रिवायत में दुआ को इबादत का निचोड़ कहा गया है। इबादत की जान, दुआ है। दुआ का क्या मतलब है? मतलब है अल्लाह से बातें करना। अस्ल में अल्लाह को अपने पास महसूस करना और अपने मन की बात उसके सामने रखना... दिल में अल्लाह की याद ताज़ा व ज़िन्दा रखने से ग़फ़लत व लापरवाही ख़त्म होती है जो सभी गुमराहियों व भटकाव तथा इंसान की ख़राबियों की जड़ है। दुआ ग़फ़लत के पर्दे हटा देती है, दुआ इंसान के दिल से ग़फ़लत को दूर कर देती है और इंसान को अल्लाह की याद में लगा देती है और अल्लाह की याद दिल में जगाए रखती है। दुआ से वंचित लोगों को जो सबसे बड़ा नुक़सान उठाना पड़ता है वो यह है कि अल्लाह की याद उनके दिल से निकल जाती है। अल्लाह से ग़फ़लत इंसान के लिए बहुत बड़ा नुक़सान है। इमाम ख़ामेनेई 30/10/1998
25/11/2025
इस्लाम के दुश्मनों की हमेशा यही इच्छा रही है कि मुसलमानों के दिलों को बेचैन रखें। इस्लाम के लंबे इतिहास में ऐसे बहुत से वाक़ए पेश आए हैं। इस्लाम से पहले भी पैग़म्बरे इस्लाम से पहले अल्लाह के अज़ीम पैग़म्बरों के संघर्ष के दौरान जो मोमिन ईमान की राह पर डटे रहे उन्होंने रूहानी सुकून हासिल कर लिया। यह रूहानी सुकून ही उनको पूरे अख़्तियार के साथ ईमान के रास्ते पर क़ायम रख सका और वो कभी बेचैन नहीं हुए और न ही अपनी राह से भटके, क्योंकि बेचैनी की हालत में सही राह पर क़ायम रहना दुश्वार हो जाता है। वह इंसान जिसे रूहानी सुकून हो, उसकी सोच सही रहती है, वह सही फ़ैसले करता है और सही क़दम उठाता है। ये सब अल्लाह की रहमतों की निशानियाँ हैं। “याद रहे ज़िक्रे इलाही से ही दिलों को इतमेनान नसीब होता है” (सूरए राद, आयत-28) यह अल्लाह का ज़िक्र और याद है जो हमारे दिलों को, हमारी दुनिया और ज़िन्दगी के तूफ़ानों में सुरक्षित रखती है, इसलिए अल्लाह की याद को ग़नीमत समझिए। इमाम ख़ामेनेई 19/6/2009
09/11/2025
यह अल्लाह का ज़िक्र और याद है जो हमारे दिलों को, हमारी दुनिया और ज़िन्दगी के तूफ़ानों में सुरक्षित रखती है, इसलिए अल्लाह की याद को ग़नीमत समझिए।
09/10/2024