इस्लामी क्रांति के शहीद लीडर के लिए अल्लाह की ओर से कामयाबी के दरवाज़े कैसे खुले?

शहीद सुप्रीम लीडर के संबंध में, नए सुप्रीम लीडर की यादें

आप जो देख रहे हैं, वह इस्लामी क्रांति के सर्वोच्च नेता, आयतुल्लाह सैयद मुज्तबा हुसैनी ख़ामेनेई (अल्लाह उनका साया क़ायम रखे) के अब तक के एकमात्र इंटरव्यू के कुछ हिस्से हैं। इतने सालों में, वह मीडिया के सामने आने और कोई भी इंटरव्यू देने से बचते रहे और यह ख़ास इंटरव्यू आयतुल्लाह सैयद जवाद ख़ामेनेई (अल्लाह उन पर रहमत नाज़िल करे) के इल्मी और आध्यात्मिक स्थान के संबंध में समारोह से एक दिन पहले हुआ, वह सिर्फ़ (अपने दादा) मरहूम आयतुल्लाह हाज सैयद जवाद ख़ामेनेई के हक़ को अदा करने और उन की शख़्सियत को सम्मान पेश करने के लिए राज़ी हुए। यह इंटरव्यू (सितम्बर 2021 का है), जो कई घंटों तक चला, मरहूम आयतुल्लाह सैयद जवाद ख़ामेनेई के बारे में बात करते हुए, कई टॉपिक पर बात हुई, जिस में व्यक्तिगत यादें और इस्लामी क्रांति के शहीद नेता की कुछ ख़ास और अनोखी ख़ूबियों का ज़िक्र भी शामिल था। बेशक, सवालों के जवाब देते हुए, उन्होंने कहा कि इस बातचीत का मेन टॉपिक उस पवित्र और नेक विद्वान के बारे में था और वे बातचीत को मुख्य विषय पर पलटा देते थे और इसलिए, वह इस्लामी क्रांति के शहीद नेता की शख़्सियत के पहलुओं को बयान करने और समझाने की स्थिति में नहीं थे। हालांकि, इस इंटरव्यू में कुछ ऐसी बातें रिकॉर्ड की गई हैं जो बहुत पढ़ने और ध्यान देने लायक़ हैं। इसलिए, हमने इस इंटरव्यू के कुछ हिस्से चुने हैं, जो मुख्य रूप से इस्लामी क्रांति के शहीद नेता के बारे में थे, ताकि KHAMENEI.IR के रीडर्स पढ़ सकें। इस इंटरव्यू का पूरा टेक्स्ट इस्लामी क्रांति प्रकाशन द्वारा आयतुल्लाह सैयद जवाद ख़ामेनेई को श्रद्धांजलि के ख़ास इश्यू में सहीफ़ह-ए-परसाई नाम से पब्लिश किया जाएगा इंशाअल्लाह।

आपके चाचाओं और भाइयों की स्मृतियों में एक बात यह है कि मरहूम आयतुल्लाह सैयद जवाद को इमाम (ख़ामेनेई) से ख़ास लगाव था; क्या इस बारे में आपके ज़ेहन में कोई बात है?

बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम

इमाम ख़ामेनेई का अपने पिता के साथ बहुत भावनात्मक और क़रीबी रिश्ता था। बेशक, पिता और बच्चों के बीच आमतौर पर क़रीबी और भावनात्मक रिश्ता होता है, लेकिन जैसा कि आपने कहा, ऐसा लगता है कि मेरे मरहूम दादा और मेरे पिता के बीच का रिश्ता सिर्फ़ भावनात्मक नहीं था, बल्कि इस से ऊपर था। शायद इसका मुख्य कारण मेरे पिता के किए गए कामों से जुड़ा है और, जैसा कि मशहूर कहावत है, मरहूम दादा के दिल में वे घर कर गए थे। मान लीजिए कि बहुत कम उम्र में, उन्हें दो बड़े स्टूडेंट मिले जो उनके पास पढ़ने आए, और ऐसा लगता है कि उनमें से एक व्यक्ति उन्हें महिलाओं की मजलिस में धार्मिक मसलों को बताने के लिए बुलाता है। उस समय, मजलिसों में धार्मिक मसलों को बताने वाला एक शख़्स होता था और किताबों से सवाल-जवाब के रूप में धार्मिक मसलों को बताता था। धार्मिक मसलों को बताने वाली किताबें तौज़ीहुल मसायल अभी अपने मौजूदा रूप में आम नहीं हुई थीं। इस तरह की किताबें जनाब आक़ाए बुरूजर्दी के समय से आम होने लगीं। मेरे पास ख़ुद मेरे नाना की किताबों से सवाल-जवाब की दो किताबें थीं। वैसे भी, वह एक व्यापारी और दुकानदार थे और उनके पास ये किताबें थीं; एक मरहूम आक़ा सैयद अबुल हसन के सवाल-जवाब की थी और एक आक़ा शैख़ अब्दुल करीम हाएरी की थी। ज़ाहिर है, वह अपने मरहूम पिता से सवाल-जवाब की उन्हीं किताबों में से एक ले लेते थे और उनके पिता उन्हें समझाते थे और वह इस ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह से संभालते थे। उस समय, मेरे पिता लगभग 12 या 13 साल के थे। तो इन हालात का मरहूम दादा के मन पर स्वाभाविक रूप से असर पड़ता था।

एक और बात यह है कि उस छोटी सी उम्र में इमाम ख़ामेनेई की शख़्सियत का इल्मी पहलू था जो ज़ाहिर हो चुका था। ज़ाहिर हैमेरे पिता की इल्मी प्रतिभा के उभरने का मरहूम दादा की इस सोच पर असर पड़ा।  जब मरहूम दादा मेरे पिता को "शरहे लुम्आ" नामक किताब पढ़ाते थे और क्लास में उनकी हाज़िर जवाबी को देखते थेतो वे कहते थे कि "अली आक़ा एक मुज्तहिद हैं"। बेशकउस उम्र में ऐसी बात का मतलब आम तौर पर इज्तिहाद की पुष्टि करना नहीं थाक्योंकि इमाम ख़ामेनेई ने बरसों तक कड़ी मेहनत की थी और कई बड़े विद्वानों से पढ़ाई की थी। यह बात अस्ल में एक तरह की तारीफ़ और सराहना थी जो मरहूम दादा मेरे पिता की पढ़ाई-लिखाई के लिए करते थेऔर उनका मतलब था कि अगर वह उन विशेष निर्देशों को मानेंगेतो वह थोड़े ही समय में आम इज्तिहाद के दर्जे तक पहुँच जाएंगे। कुछ लोग मरहूम दादा को सलाम करते थे जब वह नाफ़िला (ग़ैर वाजिब इबादत) या ज़िक्र पढ़ रहे होते थे, तो वालिद लोगों के सलाम का जवाब देते थे; मरहूम दादा नाफ़िला नमाज़ों और मुस्तहेब्बात को लेकर बहुत पाबंद थे। वालिद बताते हैं कि उन्होंने मरहूम दादा के साथ ज़ियारतों के दौरान इतनी बार ज़ियारत जामिअह अल-कबीरा पढ़ी थी कि उन्हें वह याद हो गई थी।

