आज हमको फ़रज यानी गिरह खोलने वाले का इंतेज़ार है यानी हम सबको न्याय को आम करने वाले ताक़तवर हाथ का इंतेज़ार है कि वह आए और ज़ुल्म के इस वर्चस्व को तोड़ दे कि जिसने पूरी इंसानियत को वंचित कर रखा है, ज़ुल्म व सितम के इस माहौल को बदल दे और इंसानों की ज़िन्दगी एक बार फिर न्याय की समीर के झोंकों से ताज़ा दम हो जाए ताकि पूरी इंसानियत को न्याय का एहसास हो। इंतेज़ार यानी इंसानी ज़िन्दगी की मौजूदा स्थिति को क़ुबूल न करना और एक क़ुबूल होने के लायक़ स्थिति की फ़िक्र में रहना। निश्चित तौर पर यह क़ाबिले क़ुबूल स्थिति ज़मीन पर अल्लाह की आख़िरी हुज्जत हज़रत इमाम महदी अलैहिस्सलाम (उन पर हमारी जाने क़ुरबान, अल्लाह उन्हें जल्द से जल्द ज़ाहिर करे) के ताक़तवर हाथों से ही बनेगी। इसलिए ख़ुद को एक जांबाज़ सिपाही और एक ऐसे इंसान की हैसियत से तैयार करना चाहिए जो इस तरह के हालात में संघर्ष कर सके और जान की बाज़ी लगा सके। इमाम ख़ामेनेई 17/08/2008
15/08/2025
पहला व्यवहारिक सबक़ यह है कि विश्व स्तर पर ज़ुल्म का अंत न सिर्फ़ यह कि मुमकिन है बल्कि निश्चित है। यह बहुत अहम बात है कि इंसानी नस्लें आज ऐसा न सोचने लगें कि विश्व स्तर पर फैले ज़ुल्म के मुक़ाबले में कोई काम नहीं किया जा सकता, वह चीज़ जो इंसानों को व्यवहार और अमल के लिए प्रेरित करती और आगे बढ़ाती है वह उम्मीद की ताक़त है। इमाम महदी के ज़ाहिर होने का अक़ीदा दिलों में उम्मीद की किरण भर देता है। इमाम ख़ामेनेई 22/10/2002
30/05/2025
उस वक़्त जब यह स्पष्ट हो जाएगा कि विश्व साम्राज्यवाद की भौतिक ताक़तों के मुक़ाबले में ऐसी ज़मीन समतल है कि हर एक शख़्स अपनी बात पर साबित क़दम रह सकता है, उस दिन इमाम के ज़ुहूर का दिन होगा। यह वह दिन होगा जब पूरी इंसानियत को नजात दिलाने वाला अल्लाह के फ़ज़्ल से ज़ाहिर होगा।उसका पैग़ाम पूरी दुनिया से सभी तैयार दिलों को अपनी ओर खींचेगा तो उस वक़्त ज़ालिम ताक़तें, ज़ोर ज़बरदस्ती का सहारा लेने वाली ताक़तें सच्चाई को, छिपाने या पीछे ढकेलने की हिम्मत नहीं कर सकेंगी। इमाम ख़ामेनेई 24/11/1999
16/05/2025
हमारी मामूली आँखें उस पाक चेहरे को क़रीब से नहीं देख रही हैं लेकिन वह सूरज की तरह चमक रहा है, दिलों के साथ संपर्क रखता और इंसानों की आत्मा से जुड़ा है। एक आत्मज्ञानी के लिए इससे बड़ी कोई नेमत नहीं हो सकती कि वह महसूस करे कि अल्लाह का वली, सच्चा इमाम, नेक बंदा, दुनिया के सभी बंदों में चुना हुआ बंदा, जो ज़मीन पर अल्लाह का ख़लीफ़ा है, उसके साथ, उसके पास, उसको देख रहा और उससे जुड़ा हुआ है। इमाम ख़ामेनेई 24/11/1999
25/04/2025
इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़ाहिर होने के इस अक़ीदे में कुछ ख़ुसूसियतें हैं जो किसी भी क़ौम की रगों में ख़ून और जिस्म में जान की तरह हैं। इनमें से एक उम्मीद है। कभी मुंहज़ोर और ताक़तवर हाथ, कमज़ोर क़ौमों को ऐसी जगह पहुंचा देते हैं कि वह उम्मीद का दामन छोड़ देती हैं। इमाम महदी अलैहिस्सलाम के ज़ाहिर होने का अक़ीदा, दिलों में उम्मीद जगाता है। वह इंसान कभी भी मायूस नहीं होता, जो इमाम महदी अलैहिस्सलाम को ज़ाहिर होने पर अक़ीदा रखता है। इमाम ख़ामेनेई 16/12/1997
18/04/2025