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इस्लामी इंक़ेलाब की 47वीं सालगिरह के जश्न के मौक़े पर अवाम के मुख़्तलिफ़ वर्ग के लोगों से ख़ेताब

इस्लामी इंक़ेलाब की 47वीं सालगिरह के जश्न के मौक़े पर अवाम के मुख़्तलिफ़ वर्ग के लोगों से ख़ेताब

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता आयतुल्लाह ख़ामेनेई ने 12 बहमन मुताबिक़ 1 फ़रवरी 2026 को इस्लामी इंक़ेलाब की 47वीं सालगिरह के जश्न के मौक़े पर अवाम के मुख़्तलिफ़ वर्ग के लोगों से ख़ेताब करते हुए, इस्लामी इंक़ेलाब, इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व, मुल्क के ताज़ा हालात और अमरीका के साथ जारी तनाव के बारे में अहम बिन्दु पेश किए।

इस्लामी इंक़ेलाब के नेता का ख़ेताब इस प्रकार हैः

बिस्मिल्लाह अर्रहमान अर्रहीम

अरबी ख़ुतबे का अनुवादः सारी तारीफ़ पूरी कायनात के पालनहार के लिए है और दुरूद व सलाम हो हमारे सरदार और पैग़म्बर अबुल क़ासिम मुस्तफ़ा मोहम्मद और उनकी सबसे पाकपाकीज़ा और चुनी हुयी नस्ल पर ख़ास कर ज़मीनों पर अल्लाह के ज़रिए बाक़ी रखी गई हस्ती पर।

सभी भाइयों और बहनों का स्वागत है जिन्होंने अपने आगमन से इस इमामबाड़े की शोभा बढ़ा दी। 

आज मैं (अपनी स्पीच में) फ़रवरी के बारे में जो एक अहम तारीख़ हैकुछ बातें अर्ज़ करुंगाकुछ जुमले उस फ़ितने के बारे में अर्ज़ करुंगा जो अभी दो हफ़्ते पहले हुआ। इस बारे में व्याख्या करुंगा कि यह कैसा वाक़ेया था और क्या हुआ था और कुछ संक्षिप्त बातें अमरीका के बारे में अर्ज़ करुंगा। ये वे बिन्दु हैं जो मैं ने आज भाइयों और बहनों के सामने पेश करने के लिए नोट किए हैं। 

12  बहमन बराबर फ़रवरी एक अद्वितीय दिन है। साल के कुछ दिन ऐसे हैं जिन के बारे में आप जानते हैं कि उन में कौन से वाक़ेआत हुए और ये कितने बड़े और अहम दिन हैं। यह दिन इतिहास में अपने वाक़यों और घटनाओं के नाम से लिखे जाते हैंलेकिन कुछ दिन इतने अहम होते हैं कि इतिहास से ऊपर होते हैंये दिन अस्ल में इतिहास लिखते हैं। इन दिनों में जो वाक़ए होते हैं वे इतिहास की धारा बदल देते हैं। 12 बहमन बराबर 1 फ़रवरी ऐसा ही दिन है।

इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) ख़तरों के बीच तेहरान आएख़तरों के बीच में! आपनौजवानों ने वे दिन नहीं देखे हैं। अमरीका से ख़तरा थाज़ायोनी सरकार से ख़तरा थाआतंकवादियों की ओर से ख़तरा था; बाद में मालूम हुआ कि उन्होंने इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) के आने के संबंध में कैसी योजनाएं बनायी थीं। उन सभी ख़तरों के बीच इमाम ख़ुमैनी तेहरान आए। 12 बहमन मुताबिक़ फ़रवरी को इमाम ख़ुमैनी का जो स्वागत हुआजहाँ तक मुझे जानकारी हैख़ुद हमारे अपने दौर के इतिहास मेंजिस में आबादी ज़्यादा है और साधन और सहूलतें बढ़ चुकी हैंउसकी कोई मिसाल नहीं मिलतीइमाम (ख़ुमैनी) का हैरतअंगेज़ स्वागत हुआ। 

एक रहनुमाएक महान हस्तीएक बड़ा नेता समाज में आयासमाज ने गर्मजोशी के साथ उसको अपनी आग़ोश में लिया। यह एक अहम वाक़ेया थालेकिन इमाम ख़ुमैनी ने उसको एक औपचारिक वाक़ेया नहीं रहने दिया। कभी कभी इस तरह के काम औपचारिक तौर पर अंजाम दिए जाते हैंआते हैंसम्मान करते हैं और फिर चले जाते हैं। वह भी चला जाता है और स्वागत करने वाले भी चले जाते हैं। इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) ने उसको सिर्फ़ एक औपचारिक स्वागत की शक्ल में बाक़ी नहीं रहने दिया और शुरूआत के लम्हों से ही उस पर काम करना शुरू कर दिया। 

इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) ने पहला काम जो किया वह यह था कि उन्होंने पहले ही दिनशाही व्यवस्था के अंत का एलान कर दिया। इमाम (ख़ुमैनी) रहमतुल्लाह अलैह ने बहिश्ते ज़हरा (तेहरान के क़ब्रिस्तान) में दसियों लाख की तादाद में मौजूद अवाम से ख़ेताब में उस शाही व्यवस्था के अंत का एलान कर दिया जिसके बारे में कहा जाता था कि उसका हज़ारों साल का इतिहास है। इमाम (ख़ुमैनी) ने उस सिस्टम की जगह एक अहम और बेमिसाल ख़ुसूसियत वाले एक नए सिस्टम का एलान कर दिया। यह नया सिस्टम जिस की शुभसूचना इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) ने तेहरान पहुचंने पर 12 बहमन (बराबर फ़रवरी) को दी थीअहम ख़ुसूसियत रखता है जिन में कुछ की ओर मैं इशारा कर सकता हूंलेकिन जो इमाम (ख़ुमैनी) ने फ़रमायाउसकी दो बुनियादी और अहम ख़ुसूसियतें हैं। एक यह है कि तानाशाही हुकूमत को अवाम की हुकूमत में बदल देता हैयह बहुत अहम ख़ुसूसियत है। इस मुल्क में अवाम की कोई हैसियत नहीं थीयहाँ तक कि मंत्रियों और सरकारों की भी कोई हैसियत नहीं थीहर चीज़सब कुछएक दरबार में तैयार और लागू होता था। यह सरकार एक अवामी सरकार बन गयी; ऐसी सरकार जिसमें अवाम अपनी राय का इज़ाहर करेंचयन करें और अख़्तियार भी उन्हीं के पास रहे। 

दूसरी ख़ुसूसियत यह थी इस ने मुल्क पर छायी हुयी धर्म विरोधी सोच की जगह धार्मिक और इस्लामी सोच को प्रचलित किया। अगर कोई पहलवी हुकूमत में शामिल लोगों के बारे में लिखी गयी तहरीरों को जो उसी ज़माने में लिखी गयी हैंपढ़े तो देखेगा और समझेगा कि ईरान पूरी तरह धर्म विरोधी रास्ते पर बढ़ रहा था; जिस में धर्म और क़ुरआन की कोई निशानी नहीं थीमुल्क उस दिशा में बढ़ रहा था।

इमाम (ख़ुमैनी) ने 180 डिग्री रास्ता बदल दिया। अलबत्ता मुल्क को एक दफ़ा में सौ फ़ीसदी धर्म के मुताबिक़ नहीं किया जा सकता। लेकिन धार्मिक दिशा में क़दम उठाया और धीरे धीरे धार्मिक दिशा में बढ़ने लगा। अगर हमयानी हम अधिकारी अपने फ़रीज़े पर सही तौर पर अमल करते तो अब तक जो किया गया हैउस से मुल्क वाक़ई धार्मिक हो गया होता। वाक़ई हम ने कुछ सरकारों ने, कुछ अधिकारियों ने और कुछ लोगों ने जो कुछ कर सकते थेकोताही कीजो काम कर सकते थेवह हम ने नहीं किएजो काम नहीं करने चाहिए थेवह किए। लेकिन फिर उसी रास्ते पर आगे बढ़े जिसकी बुनियाद इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) ने रखी थीयानी हम धार्मिक और इस्लामी रास्ते पर आगे बढ़े हैं। 

एक और ख़ुसूसियत जो इस नई सरकार में थी जिसका ज़िक्र इमाम (रहमतुल्लाह अलैह) के भाषणों में होता था और ख़ुसूसियतों में जिन का इमाम ज़िक्र फ़रमाया करते थेबहुत अहम थी और जिससे साम्राज्यवाद घबरा जाता थाईरान पर अमरीका के प्रभाव का अंत था। इमाम (रहमतुल्लाह अलैह) ने अपने भाषणों में शुरू में हीईरान पर अमरीका के प्रभाव को ख़त्म करने का एलान कर दिया। मैं अपनी बात के अंत में इस सिलसिले में कुछ बातें बयान करुंगा। यह भी वह ख़ुसूसियत थी जिस से अमरीकी घबरा गए। जिस चीज़ से अमरीकी घबरा गए और परेशान हो गए और जिसकी वजह से वह दुश्मनी पर उतर आएयह थी कि एलान किया गया कि हमारे मुल्क में हस्तक्षेप की इजाज़त नहीं है; मुल्क ईरानी क़ौम का है, इसलिए वह ख़ुद और उसके द्वारा चुने गए लोग ही उसके बारे में फ़ैसला करेंगे। 