वैसे भी, मेरे वालिद को दूसरे बच्चों की तुलना अपने वालिद की सेवा करने का ज़्यादा मौका मिला। जैसे, उनका हर दिन अपने वालिद के घर जाना ज़रूरी था और मरहूम दादा के पास बैठे रहते थे, उन्हें किताबें पढ़कर सुनाते थे, और बातें करते थे। आम तौर पर, शिक्षा के माहौल की वजह से, उनके बीच बहुत मधुर संबंध था और इसका मतलब है कि उन भावनाओं के अलावा, इसका एक स्वाभाविक आधार भी था।

आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) ने ख़ुद हमें अपने राष्ट्रपति काल की एक घटना बताई। ख़ैर, आक़ा की आदत थी कि वह हर कुछ दिनों में अपने वालिद और वालिदा को नियमित रूप फ़ोन करते थे और उनसे बातें करते थे और उनकी ख़ैरियत पूछते थे। एक दिन, आक़ा ने उनसे कुछ मिनट बात की और फिर ख़ुदा हाफ़िज़ कहा। मरहूम दादा ने भी ख़ुदा हाफ़िज़ कहा। फिर, यह सोचकर कि आक़ा ने फ़ोन काट दिया है, दादा ने बहुत धीरे से कहा - जैसे वे अपने आप से कह रहे हों - उसी मीठे तुर्की लहजे में: "ऐ अली मैं तुम पर क़ुर्बान।" उन्हें लगा कि आक़ा ने फ़ोन काट दिया है, लेकिन आक़ा उस वक़्त तक फ़ोन का रिसीवर अपने हाथ में पकड़े हुए थे और उन्होंने यह जुमला सुन लिया था।

आम तौर पर, बाप-बेटे के रिश्ते के अलावा, इन हालात का असर होता है। इन सभी चीज़ों का उनके इमोशनल रिश्ते पर असर पड़ा है।

बेशक, सबसे बड़ी घटना मरहूम दादा के आँख से माज़ूर होने की है, जब आक़ा, अपने वालिद की वजह से क़ुम में अपनी पढ़ाई छोड़कर मशहद आ गए थे। इसका आक़ा और उनके वालिद के इमोशनल रिश्ते पर बहुत असर पड़ा होगा। 1960 के दशक की शुरुआत में, हमारे दादा की आँखों में मोतियाबिंद और ग्लूकोमा हो गया था, जो ख़तरनाक था और उनकी मदद करने, देखभाल करने और फ़ॉलो-अप करने के लिए किसी का उनके साथ होना ज़रूरी था। ख़ैर, हमारे चाचा मोहम्मद की नई नई शादी हुई थी और वे अपने अलग घर में रहते थे। हमारी फुफी, जो चाचा हादी से बड़ी थीं, उस समय किशोरावस्था में थीं। उन से छोटे बेटे, चाचा हादी भी किशोर थे। तो ज़ाहिर है, वो ज़िम्मेदारी संभालने वाले इंसान आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) थे। लेकिन वह उस समय क़ुम में थे और पढ़ाई-लिखाई और मदरसे में बहुत अच्छी स्थिति में थे और वे बड़ी लगन से पढ़ाई कर रहे थे। इससे पहले, उन्होंने क़ुम में आक़ाए बुरूजर्दी की क्लास समेत कई क्लासों में हिस्सा लिया। यह भी कहा जाता है कि आक़ाए बुरूजर्दी की क्लास के उनके नोट्स, चुने गए नोट्स में शामिल थे और उसे तारीफ़ और सराहना मिली थी। मरहूम इमाम और मरहूम मीरदमाद की क्लास में भी जाते थे और उस में उन्हें बहुत दिलचस्पी थी। इमाम की क्लास ऐसी थी जिस में स्टूडेंट्स की बहुत भीड़ होती थी और आक़ा को इस क्लास में बहुत दिलचस्पी थी। आक़ाए मीरदामाद की क्लास में उतनी भीड़ नहीं थी, लेकिन फिर भी यह एक अहम क्लास थी। मरहूम मुर्तुज़ा हायरी की क्लास में भी बहुत कम लोग होते थे और एक ऐसा भी दौर था कि सिर्फ़ आक़ा अकेले क्लास में जाते थे; यानी पूरी क्लास में एक शख़्स होता था। मरहूम आक़ा हायरी भी आक़ा को मानते थे। हाज शैख़ मुर्तज़ा ने मेरे वालिद को मानने की वजह से उन्हें अपने नोट्स पढ़ने के लिए दिए। जब आक़ा मशहद लौटे, तो उनके कुछ उस्ताद, जिनमें मरहूम हाज आक़ा मुर्तज़ा भी शामिल थे, उनके जाने से खुश नहीं थे। बेशक, क़ुम के कुछ बड़े धर्मगुरूओं के सामने उनकी तारीफ़ में कहते थे कि फ़ुलां या तो राष्ट्राध्यक्ष बनेगा या ख़ुरासान का हेड, जिसका मतलब उच्च धार्मिक शिक्षा का हेड था। ये बातें क़ुम में इमाम ख़ामेनेई के इल्मी उत्थान और तरक्की की सतह को बताती हैं। इसलिए, वह हिचकिचा रहे थे कि क्या करें। दूसरी तरफ़, उनके वालिद की वह हालत थी और वह अपने वालिद के लिए ज़िम्मेदारी महसूस करते थे। उन्हीं दिनों, एक दिन इमाम ख़ामेनेई तेहरान आए और शैख़ मोहम्मद तक़ी आमुली के बेटे स्वर्गीय आक़ा ज़िया आमुली के घर गए, जिनसे उनकी दोस्ती थी। इमाम ने कहा कि मैं जितना भी सोचता हूं, मुझे लगता है कि मेरी दुनिया और आख़ेरत क़ुम में है और दूसरी तरफ़, मेरे वालिद की ऐसी हालत। स्वर्गीय आक़ा ज़िया ने कहा कि अगर अल्लाह ने चाहा, तो वह आपके लोक-परलोक को मशहद में संवार देगा। इमाम ने कहा कि जैसे ही उन्होंने यह जुमला कहा मैं हैरत में पड़ गया कि यह बात तो मैं ख़ुद भी जानता था, लेकिन मैंने इस बात पर ध्यान क्यों नहीं दिया! इसलिए, उन्होंने बहुत आसानी से मशहद लौटने का फ़ैसला कर लिया।

