैठकर देश को ताक़तवर बनाने की राहें खोजनी चाहिएं और उन रास्तों पर चलना चाहिए। अगर यह हो गया, तो फिर दूसरा पक्ष धमकियाँ भी नहीं देगा, अगर उसने देखा कि सामने वाला मज़बूत है, तो वह धमकी तक नहीं देगा। मेरे ख़याल में इसके सिवा कोई रास्ता नहीं है।
अल्लाह से मदद माँगनी चाहिए, उस पर भरोसा करना चाहिए, इमामों से आग्रह करना चाहिए कि वे शेफ़ाअत फ़रमाएँ और मदद करें, और राष्ट्रीय हिम्मत व हौसले को मैदान में लाना चाहिए और इंशा अल्लाह कामों को आगे बढ़ाना चाहिए, और यह काम अल्लाह की तौफ़ीक़ से होगा।
आप सब पर अल्लाह का सलाम, उसकी रहमत और बरकत हो
(1) हज़रत इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम की अज़ादारी की मजलिस से ख़िताब (24/08/2025)
(2) अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प
04/10/2025