इंक़ेलाब और सरकार के अवामी होने के बारे मेंमैंने अर्ज़ किया कि यह इस्लामी सिस्टम की ख़ुसूसियत थीजो काम इमाम (ख़ुमैनी) ने किया वह यह था कि अवाम कोईरानी क़ौम को उसकी अपनी सलाहियतों और क़द्र व क़ीमत की ओर से जागरुक बनाया। इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) का बयान बहुत प्रभावी थाउनकी बातें दिलों में बैठ जाती थीं। इमाम (ख़ुमैनी) ने अवाम का ध्यान इस ओर मोड़ा कि उनके भीतर क्या सलाहियतें पायी जाती हैं। यह बात कि "हम कर सकते हैं" बहुत अहम है। हम जो इंक़ेलाब से पहले ज़िंदगी गुज़ार चुके हैंयहाँ तक कि जो संघर्ष हम भी कर चुके हैंवाक़ई यह समझते थे कि ईरानी कुछ नहीं कर सकते! हम से नहीं हो सकता, मुल्क के भीतर अवाम की यह सोच बन गयी थीइमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) आए और उस सोच को ख़त्म कर दिया। उन्होंने एलान किया कि "हम कर सकते हैं।" उन्होंने हमें अपनी क़द्र पहचनवायी, हमें ख़ुद अपनी सलाहियतों से सूचित किया। क़ाजारियों और पहलवियों के दौर में क़ौम को हक़ीर बना दिया गया था। ईरानी अवाम को अपने उस अतीत के साथउस सभ्यता के साथउस इल्म के साथउन महान वैज्ञानिकों और विद्वानों के साथउन बड़ी लाइब्रेरियों के साथपहली क़ाजारी सरकार से आख़िरी पहलवी सरकार के दौर में लगातार हक़ीर बनाया गया। हमें एक पिछड़ी क़ौम बना दिया गया, हम इल्म में पिछड़े हुए थेटेक्नॉलोजी में पिछड़े हुए थे और राजनीति में पिछड़े हुए थेक्षेत्र की राजनीति में हमारा कोई प्रभाव नहीं थाअंतर्राष्ट्रीय राजनीति तो बहुत दूर की बात है!

मैं ने यहाँ एक बार एक वाक़ए का ज़िक्र किया था(1) कि पहले विश्व युद्ध के बाद दुनिया के मुल्कों को पेरिस कान्फ़्रेंस में बुलाया गया कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों के बारे में फ़ैसला करेंईरान से एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल पेरिस कान्फ़्रेंस में शिरकत के लिए गया लेकिन उसको कान्फ़्रेंस में नहीं जाने दिया गया। ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने कई दिन इंतेज़ार किया लेकिन कान्फ़्रेंस में जाने की इजाज़त नहीं दी गयी। महान ईरान कोसभ्य ईरान कोउस ईरान को जो कभी इल्म और दर्शनशास्त्र का केन्द्र थाइस हालत में पहुंचा दिया गया। इस तरह अपमान किया गयाइतना छोटा कर दिया गया! इल्म मेंटेक्नॉलोजी मेंराजनीति मेंजीवन शैली मेंअंतर्राष्ट्रीय साख मेंक्षेत्रीय फ़ैसलों मेंइन तमाम मैदानों मेंपहलवी और क़ाजारी दौर में ईरान पिछड़ा हुआ थान कोई आविष्कारन इनोवेशनन कोई अहम काम और न कोई उल्लेखनीय क़दम।

इमाम (ख़ुमैनी) ने अवाम को इस पिछड़ेपन के संबंध में संवेदनशील बनाया कि क़ौम सोचे कि वह क्यों पिछड़ी हुयी हैहमारे अपने उत्पाद क्यों न होंहम ख़ुद क्यों न बनाएंहम ख़ुद क्यों न पेश करेंहम अपनी बात दुनिया में क्यों न पेश करेंइमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) ने क़ौम में यह एहसास पैदा किया। उसके भीतर सक्षम होने का एहसास ज़िंदा किया। क़ौम में आत्म विश्वास जगायाआत्म विश्वास पैदा किया। आज ईरानी क़ौम में आत्म विश्वास पाया जाता है। आज आप किसी योरोपीय क़ौम यहाँ तक कि अमरीकी क़ौम की तरह ख़ुद को कमज़ोर नहीं पाते। छोटे होने का एहसास नहीं करते। आप कहते हैं कि हम सक्षम हैं और आपने करके दिखाया। पिछले चालीस बरसों से कुछ ज़्यादा मुद्दत मेंइस मुल्क में बड़े काम अंजाम पाए हैं जिनके बारे में अतीत में सोच भी नहीं सकते थेलेकिन वह काम कर दिखाए गए। अभी इस वक़्त भीयही स्थिति है। अलबत्ता हमारे कारनामों को छिपाते हैं और प्रचारिक मैदान में हम कमज़ोर हैं। इस वक़्त इन नौजवानों की हज़ारों कंपनियां काम कर रही हैं। कुछ बड़ी मशीनें तैयार कर रहे हैंअहम और बड़े काम किए जा रहे हैं। यही यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्सअपनी तैयार की हुयी कुछ मशीनें, सिर्फ़ तेहरान में ही नहीं बल्कि मुल्क के सुदूर इलाक़े मेंउन्होंने अपने औद्योगिक कारनामे दिखाए तो लोगों ने हैरत जतायीउन्हें यक़ीन नहीं आता था! कौन यक़ीन कर सकता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब ईरान ऐसा हथियार बनाएगा जिसकी नक़ल अमरीका करेगा? (2) किसी की अक़्ल में यह बात आती थीलेकिन यह हुआयह काम किया गया। इमाम (ख़ुमैनी) ने अवाम में यह आत्म विश्वास पैदा किया। उम्मीद और महत्वकांक्षा का जज़्बा पैदा किया। 