मज़े की बात यह है कि इस फ़ैसले के बाद, आक़ा के लिए एक-एक करके दरवाज़े खुलते गए, पढ़ाने के मामले में, मस्जिद और प्रवचन के मामले में, वग़ैरह वग़ैरह।

क्या इसका मतलब यह है कि इस घटना के बाद मशहद की मस्जिदों में आक़ा की प्रवचन की सरगर्मियां चरम पर पहुंच जाती हैं?

हाँ, जैसा कि मुझे याद है कि वे दो मस्जिदों में सरगर्म थे; एक करामत मस्जिद थी, जिसकी केन्द्रीय हैसियत थी, और दूसरी इमाम हसन मस्जिद थी, जिसका बाद में विस्तार किया गया। इमाम हसन मस्जिद क्रांति की पृष्ठिभूमि में मुजाहिदों के इकट्ठा होने के ज़रूरी सेंटर्स में से एक थी, यानी स्टूडेंट्स और एक्टिव स्टूडेंट्स के संघर्ष का सेंटर। एक सीन जो अक्सर होता था और मुझे आज भी याद है, वह सीन था जब आक़ा खड़े होकर भाषण दे रहे होते थे और बहुत से लोग उनकी आवाज़ रिकॉर्ड करने के लिए टेप रिकॉर्डर हाथ में ऊपर उठाए होते थे। भाषण के बाद, लोग आक़ा के चारों ओर इकट्ठा हो जाते थे और बहुत भीड़ हो जाती थी।

क्या इसका मतलब यह है कि अपने वालिद की ख़ातिर आक़ा का मशहद लौटना ही उनकी सफलताओं का आधार बन गया?

ज़ाहिर है, इन सेवाओं का असर ज़रूर होता है, और जिस स्थिति में, आक़ा ने अपने वालिद के साथ जो किया, भले ही उनकी उस पर तवज्जोह न रही हो– वैसे उनकी तवज्जोह इस जानिब थी- उसका असर आक़ा की ज़िंदगी पर पड़ना था और पड़ा। बेशक, वालिद और वालेदा की इस सेवा का असर हर किसी पर अलग-अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए, जब सभी को तेहरान आना पड़ा, तो हमारे चाचा हसन मरहूम दादा और दादी के साथ मशहद में रहे। उन्होंने ख़ुद कहा कि वालिद और वालेदा की उस सेवा का असर यह हुआ कि मैं बहुत आराम और सुकून की ज़िंदगी जी रहा हूँ।

इस्लामी क्रांति के सुप्रीम लीडर और मरहूम आयतुल्लाह सैयद जवाद ख़ामेनेई के बीच इल्मी रिश्ता कैसा था? कृपया हमें उनके, वालिद के साथ उन की इल्मी बातचीत के बारे में थोड़ा बताएँ।

ज़ाहिर है, पहले मरहूम दादा हमारे चाचा आक़ा सैयद मोहम्मद को पढ़ाते थे और मेरे वालिद को आसान स्तर का सबक़ पढ़ाते थे, लेकिन कुछ समय बाद दोनों लोगों के सबक़ एक सतह के हो जाते थे और दोनों ने एक साथ मरहूम दादा से "शरहे लुमा" की पढ़ाई की। मेरे वालिद कहते थे कि जब मैं आक़ाए मीलानी की क्लास से लौट रहा होता था, तो मरहूम दादा भी हरम से नमाज़ पढ़कर लौट रहे होते थे और हम दोनों रास्ते में मिलते थे। वालिद मुझसे पूछते थे कि आक़ाए मीलानी ने आज क्लास में क्या पढ़ाया? मैं आक़ाए मीलानी की बहस सुनाना शुरू करता और वह उसे पूरा करने या समझाने के लिए कुछ पॉइंट जोड़ते थे। बेशक, मरहूम आक़ा यह सोचकर करते थे कि उस ज़रूरी बहस के तुरंत बाद, एक और उस्ताद से चर्चा करें और कुछ नए प्वाइंट्स सीखें। यह प्रॉसेस बहुत असरदार होता है और बात को दिमाग़ में बिठा देता है और अगर इसे लगातार किया जाए, तो इसका बहुत असर होता है। ऐसा लगता है कि यह प्रोग्राम कुछ समय तक चलता रहा।

उसी उम्र में, आक़ा कभी-कभी अपने वालिद की इल्मी चर्चाओं में हिस्सा लेते थे, चाहे वह कंपनी के नाम से मशहूर चर्चा हो या दूसरी चर्चाएँ, और उन्हें उन चर्चाओं में शिरकत की बातें यादें हैं। उदाहरण के लिए, एक बार वह अपने वालिद के साथ आक़ा सैयद हाशिम के घर गए थे। वहाँ, मरहूम आक़ा सैयद हाशिम एक इल्मी बहस पेश करते हैं और मेरे वालिद उनसे बहस करते हैं। जब वे चले गए, तो मरहूम दादा ने मेरे वालिद से पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया और उनसे बहस क्यों की? बेशक, मरहूम दादा ने मेरे वालिद के बहस के कंटेंट पर कोई एतराज़ नहीं जताया, बल्कि मरहूम आक़ा सैयद हाशिम के साथ उनके बहस के अंदाज़ पर सवाल उठाया था। एक बार मैंने अपने वालिद से पूछा कि आक़ा सैयद हाशिम आक़ाए नाईनी के स्टूडेंट थे और मरहूम दादा भी उनके स्टूडेंट थे। क्या आपने दोनों की इल्मी लेहाज़ से समीक्षात्मक तुलना की है? मेरे वालिद ने कहा कि कुछ लोगों का मानना था कि मरहूम दादा, सैयद हाशिम से बहुत अलग थे और इल्मी लेहाज़ से बेहतर और श्रेष्ठ थे। बेशक, उम्र के मामले में, आक़ा सैयद हाशिम 10 साल बड़े मरहूम आक़ा हकीम की उम्र के ही थे, और मरहूम आक़ा वाएज़ज़ादेह के मुताबिक़, उन्होंने नजफ़ में कुछ मुद्दत तक आक़ाए हकीम के साथ इल्मी बहस भी की थी।

