फ़िलिस्तीनी फ़्रेम्ज़ः कैमरे और नेगेटिव से जालसाज़ी की कोशिशें कैसे नाकाम हुईं
19वीं सदी के आग़ाज़ के अंधकारमय बरसों में, जब दुनिया नेपोलियन के बाद पुनर्निर्माण का विचार कर रही थी, जोज़फ़ नीप्स और लुई डागर ने अपने घर के डार्क रूम में एक आविष्कार किया। फ़ोटोग्राफ़ी का आविष्कार, उस वक़्त की दुनिया ने ऐसा आविष्कार देखा जो किसी चीज़ को उसके वाक़ई रूप में दिखाती थी। तस्वीर, किसी हक़ीक़त को एक छोटे से फ़्रेम में क़ैद करके, सीधे अपने दर्शक को पेश करती है।
सन 1839 में फ़्रांस के दो फ़ोटोग्राफ़र, फ़ोटोग्राफ़ी के मक़सद से फ़िरऔनों की सरज़मीन मिस्र पहुंचे और फिर वहाँ से बैतुल मुक़द्दस पहुंचे; ये वे लोग थे जिन्होंने सबसे पहले इस शहर के धार्मिक मंज़रों को तस्वीर में क़ैद किया। "पाकीज़ा सरज़मीन" से फ़ोटोग्राफ़ी की लहर शुरू हुयी और एक दशक से भी कम वक़्त में पूरी दुनिया से सैकड़ों फ़ोटोग्राफ़र फ़िलिस्तीन के लिए, जो सभी बड़े धर्मों के लिए पाकीज़ा सरज़मीन है, रवाना हुए।
लेकिन आग़ाज़ के फ़्रेमों में लोग नहीं हैं ताकि ये तस्वीरें बाइबल में जिस अमर सरज़मीन का ज़िक्र है, उसे बयान करे न कि उन ज़िंदा लोगों की जो वहां ज़िंदगी गुज़ार रहे थे। इमारतें और घर फ़्रेंम की शोभा बने लेकिन फ़िलिस्तीन के निवासियों की तस्वीर में कोई जगह नहीं थी। अगर किसी फ़्रेम में किसी इंसान का चेहरा था भी तो वह सिर्फ़ इमारत की शान को दिखाने के लिए था। यह सरज़मीन योरोप की तस्वीरों के फ़्रेमों में पाकीज़ा सरज़मीन लेकिन इंसानों से ख़ाली दिखाई गयी थी। किसी को यक़ीन नहीं था कि इंसानों से ख़ाली ये फ़्रेंम, पाकीज़ा सरज़मीन के बारे में नए नरेटिव को दुनिया वालों के मन में जगह देंगे। ऐसी सरज़मीन जो हमेशा लोगों के ख़याल में बिना राष्ट्र और बिना पहचान वाली रहे कि जिसे बाद में क़ब्ज़े के लिए तैयार किया जा रहा था।
आग़ाज़ के दिनों के फ़्रेम; जब नई सच्चाई को गढ़ा गया
1850 और 60 के दशक, फ़ोटोग्राफ़ी के उदय का दौर था। अमरीका के गृह युद्ध ने फ़ोटोग्राफ़ी को एक प्रभावी मीडिया बना दिया था, लेकिन पाकीज़ा सरज़मीन के लिए फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अलग रोल रखा गयाः बाइबल की कहानियों के लिए चश्मदीद गवाह की तलाश। शुरू से ही ऐसे फ़्रेम बनाए गए जिसमें कोई इंसान न हो; ऐसे फ़ोटोग्राफ़र जो सलीबी जंगों की ख़ाक से उठे थे ताकि एक बार फिर इस ज़मीन को एक एक फ़्रेम करके फ़तह करें। इस बीच, फ़िलिस्तीन पर उस्मानी शासन का सदियों का वर्चस्व ख़त्म हो रहा था। यहूदियों का पलायन शुरू हो चुका