यह सोचना ग़लत है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम शिकस्त खा गए। क़त्ल हो जाना, शिकस्त खाना नहीं है। जंग के मोर्चे पर जो शख़्स क़त्ल हो जाता है, वह पराजित नहीं होता। पराजित वह होता है जो अपना लक्ष्य हासिल न कर पाए। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के दुश्मनों का लक्ष्य यह था कि इस्लाम और ईश्वरीय दूत की यादगारों को ज़मीन से मिटा दें। वो पराजित हो गए क्योंकि ऐसा नहीं हुआ।
शहीद इमाम ख़ामेनेई
1 जुलाई 1992
26/06/2026