एक बार, आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) ने अपने वालिद के बारे में कहा कि मरहूम वालिद को अध्ययन में बहुत दिलचस्पी थी, ख़ासकर फ़िक़्ह की अध्ययन में आख़िर तक और उन में एक अच्छी नैतिक ख़ूबी यह थी कि जब  वह मसलन हमें "किफ़ाया" नामक किताब पढ़ाते थे, तो वह कभी-कभी कहते थे, "मैंने वह ग़लत कहा।" लोग आमतौर पर ऐसा नहीं करते; जैसे, मिंबर पर, कभी-कभी जब लोग कोई ग़लती करते हैं, तो वे ग़लत शब्द को सही शब्द में इस तरह बदल देते हैं कि लोगों को पता ही न चले। ख़ैर, पढ़ाने वग़ैरह में, किसी इंसान के लिए अपनी ग़लती मानना मुश्किल होता है; यानी, अगर कोई ऐसी चीज़ें करने की कोशिश करता है, तो उसकी साख जल्दी ख़त्म हो जाती है, और आमतौर पर लोग ऐसा नहीं करते और वे अपनी ग़लती के लिए कोई तर्क भी पेश करते हैं।

मैं जो सवाल पूछना चाहता हूँ उस का यादों से ज़्यादा समीक्षात्मक पहलू है। आपने जिन टॉपिक्स का ज़िक्र किया है, उन्हें देखते हुए, आपकी राय में, इमाम ख़ामेनेई में कौन सी खूबियाँ उनके वालिद से प्रभावित हैं?

इस सवाल का जवाब देना थोड़ा मुश्किल है। नाफ़िला अर्थात ग़ैर अनिवार्य नमाज़ें पढ़ने और ऐसी चीज़ों में वे अपने वालिद जैसे हैं।

अगर मैं अपने सवाल में और साफ़-साफ़ कहूँ, तो मेरा मतलब “समानता” है; आपको क्या लगता है कि इन दो महान लोगों में क्या समानताएँ हैं?

उनमें से एक आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) का ज़ोह्द हो सकता है। यह समझाना ज़रूरी है क्योंकि यह कहना होगा कि स्वर्गीय दादा एक ज़ाहिद थे और ग़रीब भी थे। बेशक, ऐसा नहीं था कि हमारे स्वर्गीय दादा ग़रीबी की वजह से ज़ाहिद बने थे। आक़ा का ज़ोहद भी पूरी तरह से ख़ुद अख़्तियार किया हुआ है। उन्हें प्रचलित सैलरी के तौर पर कोई फ़ाइनेंशियल इनकम नहीं मिलती, यानी उन्हें कोई सैलरी ही नहीं मिलती। उदाहरण के लिए, एक बार मैं अपनी तरफ़ से एहतियात के तौर पर ऑफ़िस को कुछ रक़म देना चाहता था, तो ऑफ़िस के एक भाई ने कहा कि आक़ा ने हाल ही में अपने कामों के लिए इतनी-इतनी रक़म दी है; राज कोष से पैसे तो लेते नहीं, इस के विपरीत उसे देते हैं। यह उन नज़रानों में से एक है जो लोग उनके लिए पर्सनली लाते हैं।

नज़रानों के अलावा, लोग मोहब्बत और लगाव से आक़ा के लिए जो “गिफ़्ट” लाते हैं, वे भी उसी तरह के होते हैं; जैसे, एक बार, क़रीब 30 साल पहले, यमनी भाई उनके लिए यमनी अक़ीक़ से भरा एक टिन का डिब्बा लाए थे। इसके अलावा, वे कई पैकेट्स भी लाए थे जिनमें ख़ास नगीने थे, जिन्हें अक़ीक़ के जानकारों ने बहुत क़ीमती बताया था। उन्होंने वे सब दूसरों को दे दिए। या कोई आक़ा के लिए एक बहुत नाज़ुक और महंगी अबा लायी, आक़ा ने उसे बेचने के लिए दे दिया और उस पैसे से, उन्होंने कई अबाएं ख़रीदीं और उन्हें अलग-अलग लोगों को तोहफ़े के तौर पर दे दिए। आक़ा के सामने दुनियावी चीज़ों की बिल्कुल भी अहमियत नहीं थीं और उनके पास ऊंचा पद होने की वजह से उन्हें हर तरह की सुविधाओं का फ़ायदा मिल सकता था, लेकिन उन्होंने कभी उनका इस्तेमाल नहीं किया।

मेरे वालिद अक्सर क़ीमती तोहफ़ो को जो लोग उन्हें देते हैं, आस्तानए क़ुद्स रज़वी को दे देते हैं। आक़ा को हस्तलिखित बहुती सी किताबें तोहफ़े में दी जाती हैं, जिन्हें वह अक्सर आस्ताने कुद्स को दे देते हैं। कैलिग्राफ़ी के एक महान और उस समय के उस्ताद ने उन्हें वेसाल शिराज़ी की नस्तालीक़ लिपि के विशेष रूप में जिसे 'शिकस्ते' कहते हैं हाफ़िज़ का एक दीवान भेजा था, जो बहुत सुंदर था; मेरा इरादा इसे किसी को दिखाने का था, लेकिन मैंने देखा कि यह वहाँ नहीं था; आख़िर में, पता चला कि आक़ा ने उसे बाकी सभी अच्छी और सुंदर चीज़ों की तरह आस्ताने क़ुद्स को दे दिया था और ख़ुद अपने इस्तेमाल के लिए अपने पास नहीं रखा था। आम तौर पर, आक़ा अच्छी अच्छी चीज़ें वहाँ दे देते हैं।