था। तस्वीरें, इंसानों को दिखाने के बजाए पलायनकर्ताओं के लिए (इंसानों से ख़ाली) पाकीज़ा सरज़मीन का नक़्शा पेश कर रही थीं। उन इंसानों से ख़ाली फ़्रेमों ने, "बिना सरज़मीन वाली क़ौम के लिए बिना क़ौम वाली सरज़मीन" का नरेटिव पेश किया। फ़ोटोग्राफ़ी सच्चाई को सुरक्षित करने के बजाए, सच्चाई में फेरबदल का साधन बन गयी। पहला विश्व युद्ध जिसका देव सबको निगल गया, बालफ़ोर घोषणापत्र और इस्राईल के वजूद की पृष्ठिभूमि बना। ब्रिटिश फ़ौजी बैतुल मुक़द्दस की गलियों में घूमते थे और योरोपीय-यहूदी कैमरों के फ़ोटो खींचने की आवाज़ वातावरण में फैल गयी। नई तस्वीरें, उन्हीं पुराने मंज़रों को दिखाती थीं लेकिन इस बार ऐसे फ़ुटनोट के साथ जिनमें उनकी पहचान बदली हुयी होती थी। हक़ीक़त को उलट दिया गया। लोगों को मार दिया गया, इतिहास मिटा दिया गया और फ़्रेम्ज़ ख़ुद साम्राज्यवादी हथियार में बदल गए।
फ़ोटोग्राफ़ी पर कंट्रोल से ज़मीन पर क़ब्ज़ा
लेकिन उसी बैतुल मुक़द्दस के केन्द्र में, 19वीं सदी के अंतिम दशक में, एक छोटा सा स्कूल क़ायम हुआ, एक स्कूल जिसे सेंट जेम्ज़ गिरजाघर के प्रांगण में क़ायम किया गया और वहाँ फ़िलिस्तीनी फ़ोटोग्राफ़रों की पहली पीढ़ी को ट्रेनिंग दी गयी। इस स्कूल के बहुत ही मेहनती शिष्य गाराबुद ग्रेगोरियन ने, याफ़ा स्ट्रीट पर फ़िलिस्तीनियों का पहला स्टूडियो क़ायम किया और लोगों के चेहरों, रीति रिवाजों और ज़िंदगी की तस्वीरें खींची गईं। बरसों बाद फ़िलिस्तीनी फ़ोटोग्राफ़रों की नई नस्ल ज़ाहिर हुयी; जिसमें फ़ुज़ैल साब्बा, ख़लील राद और करीमा अबूद उल्लेखनीय हैं। वे अपनी पिछली नस्ल के विपरीत स्टूडियो से बाहर निकले और अपने कैमरों में घरों और सड़कों की तस्वीरें खींचकर उनकी रक्षा की। उनके लिए फ़ोटोग्राफ़ी मनोरंजन नहीं था बल्कि उस हक़ीक़त की रक्षा थी जिसे दूसरे फ़्रेमों से मिटा दिया गया था।
फ़ुज़ैल साब्बा ने जो रीति रिवाजों और ऐनुल अज़रा चश्मे से पानी भरने वाली औरतों की तस्वीरें खींचते थे, ज़िंदगी को दोबारा फ़्रेम के ज़रिए लौटाया। ऐसी परंपरा जो नासेरिया के लोगों को, जन्म की याद दिलाती थी, उनका फ़्रेम एक क़ौम के जारी वजूद के सांस्कृतिक पहलू को बयान करने वाला बन गया। याफ़ा संतरे के बाग़ों के चौकीदार ख़लील राद, ऐसे नक़ली फ़्रेमों के मुक़ाबले में डट गए जो बागों को यहूदियों की फ़सल बताते थे। फ़िलिस्तीनी किसानों और मज़दूरों की उनकी तस्वीरें, तस्वीर पर कंट्रोल की कोशिश को धैर्य और शांति से भरा जवाब थीं। और बैत लेहम की करीमा अबूद ने पहली फ़िलिस्तीनी महिला फ़ोटोग्राफ़र बनकर बेजा