ख़ुद इमाम (ख़ुमैनी) भी इसी उम्मीद का प्रतीक थे। अपने सामने कोई मुश्किल नहीं देखते थे। फ़रमाते थे, ख़ुर्रमशहर फ़तह होना चाहिए! हम वहाँ थेवह ख़ुर्रमशहर जो चारों ओर से लश्करों की घेराबंदी में थाउस के लिए फ़रमाते थे कि "ख़ुर्मरशहर आज़ाद होना चाहिए"बस एक बात! यानी उन को यक़ीन था कि यह काम हो सकता है। उन्होंने कहा, नौजवानों ने हिम्मत की और यह काम हो गया। आप ख़ुद इस उम्मीद का प्रतीक थे और अवाम को इसी उम्मीद के रास्ते पर डाला। आज भी अगर यह दुष्ट शैतानी उकसावा न होऐसा ही हैकुछ लोग मुल्क के भीतर और कुछ बाहर से लगातार यह उकसावा पैदा करते है कि ईरानी नौजवानों में कोई उम्मीद नहीं हैउनका कोई भविष्य नहीं हैइस तरह की बातें करते हैंईरानी नौजवानों में उम्मीद भी है और उनका भविष्य भी उज्जवल है। वे अपना भविष्य सवांर रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं। 

22  बहमन को (11 फ़रवरी) 12 बहमन (फ़रवरी) वजूद में लाया। 22 बहमन (11 फ़रवरीइस्लामी इंक़ेलाब की सालगिरह और आज़ादी दिवस) अपनी तमाम महानताओं के साथ, 12 बहमन (फ़रवरीइमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह के ईरान आगमन का दिन) की देन है। अगर 12 बहमन (फ़रवरी) को इमाम (ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) न आए होतेआप का वह बेमिसाल स्वागत न हुआ होता तो 22 बहमन (11 फ़रवरी) का वाक़ेया भी न होता। ईरान का गणराज्य दिवस भी जो अप्रैल को है, 12 बहमन (फ़रवरी) की देन है। उसकी तरक़्क़ियां भी पहली फ़रवरी की देन हैं। ये बहुत अहम और इतिहास रचने वाला दिन है। 12 बहमन (फ़रवरी) यानी आज का दिन बहुत अहम है। यह हक़ीक़त में इतिहास बनाने वाला दिन है। इस को न भूलें। इमाम ( ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह) पर अल्लाह की जो कृपा थीउसकी बर्कत से यह काम अंजाम पाया और अलहम्दोलिल्लाह आज तक जारी है। अलबत्ता 12 बहमन (फ़रवरी) में जहाँ ये सारी बर्कतें थींवहीं अमरीका की दुश्मनी भी थी। अमरीका ने उसी 12 बहमन (पहली फ़रवरी) से अपनी दुश्मनी पहले से ज़्यादा उजागर कर दी थी। यह भी था। इस सिलसिले में बाद मेंमैं कुछ बिन्दु अर्ज़ करुंगा। यह कुछ जुमले (इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के ईरान आगमन के दिन) 12 बहमन मुताबिक़ पहली फ़रवरी के बारे में थे। 

अब आते हैं उस फ़ितने की ओर जो 8 और 9 जनवरी को हुआ।

मेरी समीक्षा यह है कि यह अमरीकी और ज़ायोनी फ़ितना था। मैं ने इस से पहले भी एक दिन यहीं एक सभा में कहा था। (3) जो लोग आकर बलवा कर रहे थेदो तरह के थे। कुछ लोग सरग़ना थे और कुछ उन के निर्देश पर अमल कर रहे थे। "औबाश क़िस्म के लोग जो इधर उधर भटकते हैं।" (4) सरग़ना ट्रेंड थेउन्होंने पैसे ले रखे थेट्रेनिंग ले रखी थीउन्हें सिखाया गया था कि किस तरह करतूत करेंकिस तरह हमला करेंकहाँ हमला करेंनौजवानों को किस तरह इकट्ठा करें, किस तरह बात करें। ये सारी बातें उन्हें सिखायी गयी थीं। बहुत से सरग़ना गिरफ़्तार हुए हैंउन्होंने इन बातों को स्वीकार किया है। 