मैं आपको यहाँ एक घटना बताता हूँ। जब मैं बच्चा था, तो मुझे "फ़क़ीर" शब्द से नफ़रत थी। ख़ैर, मैं एक बच्चा था और फ़क़ीर इंसान के बारे में मेरी सोच थी कि कोई ऐसा शख़्स जो सड़क के किनारे बैठकर भीख माँगता हो। उस समय, इस्लामी क्रांति सफल नहीं हुयी थी और मैं प्राइमरी स्कूल की दूसरी क्लास में था और हम मशहद में रहते थे; उसी घर में जो आज भी मौजूद है। मुझे याद है कि उसी घर के एक कोने में, खाद्य पदार्थ और वनस्पति घी के कुछ पैकेट रखे थे। हम तीनों बच्चे और वालिद वालेदा बैठकर बातें कर रहे थे, तभी आक़ा ने बातचीत के बीच में कहा कि मुझे फ़क़ीर होने पर गर्व है! जब आक़ा ने यह कहा, तो यह बात मुझ पर इतना असर कर गई कि अचानक फ़क़ीर के बारे में मेरी सोच बदल गई, और अब तक वैसी ही है। यह उनके जीवन के आग़ाज़ से ही दुनिया से लगाव न होने और तपस्वी की तरह रहने की निशानी है।

इस्लामी क्रांति के आग़ाज़ में एक इंटरव्यू में, आक़ा ने कहा था कि मैं नहीं चाहता कि ग़रीबी का दिखावा हो इसलिए मैं अपनी ज़िंदगी की यादों के बारे में बात नहीं करता और उन्हें नज़रअंदाज़ कर देता हूँ। अगर आपको ठीक लगे, तो क्या आप इसके बारे में थोड़ा बता सकते हैं?

वे अपनी ज़िंदगी में शानो शौकत को बिल्कुल भी जगह नहीं होने देते। जैसे, उनका रहना सहना बहुत सादा है। मान लीजिए उनके घर का गैस चूल्हा वही पुराना तीन-बर्नर वाला चूल्हा है जो मेज़ पर रख कर इस्तेमाल होता है जिस के बारे में मैंने अपनी माँ से कई बार बदलने के लिए कहा। इस लेहाज़ से मेरी माँ भी, वालिद से कम नहीं हैं। उनका गैस चूल्हा अभी भी वही पुराना तीन-बर्नर वाला चूल्हा है जिसे वे टेबल पर रख कर इस्तेमाल करती हैं! हमारे बहुत आग्रह के बावजूद, मेरी माँ ने आख़िरकार मना कर दिया और कहा कि यह बिल्कुल मुमकिन नहीं है।

कुछ साल पहले तक, आक़ा के घर में टीवी वही पुराना टीवी था। उस समय लगभग पचास हज़ार तूमान में एक एंटीना रिसीवर ख़रीदा गया था, और मैं इसे टीवी से कनेक्ट करने आया था। आक़ा नमाज़ पढ़ रहे थे। मैंने देखा कि यह टीवी इतना पुराना था कि उस में एंटीना रिसीवर का प्लग लगाने की जगह नहीं थी। हमारा अपना टीवी भी पुराना है, लेकिन उस में प्लग लगाने की जगह है और हमने यह नहीं सोचा था कि यह टीवी इतना पुराना होगा कि इसमें रिसीवर को कनेक्ट करने के लिए प्लग लगाने की जगह नहीं होगी। उसके बाद, वह टीवी वास्तव में इस्तेमाल के लायक़ नहीं रहा, तो कुछ साल के बाद, साधारण टीवी जो अब आम हैं और कुछ चैनल रिसीव करता है, आक़ा के घर में आ गया।

एक और मिसाल यह है कि सन 2002 से, आक़ा पीठ दर्द के कारण, डॉक्टर के कहने पर कुर्सी पर बैठने के लिए मजबूर हैं। यहां तक कि उन्हें दो नमाज़ों के बीच भी कुर्सी पर बैठना पड़ता है और शायद ही कभी फ़र्श पर बैठते हों और माँ की पीठ में भी दर्द है। लेकिन आक़ा के घर में कुर्सियाँ और मेज़ प्लास्टिक की हैं; जैसे दुकानों में लकड़ी या लोहे की कुर्सियों के बजाए प्लास्टिक की कुर्सियाँ होती हैं, ताकि अतिरिक्त ख़र्च न हो। उन्होंने ऐसी कई प्लास्टिक की कुर्सियाँ ख़रीदी हैं और मेहमानों के लिए घर के पिछले कमरे में एक कोने में एक के ऊपर एक रख दी हैं, जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर कमरे में इधर-उधर लगाया जा सके।

ऐसी पुरानी चीज़ों में, हम आक़ा के पलंग का ज़िक्र कर सकते हैं। आक़ा जिस पलंग पर अब भी सोते हैं, वह वही है जिस पर वह 1981 से सो रहे हैं, यानी जानलेवा हमले और उस में लगी चोट के बाद से, और वह इसे अब तक 40 बर्सों से इस्तेमाल कर रहे हैं। अगर कोई पेन और कागज़ ले, तो वह शायद इन पुरानी चीज़ों की लिस्ट में 15 से ज़्यादा आइटम नहीं जोड़ सकता। वालेदा भी इस लेहाज़ से बहुत प्रभावी रही हैं। वह भी इतने बरसों से आक़ा के साथ साथ रही हैं।

ज़ोह्द के अलावा, आक़ा और उनके माँ-बाप में और क्या समानताएँ हैं?

वालिद  अपनी राजनैतिक समझ, बहुत ज़्यादा अनुभव और हर छोटी-छोटी बात पर ध्यान देने के साथ ही, एक तरह की ख़ास सच्चाई और ईमानदारी रखते हैं। आज, क्रांति को 42 साल हो गए हैं, और क्रांति की कामयाबी से भी पहले शायद कामयाबी के 15 साल से ज़्यादा पहले से भी यह सघर्ष जारी है, और इस वजह से, उनके अनुभव और फ़ैसले अलग-अलग हैं, लेकिन इसके बावजूद, उनमें ख़ास तरह की ईमानदारी है। पवित्रता का मतलब है ईमानदारी। शायद इस का संबंध उन दो महान लोगों, यानी दादा-दादी से हो सकता है, क्योंकि उनमें भी वैसी ही सच्चाई थी। इस सच्चाई का एक उदाहरण है उनके लहजे में साफ़गोई है।

मैंने दादी में साफ़गोई की यह हालत देखी है; जैसे, अगर कोई किसी दूसरे की बुराई कर रहा होता, तो वे उसे साफ़-साफ़ कहतीं थीं कि बुराई मत करो या वे उसकी बात को काट देती थीं। मुझे याद है जब मैं बच्चा था, और हम उनके, अपनी माँ और कुछ और लोगों के साथ अहमदाबाद स्ट्रीट की शुरुआत में किसी मजलिस में जाते थे।