रोकटोक की ज़ंजीर को तोड़ा। उन्होंने उस कैमरे के साथ जिसे उनके पिता ने उनके लिए ख़रीदा था, फ़िलिस्तीनी शहरों का सफ़र किया और अपनी सरज़मीन के मर्दों और औरतों की आवाज़ को फ़्रेम में जगह थी। जब उनके भाई ब्रिटिश सैनिकों के हाथों मिलने वाली यातना के नतीजे में इस दुनिया से चल बसे तो करीमा ने आख़िरी सांस तक फ़ोटोग्राफ़ी करने का फ़ैसला किया। उन्होंने वसीयत की कि उनका कैमरा उनके साथ दफ़्न न हो, बाक़ी रहे ताकि ऐसी चीज़ें देख सकें जिसे वे फिर देख न पाएंगी।
वे आँखें जो जाग गयीं
नकबा घटना के बाद, फ़िलिस्तीन में कैमरे बंद नहीं हुए। कीग़ाम जग़लियान, ग़ज़ा पर नाजायज़ क़ब्ज़े के दिनों में, अपने घर की खिड़कियों से कंबल में छिपाए कैमरे से फ़ोटोग्राफ़ी करते थे। उन्होंने बेघर होने वालों, खाने की लाइनों और खंडहरों में बच्चों के खेल की तस्वीरें खींची। उनके फ़्रेम, शहरों के ख़ुशी से वीरानी तक रूप के बदले जाने की कोशिशों के ज़िंदा गवाह थे। जिस वक़्त फ़िलिस्तीनियों के नरेटिव की अनदेखी की गयी, पश्चिमी कैमरे लौट आए। लाइफ़ और टाइम मैग्ज़ीनों के फ़ोटोग्राफ़र और मीशा बरआम ने इस्राईल की जीत पर आधारित फ़्रेम दुनिया को पेश किए। पीड़ा और बेवतनी के फ़्रेमों की जगह, छह दिवसीय जंग और जीत के जश्न के कलर फ़्रेमों ने ले ली। फिर से सत्ताधारियों के स्टूडियो में सच्चाई गढ़ी गयी।
इस बीच इस अंधकारमय हालात में, नई नस्ल उठ खड़ी हुयी। ये वे जवान थे जो कैंपों में पले बढ़े थे और अब वे पत्थर और कैमरे से अपनी पहचान को बताते थे। इंतेफ़ाज़ा, उन आँखों द्वारा लाया गया आंदोलन था जो जाग गयी थीं। उन्हीं में से एक ओसामा सलवादी थे। ऐसे फ़ोटोग्राफ़र जिन्होंने जंगली फूलों की तस्वीरों से फ़ोटोग्राफ़ी शुरू की और इंतेफ़ाज़ा के क्रोध और ख़ून तक जारी रखी। इस्राईली फ़ौजियों और फ़िलिस्तीनी औरतों के बीच झड़प, विरोध प्रदर्शनों और सड़कों पर चीख़ को क़ैद करने वाले उनके फ़्रेम पूरी दुनिया में मशहूर हुए। वह मानो स्नाइपर के रूप में ऐसे फ़ोटोग्राफ़र थे जो मौत और ज़िंदगी के क्षणों का शिकार करते थे। सलवादी ने अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों के साथ बरसों काम करने के बाद अपने सपने को पूरा कियाः उनका सपना थी ऐसी न्यूज़ एजेंसी जिसके सभी कर्मचारी फ़िलिस्तीनी हों। लेकिन गोलियों ने उनके भी बदन को छलनी कर दिया और उन्हें व्हील चेयर पर बिठा दिया। इसके बावजूद वे फ़ोटोग्राफ़ी करते रहे; इस बार फ़िलिस्तीन की संस्कृति और विरासत की। उनका मानना था कि अगर दुश्मन ज़मीन ले ले तो शायद उसे एक दिन वापस लिया जा सकता है लेकिन अगर आपकी पहचान और संस्कृति ख़त्म हो जाए, तो समझिए सभी चीज़ें हाथ से चली गयी हैं।