कुछ माहौल से प्रभावित हो जाने वाले उत्तेजित नौजवान थे, हंगामा हुआ तो वह भी निकल पड़ेउनके संबंध में कोई मुश्किल नहीं है। यह फ़ितनाअमरीकी फ़ितना थायोजनाबंदीअमरीकी योजनाबंदी थी। सिर्फ़ अमरीका ही नहीं बल्कि इस में ज़ायोनी सरकार भी शामिल थी। यह जो हम अमरीका का नाम ले रहे हैं, यह सिर्फ़ दावा नहीं है; ख़ुफ़िया और जटिल सुरक्षा और इंटेलिजेंस रास्तों से मिलने वाली सूचना नहीं है। अलबत्ता क्यों नहीं, हमें ऐसी बहुत सी ख़ास बातों की जानकारी हैलेकिन जो बात स्पष्ट करती है कि यह अमरीकी करतूत थीख़ुद अमरीकी राष्ट्रपति के बयान हैं (5) पहली बात तो यह कि वे साफ़ लफ़्ज़ों में दंगाइयों को ईरानी अवाम के नाम से ख़ेताब कर रहे थे।

12 जनवरी को तेहरान और ईरान के अन्य शहरों में दसियों लाखों लोग इकट्ठा हुए, वे ईरानी अवाम नहीं थे (लेकिन) ये कुछ हज़ार लोग ईरानी अवाम थे! उन्हें वे कहते थे, "ईरानी जनता"। इसके बाद उन्होंने कहा "आगे बढ़ो, हम आ रहे हैं!"(6) तो यह फ़ितना, अमरीकी फ़ितना था। इस बात पर ध्यान रखें कि यह तेहरान में सामने आने वाला पहला फ़ितना नहीं था और आख़िरी भी नहीं होगा। इसके बाद भी इस तरह की घटनाएँ होंगी। यह पहला फ़ितना नहीं था और आख़िरी भी नहीं होगा। संभव है कि बाद में भी इस तरह की घटनाएँ हों। हम एक देश हैं, हमारी सोच नई है और हमारा रास्ता नया है, हम वैश्विक ग़ुंडों के हितों के अनुकूल नहीं हैं। हम उनसे टकरा रहे हैं। हमेशा इन बातों के इंतेज़ार में रहना चाहिए। रहा यह सवाल कि यह सिलसिला कब तक चलेगा? तो जवाब है कि उस वक़्त तक जब तक ईरानी राष्ट्र के मामलों में इतनी स्थिरता और मज़बूती न आ जाए जो दुश्मन को निराश कर दे, हमें उस मंज़िल तक पहुँचना है और हम पहुँचेंगे।

इस फ़ितने से पहले भी तेहरान की सड़कें अपराधों की गवाह रही हैंउन्होंने घटनाएँ देखी हैं। 20 जून 1981 को इसी तेहरान की सड़कों पर कारपेट काटने वाले चाक़ुओं से स्वयंसेवी बल (बसीज) के सदस्यों पर हमला किया गया! इस तरह की घटनाएँ हमने बहुत देखी हैं, यह पहली घटना नहीं थीआख़िरी भी नहीं है। इन सभी घटनाओं में बाहरी ताक़तों का हाथ था और ख़ास तौर पर इस हालिया घटना में।

अलबत्ता इस हाल के फ़ितने और इससे पहले की अन्य घटनाओं मेंअधिकारियोंपुलिस अधिकारियों, आई.आर.जी.सी. और स्वयंसेवी बल (बसीज) और अन्य सुरक्षा संस्थाओं ने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी तरह निभाईं लेकिन इस फ़ितने को राख के ढेर में बदलने वाली ख़ुद जनता है। इस बार भी2009 के फ़ितने में भी और अन्य घटनाओं में भी यही हुआ कि जब जनता ने फ़ैसला किया और फ़ितने की आग बुझाने के लिए मैदान में उतरी तो फ़ितनों के शोले राख के ढेर में बदल गए। यह इस बार भी हुआ और आगे भी अगर देश के सामने कोई घटना आई तो अल्लाह की मदद से जनता उसका मुक़ाबला करेगी और उसे भी नाकाम बना देगी।

इस फ़ितने की कुछ विशेषताएं थीं जिनमें से मैं दो-तीन का ज़िक्र करना चाहता हूँ।

एक यह है कि दंगाइयों ने व्यापारी समुदाय के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों की आड़ में अपनी पहचान छिपाई, जिस तरह कुछ अपराधीकुछ शहरों मेंदुनिया के कुछ स्थानों परपुलिस का सामना होने पर महिलाओं और बच्चों को ढाल बना लेते हैं। दंगाइयों ने व्यापारी बिरादरी के बीच छिपकर यह फ़ितना खड़ा किया था। व्यापारियों ने विरोध प्रदर्शन कियासड़कों पर आएउनमें से कुछ ने अपनी दुकानें बंद कर दी थीं। मैंने एक बारइसी स्थान परएक ऐसी ही बैठक में कहा था कि उनकी बातें तर्कसंगत और उचित थीं।(7) दंगाइयों ने अपनी पहचान छिपाने के लिए व्यापारी समुदाय का सहारा लिया लेकिन व्यापारी बिरादरी के लोग समझदार थे, मामले को समझ गए। जब उन्होंने देखा कि यह दंगा हैशांतिपूर्ण प्रदर्शन के बजाएपुलिस स्टेशनों पर हमले हो रहे हैं तो वे समझ गए कि ये दंगाई हैं और फिर उन्होंने ख़ुद को उनसे अलग कर लिया।