वहाँ मकान मालिक की कुछ बच्चियां- या दूसरे मेहमान हेजाब नहीं करते थे। दादी ने उसी जगह पर एक एक बच्चे से बहुत ही नर्म अंदाज में "मेरी बेटी" और... इस तरह के लहजे में बात करनी शुरू की और स्थिति के बारे में पूछा, यहाँ तक कि सब ने वहाँ हेजाब कर लिया। हालांकि दादी मरहूमा का किसी प्रभावी हल्क़े से कोई संबंध था और न ही कोई दूसरी प्रभावी पृष्ठिभूमि। 

एक और वाक़ेया, जैसे दादी जब तेहरान आयी थीं और कुछ अधिकारियों के घरों की महिलाओं को जब पता चलता तो वे हमारी माँ के ज़रिए उन्हें दावत पर बुलाती थीं। एक बार एक दावत में एक अहम शख़्सियत के घर में, उन्होंने शाम की चाय पर कई तरह के पकवान तैयार किए थे। लेकिन हमारी संस्कृति ख़ास तौर पर दादी मरहूमा के लेहाज़ से वह बहुत ज़्यादा था, वे मुलाक़ात के बाद व्यक्तिगत रूप से सचेत करती हैं कि आप लोगों ने फ़ुज़ूलख़र्ची की, आप फ़ुज़ूलख़र्ची क्यों करते हैं। मेरी दादी भलाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने के इस्लामी उसूल के मामले में भी बहुत सीधे अंदाज़ में बात करती थीं और यही सीधा अंदाज़ मेरे पिता में भी है। मिसाल के तौर पर जब हज़रत आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) को ईरान शहर जिलावतन किया गया, हम उन से मुलाक़ात के लिए गए थे। मैं तीसरी क्लास में था। रमज़ान का महीना था, मौसम गर्म था। मैं कोई किताब पढ़ना चाहता था, लेकिन मेरे पास कोई किताब नहीं थी। उस वक़्त आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) के पास शहर की तीन लाइब्रेरियों की कुंजी थी। हम साथ में गए कि एक किताब ले आएं। रास्ते में देखा कि एक जवान शख़्स (रमज़ान के महीने में) खुले आम सैंडविच खा रहा था। आक़ा ने उसी जगह उसे सचेत किया। ज़रा सोचिए कि आक़ा उस शहर में जिलावतनी की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे लेकिन फिर भी बुराई से रोकने के अमल से पीछे नहीं थे।

आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) को किताब और अध्ययन के बहुत शौक़ की वजह क्या थीक्या यह भी आपकी नज़र में विरासत में मिली हुई ख़ूबी है?

वालिद के माँ बाप दोनों को किताब पढ़ने का बहुत शौक़ था। दादा के बारे में तो पता है, दादी को भी किताब पढ़ने का शौक़ था, जहाँ तक याद है मैंने ख़ुद दादी से सुना था कि मैं आक़ा (यानी मेरे दादा) से ज़्यादा हदीस जानती हूं। शायद उनकी मुराद मुख़्तलिफ़ मसलों के इल्म के बारे में थी और यह कि मरहूम दादा को फ़िक़्ह का ज्ञान है और उन्हें हदीस का ज्ञान है। लेकिन इस के साथ मेरे ख़याल में किताब और अध्धयन का इस हद तक शौक़ जो वालिद (इमाम ख़ामेनेई) में है, वह उनकी व्यक्तिगत ख़ूबी लगती है। 

आप के लिए यह जानना भी रोचक होगा कि जब आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) 12 या 13 साल के थे, कभी उन दुकानों में जाते थे जहाँ पुरानी किताबें होती थीं, उन किताबों में से काम की किताबें छांट लेते थे। बाद में ख़ुद उन किताबों पर जिल्द चढ़ाते थे और फिर अध्ययन करते थे। इस वक़्त मेरे पास एक किताब है जिसका नाम "निसाबुस सिब्यान" है, जो उन्हीं दिनों की किताब है और उस पर ख़ुद आक़ा ने जिल्द चढ़ाई है। "निसाबुस सिब्यान" किताब शायद पहली पढ़ाई की किताब होगी और मेरे पास वह, आक़ा के हाथों से जिल्द चढ़ाई हुयी किताबों में से है। एक बार मैंने, कार्यालय के एक कर्मचारी से जो कमरे को ठीक करने में मेरी मदद करते थे, उन्हें यह बात बतायी कि जैसे कि आक़ा के पास (नई) किताब ख़रीदने के पैसे नहीं होते थे और वे किताबों में से जो सस्ती होती थी, इन्हें इक्टठा करते थे और उन पर जिल्द चढ़ा देते थे। जब मैं उन्हें यह बात बता रहा था तो उन पर इस बात का बहुत असर हुआ। 

इसलिए मुझे लगता है कि उन में अध्ययन का शौक़, एक अलग ही चीज़ है। मिसाल के तौर पर आक़ा, किताब पढ़े बिना सो नहीं सकते, मगर यह कि कोई असाधारण स्थिति पेश आ जाए वरना वे हमेशा किताब पढ़ कर सोते हैं। उन्होंने विषय की विविधता के लेहाज़ से बहुत व्यापक हैरतअंगेज़ अध्ययन किया है।

अगर कोई उन्हें, उनकी जवानी के वक़्त में देखता था तो उसे हैरत होती थी और इस बात को उन लोगों ने भी कहा है जिन का धार्मिक शिक्षा केन्द्र से संबंध नहीं था। मिसाल के तौर पर साहित्य और शायरी के मैदान के लोगों ने या जिन का दार्शनिक विषयों से संबंध था।

आप ने अपने दादा को कब देखा था और उन के निधन के बारे में आप को कैसे पता चला?