फ़्लैश और ख़ून की मीरास
आज जब ग़ज़ा पट्टी और फ़िलिस्तीन में जंग की आग फिर भड़क रही है, दुनिया ऐसी तस्वीरों को देख रही है जिसे पेश करने वाले फ़िलिस्तीनी हैं। फ़ातेमा शब्बीर, मोहम्मद सालिम और बहुत से दूसरे जवान फ़ोटोग्राफ़रों ने करीमा अबूद, ख़लील राद और कीग़ाम जग़लियान की मीरास को आगे बढ़ाया है। उनके फ़्रेम उसी तारीख़ का क्रम हैं; जंग की ठंडक में बच्चों, दुखी माओं, गिरी हुयी दीवारों और संतरे तथा ज़ैतून के बागों के फ़्रेम।
ये तस्वीरें चीख़ चीख़ कर कह रही हैं: हम यहाँ हैं, ये हमारी सरज़मीन है।
इमाम ख़ामेनेई ने इस जज़्बे की इस तरह व्याख्या कीः यह आपका भ्रम है जो आप यह सोच रहे हैं कि एक क़ौम को इतिहास के पन्ने से मिटाकर उसकी जगह एक नक़ली क़ौम को लाया जा सकता है! फ़िलिस्तीनी क़ौम की संस्कृति है, इतिहास है, रेकॉर्ड है, सभ्यता है, हज़ारों साल से इस क़ौम ने इस मुल्क में ज़िंदगी बसर की है...दुनिया की कोई ताक़त फ़िलिस्तीन की आज़ादी और उसकी तरफ़ उसके मालिकों को वापसी के जज़्बे को दुनिया में और मुसलमान क़ौमों के दिल और ख़ास तौर पर फ़िलिस्तीनी क़ौम के दिल से नहीं निकाल सकती।1
(स्वंयसेवी बल बसीज से 20 अक्तूबर 2000 को ख़ेताब)
फ़िलिस्तीन के फ़्रेम, सिर्फ़ तस्वीर नहीं बल्कि एक क़ौम का ज़िंदा इतिहास हैं, वह इतिहास जो ख़ून, फ़्लैश और निगेटिव्ज़ से लिखा गया है। पेरिस के डार्क रूम्ज़ से लेकर ग़ज़ा पट्टी की उजड़ी हुयी सड़कों तक, एक रास्ता हमेशा मौजूद हैः देखने की कोशिश, अपनी सरज़मीन में रहने की कोशिश, बात पहुंचाने की कोशिश। जिस दुनिया ने शुरूआत के फ़्रेमों से ही यह सीखा कि किस तरह हक़ीक़त को गढ़ा जाता है, उसी दुनिया ने फ़िलिस्तीनियों से सीखा कि किस तरह हक़ीक़त को वापस लिया जाए।
वे अब भी संघर्ष जार रखे हुए हैं, खंडहरों की हर तस्वीर में, फ़्रेम से बाहर देखते हुए हर चेहरे की तस्वीर में, मानो फ़िलिस्तीन के इतिहास के फ़ोटोग्राफ़रों की आत्मा, उनकी आने वाली पीढ़ी में फूंक दी जाती है।
गर्द व ग़ुबार के बीच ऐसा प्रकाश है जो अब भी जगमगा रहा है और ख़ून से गुज़रने वाली हर नेगेटिव में बाप दादा की सरज़मीन की एक ज़िंदा तस्वीर मौजूद है।
फ़िलिस्तीन, अपने तमाम फ़्रेम्ज़ के साथ।
यह लेख, "फ़िलिस्तीनी फ़्रेम्ज़" नामक डॉक्यूमेंट्री पर आधारित है। इसके निर्देशक सईद फ़रजी हैं और यह सन 2024 में तैयार हुयी थी।
[1] https://farsi.khamenei.ir/speech-content?id=3030
29/10/2025