इस फ़ितने की दूसरी ख़ास बात यह थी कि यह एक विद्रोह की तरह था। दुनिया के कुछ देशों ने भी इस फ़ितने को बग़ावत कहा और कहा कि ईरान में बग़ावत हुई जिसे कुचल दिया गया। लेकिन यह बग़ावत ही थी। बग़ावत का मतलब क्या हैयानी इसका मक़सद देश के प्रभावशाली और संवेदनशील संस्थानों को नष्ट करना था। पुलिस पर हमला कियासेना पर हमला कियाकुछ अन्य सरकारी केंद्रों पर हमला कियाबैंकों पर हमला कियायह भौतिक पहलू था। इसके साथ ही मस्जिदों पर हमले किए गएक़ुरआन पर हमला किया गया, यह आध्यात्मिक पहलू था। देश चलाने वाले यही हैं। इन पर हमला किया गया।

एक और बिंदु जो इस फ़ितने में है और जिस पर ध्यान देना बेहतर हैवह यह है कि इस फ़ितने की योजना देश के बाहर बनाई गई थी। योजना देश के अंदर नहीं बनी थी। देश के अंदर दंगाइयों ने यह फ़ितना खड़ा किया लेकिन इसकी योजना देश के बाहर बनाई गई थी। उन्हें बाहर से आदेश दिए जा रहे थेउनका बाहर से संपर्क थाख़ासकर सरग़नाओं का। दंगाइयों के सरग़ना विदेशों से संपर्क में थे। बाहर से उनसे कहा जाता था कि अब यह काम करोअब फ़ुलाँ जगह हमला करोउस सड़क पर जाओ। यह निर्देश बाहर से उन्हें दिए जा रहे थे। सैटेलाइट वग़ैरा के ज़रिए वे जानकारी हासिल करते थे और दंगाइयों को आदेश देते थे।

एक जानकार सूत्र से मुझे पता चला कि अमरीकी सरकार के एक प्रभावशाली शख़्स ने अपने ईरानी पक्ष से कहा था कि यह हालिया घटना जो ईरान में हुईइसमें अमरीका और ज़ायोनी सरकार की जासूसी एजेंसियोंसीआईए और मोसाद ने अपनी पूरी ताक़त इस्तेमाल की थी। यह बात एक अमरीकी ने स्वीकार की है। उसने कहा कि जासूसी की दो प्रमुख और सक्रिय संस्थाओं सीआईए और मोसाद ने इस फ़ितने में अपनी पूरी ताक़त लगा दी थी लेकिन उन्हें हार मिली। तो योजना बाहर बनाई गई और बाहर से ही दंगाइयों को आदेश दिए जा रहे हैं।

इस फ़ितने की एक और ख़ासियत यह थी कि इसके सरग़ना पूरी तरह से प्रशिक्षित थे। वे हत्या और ख़ून-ख़राबे में माहिर थेउन्होंने नियमित ट्रेनिंग ले रखी थी। लोगों से उनकी कोई ख़ास दुश्मनी नहीं थी लेकिन हत्या करना उनका मिशन था। इसलिए वे पुलिस और सेना के केंद्रों पर हमले कर रहे थे। लोगों की हत्या के लिए हथियारों से हमले कर रहे थे। अपने निजी आधुनिक हथियारों से भी हमले कर रहे थे ताकि दूसरी ओर से भी प्रतिक्रिया आए और जवाबी हमले किए जाएं। यहां तक कि उन लोगों पर भी, जिन्हें वे ख़ुद प्रचार अभियान के ज़रिए मैदान में लाए थेपीछे से हमला कर रहे थे! मुझे बताया गया कि इस हमले में घायल हुए लोगों में से कुछ पर पीछे से हमला किया गया है। ये लोग अपने ख़ुद के लोगों पर भी दया नहीं करते थे ताकि मरने वालों की संख्या बढ़े और दुख की बात यह है कि इसमें वे कुछ हद तक सफल भी रहे। अलबत्ता दुश्मन चाहता था कि इससे ज़्यादा लोग मारे जाते। दुश्मन जितने लोगों की हत्या चाहता थाउतने लोग नहीं मारे गए लेकिन वह दावा कर रहा है। अलबत्ता उन जैसों के लिए इस तरह का झूठ कोई नई बात नहीं है। वे मारे गए लोगों की संख्या दस गुना बढ़ाकर बता रहे हैं।