मैं अपनी फ़ैमिली में आख़िरी शख़्स था जिस ने दादा को इंतेक़ाल से पहले देखा। इसी तरह दादी मरहूमा को भी देखने वाला मैं आख़िरी शख़्स था। यानी संयोग से ऐसा हुआ। 1986 के जून के अंत में, जंग के मोर्चे पर मैं किसी अजीब बीमारी का शिकार था। जो भी मुझे देखता, वह मेरे पीले चेहरे को देखते ही समझ जाता कि मैं बहुत बीमार हूं और मैं भी लोगों की बातों से समझ जाता था कि मेरी हालत बहुत ख़राब है। मैं छुट्टी नहीं लेता था, इसलिए ख़ुद कमाडंर ने कहा कि तुम्हें तेहरान लौटना होगा। रमज़ान का महीना था और मैं कमांडर के कहने पर छुट्टी लेकर आया। पहले तेहरान आया और फिर कुछ दिन बाद दोस्तों के साथ हम मशहद गए। पहले नानी के घर गया और फिर दादा के घर गया। मरहूम दादा और दादी बीमारी और बुढ़ापे की वजह से रोज़ा नहीं रख सकते थे, इसलिए उन्होंने दोपहर का खाना बनाया था। मैं भी मशहद में मुसाफ़िर की हैसियत से था इसलिए रोज़ा नहीं रख रहा था। दानी ने मुझसे कहा कि दोपहर का खाना साथ में खाएंगे; आज हम ने दोपहर के खाने में दादा के लिए चावल और गोश्त बनाया है, तुम भी साथ में खाओ। मैं रुक गया और 3 लोग दस्तरख़ान पर बैठे। उस दिन की जो बात मुझे याद है वह यह है कि मरहूम दादा बार बार मेरी प्लेट में गोश्त डालते और कहते थे खाओ। खाने के बाद दादी ने दादा से कहा कि मुज्तबा मोर्चे पर जाना चाहते हैं। मरहूम दादा से विदा हुआ और वे आराम करने चले गए; दादी भी आम तौर पर दोपहर को सोती थीं, मैंने पढ़ने के लिए एक किताब उठायी और आराम करने के बाद विदा हुआ और जहाँ दोस्तों से मिलना था, वहाँ चला गया। 

तेहरान लौटने पर, कुछ दिन तेहरान में रहा और छुट्टी पूरी होने पर जंग के मोर्चे पर लौट आया। जल्द ही कर्बला ऑप्रेशन शुरू हो गया। इस आप्रेशन के दूसरे चरण के बाद, एक रात मोर्चे से बैरक की ओर लोट रहे थे कि दादा दादी को याद करने लगा। दुनिया में इतने विचारों के बीच अचानक मेरे मन में यह बात आयी कि अगर चरमपंथी छापामार दादा दादी के घर जाएं कि जिनकी रक्षा के लिए गार्ड नहीं हैं, उन्हें नुक़सान पहुंचा दें या उनका अपहरण कर लें तब हम क्या करेंगे?! वास्तव में मेरे मन में यह विचार संभवतः उसी वक़्त आए जिस वक़्त दादा की मौत हुयी। इन विचारों के साथ बैरक की ओर पलटे और ज़्यादा थकन की वजह से कुछ नहीं किया और सो गया। उस इलाक़े में एक नदी थी उस का नाम गावी था, बहुत चौड़ी नदी लेकिन गहराई कम थी और पानी जारी था। सुबह को जाकर नदी में पानी में बैठ गया ताकि सिर और बदन में लगी मिट्टी धुल जाए। बाक़ी जवान भी थोड़ी थोड़ी तादाद में उठ रहे थे और कुछ मेरी तरह आकर नदी में बैठ जाते ताकि उनके कपड़े साफ़ हो जाएं और कुछ दूसरे कामों जैसे नाश्ता वग़ैरह तैयार करने जा रहे थे। इसी बीच एक शख़्स कैंप से निकल कर हमारी ओर आ रहा था और बिना किसी भूमिका के उस ने कहाः "मोहम्मद जवाद ख़ामेनेई से तुम्हारा क्या संबंध है?" हम दादा को इस नाम से नहीं पहचानते थे लेकिन उस ने कहा मोहम्मद जवाद! मैं सोचने लगा कि मोहम्मद जवाद कौन हैं और मेरे दिमाग़ में दादा का ख़याल ही न आए। उस ने दोबारा कहाः "आयतुल्लाह सैयद मोहम्मद जवाद हुसैनी ख़ामेनेई से तुम्हारा क्या संबंध है?" मैंने कहा कि मेरे दादा हैं। उस ने अचानक कहाः "उनका निधन हो गया!" मैं उस वक़्त पानी में बैठा हुआ थ और जैसे उस ने यह कहा मेरा दिल बैठ गया। उस बंदे की उम्र 17 साल से ज़्यादा नहीं थी; मालूम नहीं वह मज़ाक़ करना चाहता था या उसे लगा कि इस तरह ख़बर देना ठीक रहेगा। बाद में उस ने बहुत सम्मानीय ढंग से सांत्वना दी और साथी भी एक एक कर के आए और उन्होंने सांत्वना दी। शायद यह हुआ था कि साथी रेडियो ऑन करते हैं कि सुबह की ख़बर सुनें और उस में राष्ट्रपति के पिता के निधन की पहली ख़बर दी जाती है। वहीं पर इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) के सांत्वना संदेश को पढ़ते हैं। चूंकि ऑप्रेशन ख़त्म हो गया था और कोई ख़ास काम नहीं बचा था, बटालियन के उपकमांडर की इजाज़त से दोपहर के बाद, फ़ोर्सेज़ से अलग हुआ और ख़ुद अंदेमिश्क पहुंचा और वहाँ से ट्रेन से तेहरान आया। जब पहुंचा तो अगले दिन मरहूम दादा दफ़्न हो चुके थे और वालिद मशहद से लौट आए थे। मरहूम हाजी शमक़द्री और आईआरजीसी के कुछ सदस्य और हमारे मामू जनाब महदी ख़ुजस्ते साहब मौजूद थे। शायद आक़ा मुस्तफ़ा भी आक़ा के साथ तेहरान में थे। मैं राष्ट्रपति कार्यालय पहुंचा, आक़ा ने ऐवान के ऊपर हमें देखा और हम ने उन के चेहरे को चूमा। आक़ा बहुत दुखी थे जो उन के चेहरे से पूरी तरह ज़ाहिर था।

जिस याद का इस मौक़े पर ज़िक्र करना उचित होगा वह यह है कि मेरे पिता ने उन्हीं दिनों मरहूम दादा को सपने में देखा था जो बैग उठाए जा रहे थे। चूंकि मैं भी उन दिनों मोर्चे पर था तो उन्हें यह लगा कि शायद इस ख़्वाब की ताबीर यह है कि मैं शहीद हो गया हूं। संयोगवश उसी ऑप्रेशन के पलहे चरण में, उस समय ऑप्रेशन की पहली रात को जो हंगामा था, लश्कर के विशेष अधिकारी ने मेरे और मेरे कुछ साथियों के नाम को लापता लोगों में दर्ज किया था। मरहूम जनाब हाशेमी साहब आक़ा से कहते हैं कि क्या आप ने मुज्तबा को जंग के मोर्चे पर भेजा था? आक़ा कहते हैं जी हाँ। उन्होंने भी कहा कि बेटे को मोर्चे पर क्यों भेज दिया और आक़ा ने जवाब में कहा था कि क्या कुछ हो गया है?  और उन्होंने भी संभवतः आक़ा को ज़ेहनी तौर पर तैयार करने के लिए, कहा थाः नहीं, कुछ सुनने में आ रहा है। मंत्रीमंडल की बैठक में भी कहा था कि संभवतः आक़ाए ख़ामेनेई का बेटा शहीद हो गया है और इसी वजह से मेरे संबंध में यह ख़याल था। इसलिए जब मैं तेहरान आया तो आग़ाज़ में सब मुझे अजीब निगाह से देख रहे थे। आक़ा ने उसी वक़्त अपने इस ख़्वाब को मुझे बताया और इस तरह मेरे मन में यह ख़याल आया कि उस ख़्वाब का संबंध मेरे मरहूम दादा से था और वास्तव में ख़ुद वही थे जो जा रहे थे। 

कुल मिलाकर यह कि उसी दिन शाम को मैं मशहद रवाना हो गया। मेरी नानी एयरपोर्ट आयी थीं और वहीं से मुझे सीधे फ़ातहे की मजलिस में ले गए थे। फ़ातहे की मजलिस के बाद मैं दादा के घर आया जहाँ जनाब दानिश्मंद, जनाब लेवाई और दूसरे लोग मौजूद थे। उस के बाद फ़ातहे की अनेक मजलिसों में जो तुर्कों की मस्जिद, इमाम हसन मस्जिद (अलैहिस्सलाम) में हुयी, कि जहाँ मरहूम दादा जाते थे, मैंने शिरकत की।

दादा मरहूम की क़ब्र, इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के सिरहाने की सीध में पड़ती है। उस वक़्त (क़ब्र की) सिर्फ़ कुछ जगहें ख़ाली थीं जो धर्मगुरुओं के लिए विशेष थीं। इस बात के मद्देनज़र कि उन्होंने कभी भी अपने दफ़्न होने की जगह के बारे में कभी सोचा नहीं था और न ही कभी कोई वसीयत की थी, ऐसा लगता है कि यह अल्लाह की कृपा थी कि उन्हें वहाँ दफ़्न होने का सौभाग्य मिला। चूंकि सिरहाने का भाग महिलाओं (की ज़ियारत) के लिए विशेष है, मेरे पिता सिर्फ़ उस वक़्त वहाँ फ़ातेहा पढ़ने जा पाते हैं जब इमाम रज़ा की ज़रीह की विशेष सफ़ाई का कार्यक्रम होता है। जब दादी का निधन हुआ तो वे भी महिलाओं के इसी विशेष हिस्से में थोड़े से फ़ासले पर, "दारुज़्ज़ियाफ़ा नामक" स्थान पर दफ़्न हुयीं।

मैंने मरहूम दादा को ख़्वाब में बहुत अच्छी हालत में देखा। एक रात ख़्वाब में देखा कि मरहूम दादा जमाअत की नमाज़ के लिए आए हुए हैं और उन्हें जमाअत की नमाज़ पढ़ाना है। अज़ान कही गयी लेकिन अक़ामत से पहले, खजूर के एक बर्तन से उन्होंने एक या दो खजूरें उठाईं और खायीं। जब मैंने अपने पिता को यह ख़्वाब सुनाया तो उन्होंने कहा कि अलहम्दुलिल्लाह स्पष्ट हो गया है कि आक़ा (दादा) की नमाज़ क़ुबूल हो गयी है। 

आख़िरी सवालः दादा के निधन के बादक्या आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) उन के लिए कोई ख़ास काम अंजाम देते थे?

जी हाँ उनकी ज़िंदगी में भी और उसके बाद भी। मिसाल के तौर पर उन के लिए नमाज़ पढ़ते थे, जब हम नौजवान थे तो साल के आग़ाज़ में चूंकि अज़ान जल्दी होती है और आक़ा (इमाम ख़ामेनेई) भी नमाज़े शब पढ़ते थे, तो उन्हें सुबह की नमाज़ (अज़ान के फ़ौरन बाद) पढ़ते हुए नहीं देख पाते थे लेकिन जाड़े के मौसम में जब तेहरान में सुबह की नमाज़ का वक़्त छह बजे से कुछ पहले होता है, आक़ा को (अज़ान के फ़ौरन बाद) नमाज़ पढ़ते देख पाता था। क़रीब 6 बजे सुबह वे हम सबको जगाते थे और हम सब पहले नमाज़ पढ़ते फिर नाश्ता करते और स्कूल चले जाते थे। एक बार मैंने उनसे पूछा कि यह कैसी नमाज़ है जो आप पढ़ते हैं, उन्होंने कहा कि यह मैं हर दिन अपने माँ बाप को हदिया करता हूं। इस नमाज़ को वे उस वक़्त पढ़ते थे जब दोनों (मेरे दादा दादी) ज़िंदा थे। मुझे लगता है कि आक़ा अभी भी उसे पढ़ते हैं लेकिन वक़्त बदल गया है और सुबह की अज़ान से पहले पढ़ते हैं। इन दिनों जब उनके पास रहने का सौभाग्य मिला तो सुबह की नमाज़ के बाद उनकी सेवा में था तो मैंने उन्हें उस नमाज़ को पढ़ते नहीं देखा और संभवतः वह रात में पढ़ने लगे हों। 

मेरा अंदाज़ा यह है कि इन हस्तियों (दादा दादी) के निधन के बाद, आक़ा ने इस से हट कर भी काम किया होगा। चूंकि आक़ा कुछ लोगों के लिए जो दूर के रिश्तेदार हैं, कुछ काम हमेशा करते हैं; मुर्दों के लिए भी और ज़िंदों के लिए भी। आक़ा कभी कभी उन लोगों की मग़्फ़ेरत की दुआ करते हैं जिन से उनका कोई ख़ास संबंध भी नहीं होगा।

 

 

20/03/2026

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