दुश्मन का उद्देश्य देश की सुरक्षा ख़त्म करना था। वह चाहता था कि पहले ही चरण में देश की सुरक्षा ख़त्म हो जाए। सुरक्षा न हो तो कुछ भी नहीं बचता। जब सुरक्षा न हो तो उत्पादन भी नहीं होता और रोटी भी नहीं होती। पढ़ाई-लिखाई भी नहीं होतीस्कूल-कॉलेज भी नहीं होतेशोध कार्य भी नहीं होते। ज्ञान भी नहीं होतातरक़्क़ी भी नहीं होतीसुरक्षा हो तो यह सब होता है।

जिन लोगों ने देश में सुरक्षा की रक्षा की हैउनका हमारी गर्दनों पर अधिकार है। अगर हमारे बच्चे सड़कों पर स्कूल की ओर जा सकते हैं तो यह सुरक्षा की वजह से है, अगर सुरक्षा न हो तो आपके बच्चे स्कूल भी नहीं जा सकते। आप ख़ुद भी अपनी दुकानों में नहीं जा सकते। अपने काम पर नहीं जा सकते। यह नौजवान जो शोध और रिसर्च कर रहे हैंवे भी रिसर्च नहीं कर पाते।

वे लोग जनता को व्यवस्था के ख़िलाफ़ खड़ा करना चाहते थे लेकिन सौभाग्य से जनता से उन्हें मुँह की खानी पड़ी। 12 जनवरी को दसियों लाख लोग बाहर निकले और अपने आपको दिखा दिया कि जनता यह है। उन्होंने दंगाइयों के ख़िलाफ़ नारे लगाए। अधिकारियों को चाहिए कि जनता की क़द्र करें, वाक़ई देश के अधिकारियों को जनता की क़द्र करनी चाहिए।

यहाँ मैं यह बात कह दूँ कि यह फ़ितनासंयोग से हुआ था या सोच-समझ कर खड़ा किया गया थायह मैं नहीं कह सकतालेकिन यह ऐसे समय में खड़ा किया गया जब देश के अधिकारीसरकारी अधिकारीराष्ट्रपति(8) और अन्य उच्चाधिकारीदेश के लिए एक आर्थिक पैकेज तैयार कर रहे थे। वे देश के लिए आर्थिक योजना बना रहे थेक़दम उठा रहे थे, काम कर रहे थे कि हालात बेहतर हों और देश आगे बढ़े। ऐसे समय में यह फ़ितना खड़ा किया गया। अब यह कि यह एक संयोग था या सोच-समझ कर खड़ा किया गया थायह मैं नहीं कह सकता।

दाइश जैसी हिंसा भी इस फ़ितने की एक ख़ासियत थी। दाइश को किसने तैयार किया था? अमरीका के ही मौजूदा राष्ट्रपति ने अपने पहले कार्यकाल के चुनाव के दौरान स्पष्ट रूप से कहा था कि दाइश को हमने अस्तित्व दिया है। दाइश को अमरीकियों ने तैयार किया है। अमरीकी विदेश मंत्री ने यह आतंकवादी गुट बनाया। ख़ुद उस विदेश मंत्री नेजो एक महिला थी(9) कहा और अपनी तहरीर में लिखा है कि दाइश को हमने इराक़ और सीरिया पर क़ब्ज़े के लिए तैयार किया है। इस दाइश को भी उन्होंने ही तैयार किया है, यह एक और दाइश, इसका काम भी उसी के कामों जैसा है। उस दिन मैंने कहा था कि दाइश लोगों को बे-दीनी का आरोप लगाकर मार रहा था और यह दीनदारी की वजह से लोगों को क़त्ल कर रहे थे। फ़र्क़ सिर्फ यह हैवरना यह वही गुट है। इन्होंने भी दाइश की तरह लोगों को जला कर मार दिया! देखिए यह कितनी क्रूरता है कि किसी इंसान को ज़िंदा जलाकर मार दिया जाएसिर काट दिए जाएँ! यह वही काम हैं जो दाइशी आतंकवादी करते थे। हिंसा उनकी एक ख़ासियत थी।(10)

अब आपने ये जो नारे लगाए और अमरीका का नाम लियातो हम भी अमरीका के बारे में बात करते हैं। हमारी बातचीत का आख़िरी भाग अमरीका के बारे में है।

ईरान और अमरीका का मसला क्या हैइस टकराव में जो चालीस साल से ज़्यादा समय से चल रहा है और ईरान और अमरीका में दुश्मनी हैयह मसला क्या है? मेरे ख़याल में इस मसले को दो शब्दों में बयान किया जा सकता है कि अमरीका, ईरान को निगलना चाहता है लेकिन इस्लामी गणराज्य और ईरान की होशियार जनता रुकावट है। किसी ने कहा कि मैं रिश्ता माँगने गयासब कुछ ठीक रहा, बस दो जुमलों में पेंच फँस गया। मैंने कहा कि मुझे आपकी बेटी का रिश्ता चाहिए, उन्होंने कहा कि तुम्हारी इतनी मजाल!(11) ठीक इसी तरह ईरानी जनता ने सामने वाले पक्ष से कहा कि तुम्हारी इतनी मजाल! यानी ईरानी जनता का जुर्म यह है। लड़ाई इस बात की है।

आपका ईरानआपका मुल्क बहुत ज़्यादा आकर्षण रखता है। ईरान के तेल में बहुत आकर्षण हैईरान की गैस में आकर्षण हैईरान के खनिजों में आकर्षण हैईरान की रणनैतिक भूराजनैतिक पोज़ीशन में आकर्षण है और इसकी बहुत सी ख़ूबियाँ हैं जो आकर्षक हैं। ईरान ऐसा देश है कि एक वर्चस्ववादी लालची ताक़तइस पर लोभ की नज़र रखती हैईरान एक ऐसा देश है। वे इस देश पर क़ब्ज़ा करना चाहते हैं जिस तरह कि अतीत में यह देश उनके क़ब्ज़े में था।

लगभग तीस साल अमरीकी ईरान में रहे। ईरान के संसाधन उनके क़ब्ज़े में थेईरान का तेल उनके क़ब्ज़े में थाईरान की राजनीति उनके क़ब्ज़े में थीईरान की सुरक्षा उनके क़ब्ज़े में थीदुनिया के साथ ईरान के रिश्ते उनके क़ब्ज़े में थे, सब कुछ उनके क़ब्ज़े में था। तीस साल तक उन्होंने यहाँ जो चाहा किया। अब जबकि उनका प्रभाव और वर्चस्व ख़त्म हो गया है तो वे यहाँ दोबारा वही पहलवी दौर की स्थिति लौटाना चाहते हैं। लेकिन ईरानी जनता उनके मुक़ाबले में डट गई है। ईरान से उनकी दुश्मनी की वजह यही है। लड़ाई यही है। बाक़ी बातें जैसे मानवाधिकार की बात और दूसरी बातें जो वे करते हैंसब बेकार की बातें हैं। अस्ल समस्या यही है। ईरान पर उसकी लालच की नज़र है लेकिन ईरान उनके मुक़ाबले में मज़बूती के साथ डटा हुआ है और इसी तरह दृढ़ता के साथ डटा रहेगा और दूसरे पक्ष को अपनी सभी यातनादायक हरकतों में सिर्फ़ निराशा ही हाथ लगेगी।

यह जो आप देखते हैं कि वे कभी-कभी युद्ध की बात करते हैं कि हम इस तरह के युद्धक विमानों के साथ आएंगे और यह कर देंगेवह कर देंगे, यह कोई नई बात नहीं है। अतीत में भी अमरीकी धमकियाँ देते रहे हैं। "सभी विकल्प मेज़ पर हैं।" सभी विकल्प यानी युद्ध समेत सभी विकल्पयह तो उन्होंने हमेशा कहा है कि सभी विकल्प मेज़ पर हैं। यह साहब भी इसी तरह निरंतर दावा कर रहे हैं कि हम जंगी बेड़ा ले आए और इसी तरह के दूसरे काम कर दिएमेरी नज़र में ईरानी राष्ट्र को इन बातों से नहीं डराना चाहिए। ईरानी जनता इन बातों से डरने वाले नहीं हैं। वह हक़ की लड़ाई से नहीं डरती। हम युद्ध शुरू करने वाले नहीं हैं, किसी पर ज़ुल्म नहीं करना चाहते, किसी देश पर हमला नहीं करना चाहते लेकिन किसी को इस बात की इजाज़त भी नहीं देंगे कि वह हमारे देश पर लालच की नज़र रखेअगर कोई हमला करना और तकलीफ पहुँचाना चाहेगा तो उसे ईरानी राष्ट्र का मज़बूत जवाब मिलेगा। अमरीकियों को जान लेना चाहिए कि अगर इस बार उन्होंने युद्ध छेड़ा तो यह युद्ध क्षेत्रीय युद्ध होगा।

आप सब पर सलाम और अल्लाह की रहमत और बरकत हो।

1.  दो नवम्बर 2025 को देश के स्वयं सेवियों से मुलाक़ात में संबोधन

2अमरीका के लुकास ड्रोन की ओर इशारा जो ईरान के शाहिद-136 ड्रोन की नक़ल है।

3.17   जनवरी 2026 को जनता के विभिन्न वर्गों से संबोधन

4नहजुल बलाग़ाहिकमत 147

5डोनल्ड ट्रम्प

6उपस्थित लोगों की हँसी

7.3   जनवरी 2026 कोअमीरुल मोमेनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के शुभ जन्मदिन और शहीद जनरल क़ासिम सुलैमानी की बरसी पर 12 दिवसीय थोपी गई जंग के शहीदों के परिवारों से मुलाक़ात में संबोधन

8डॉक्टर मसऊद पिज़िश्कियान

9हिलेरी क्लिंटन

10. "अमरीका मुर्दाबाद" के नारे

11. उपस्थित लोगों की हँसी

11/02/2026