सभी महिला क़ैदी मार दी गयीं
ज़ायोनियों की घिसी पिटी टैक्टिक और उनकी मरने के कगार पर पहुंच चुकी प्रचारिक मशीन के बारे में
मोहम्मद रहीमी
पत्रकार और शोधकर्ता
हमास ने जो 20 ज़िंदा क़ैदी हवाले किए मर्द हैं और हमास ने सभी महिला क़ैदियों को मार डाला!
ये कुछ जुमले पिछले 24 घंटों में सोशल मीडिया पर ज़ायोनी शासन के समर्थक पेजेज़ पर बारबार प्रकाशित हुए। कुछ लाइनें जो शायद उन लोगों के मन पर प्रभाव डाल सकती हैं जिनकी याद्दाश्त कम है या उनके पास सूचना नहीं है, लेकिन उन लोगों के लिए निश्चित रूप से हास्यास्पद और अफ़सोसनाक है जिनकी पिछले दो साल से ग़ज़ा जंग और वहाँ जारी नस्ली सफ़ाए पर नज़र थी।
इन बातों के झूठ को साबित करने के लिए बहुत ज़्यादा रिसर्च या ज़मीनी स्तर पर छानबीन की ज़रूरत नहीं है। आपको सिर्फ़ कुछ महीने पहले की बातें याद करने की ज़रूरत है जब इससे पहले के संघर्ष विराम और क़ैदियों के तबादले के चरण में, ग़ज़ा में बचे हुए इन 20 फ़ौजियों से पहले, सभी महिला और बूढ़े क़ैदियों का तबादला हुआ था।1 उन तमाम दिनों में जब ज़ायोनी शासन पूरी ताक़त से ग़ज़ा पट्टी पर बमबारी और अपने क़ैदियों को मारने की कोशिश में था ताकि रेज़िस्टेंस के हाथों से दबाव के इस साधन को ले ले, हमास की विशेष फ़ोर्स ने सुरंगों और अनेक गुप्त ठिकानों में इन क़ैदियों की रक्षा की। लेकिन अब संघर्ष विराम पर दस्तख़त के बाद, अचानक कुछ महिला क़ैदियों की जान, ज़ायोनियों की प्रचारिक मशीन का सबसे अहम मुद्दा बन गयी है।
वही घिसी पिटी और हास्यास्पद टैक्टिक
क़ैदियों के तबादले के पिछले चरण और क़स्साम ब्रिगेड द्वारा उन्हें हवाले किए जाने के भव्य समारोह को ज़्यादा वक़्त नहीं गुज़रा है।2 उसी समारोह में एक इस्राईली क़ैदी ने अपने फ़िलिस्तीनी रक्षक का, कई महीने तक उसकी रक्षा में ज़हमत उठाने के लिए माथे को चूमा था। और कुछ महीने पहले जिस महिला क़ैदी को पूरे सम्मान और रक्षा के साथ ग़ज़ा में रखा गया था और उसका तबादला हुआ था, उसके घर में उसके इस्राईली बॉडिबिल्डिंग के कोच ने उसके साथ बलात्कार किया।3 क़स्साम ब्रिगेड की शराफ़त उसी 7 अक्तूबर 2023 के दिन ज़ाहिर हो गयी और हर दिन ज़ायोनी शासन की प्रोपैगंडा मशीनरी जो उन पर यौन दुराचार और बच्चों को क़त्ल करने और जलाने का इल्ज़ाम लगाती रही, जनमत की नज़र में अपना एतेबार खोती गयी।3 इस नस्ली सफ़ाए के दौरान ये इस्राईली सैनिक थे जिन्होंने अवाम और फ़िलिस्तीनी मुजाहिदों के मनोबल को कमज़ोर करने के लिए, सोशल मीडिया चैनलों पर ग़ज़ा की औरतों के अंडरगार्मेंट्स की तस्वीरें प्रकाशित करते थे4 और बड़ी निर्दयता से उन्हें ज़िंदगी की मूल ज़रूरतों और स्वास्थ्य की सहूलतों से वंचित रखा।5 अब यही अपराधी झूठ के ज़रिए अपनी दूसरी छवि दुनिया को पेश करना चाहते हैं। हालांकि इस वक़्त ज़ायोनी शासन और उसकी प्रोपैगंडा मशीनरी अपने इतिहास में सबसे बुरी स्थिति में है, फिर भी बहुत अहम सच्चाई के बारे में खुले और हास्यास्पद झूठ को फैलाने की कोशिश में है।
मौत के मुहाने पर पहुंच चुकी मशीनरी और उसका नया विचार
फ़िलिस्तीन के मुद्दे के नरेटिव पर ज़ायोनियों के वर्चस्व को अलअक़्सा फ़्लड आप्रेशन तोड़ने में सफल रहा। इस्राईल की हार के इस क्रम का दायरा दुनिया की जनमत तक पहुंचा यहाँ तक कि उसके सबसे बड़े समर्थक अमरीका के जनमत पर भी इसका असर हुआ। ताज़ा सर्वे बताते हैं कि इस विवाद के इतिहास में पहली बार हुआ जब अमरीका की आधी से ज़्यादा जनता, ज़ायोनी शासन के संबंध में नकारात्मक विचार रखती है। 6 यही वजह है कि जंग के दौरान नेतन्याहू बार बार (प्रचारिक जंग को हारने)7 की बात करते रहे और हर बार सोशल मीडिया चैनलों पर अलगोरिथ्म को बदलने की ज़रूरत और ज़ायोनी विरोधी और हक़ीक़त का पर्दाफ़ाश करने वाले कंटेन्ट पर रोक लगाने के लिए बल प्रयोग की बात की।8
ऐसा लगता है कि ज़ायोनियों के सामने जंग का नया मैदान, साइबर स्पेस पर जनमन से लड़ने का मैदान है। यही वजह है कि टिकटॉक को जिसका अमरीकी जवान नस्ल के विचार और आम संस्कृति में बड़ा असर है, अमरीकी सरकार के सीधे हस्तक्षेप से और इस्राईल के समर्थक पूंजीपतियों के हाथों ख़रीदा जा चुका है और उन्होंने भी साफ़ तौर पर इस्राइल का समर्थन करने वाले कंटेन्ट अपलोड किए जाने की बात की है।9 नेतनयाहू ने भी साफ़ लफ़्ज़ों में एक्स जैसे सोशल मीडिया चैनलों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने पर बल दिया और महिला क़ैदियों के बारे में झूठ पर आधारित ताज़ा कैम्पेन, इस हथकंडे का इस्तेमाल शुरू होने का पता देता है।10
मौत के मुहाने पर पहुंच चुका ज़ायोनी शासन और उसकी प्रोपैगंडा मशीनरी अच्छी तरह जानती है कि अचानक मीडिया पर सेंसर का बड़े पैमाने पर कड़ा विरोध होगा और शायद इसका नतीजा पहले से ज़्यादा गंभीर हो। यही वजह है कि क़रीब एक महीने से ज़्यादा समय से अपनी छवि को सामान्य बनाने और मौजूदा स्थिति से
निकलने के लिए मीडिया में अनेक तरह के कैम्पेन चला रहा है। लेकिन ज़ायोनी शासन के प्रचारिक तंत्र के कमज़ोर होने की निशानी उस वक़्त ज़्यादा ज़ाहिर होती है कि इन कैम्पेन के शुरू होने के बाद, इन कंटेन्ट्स और इन्हें प्रकाशित करने वाले चैनलों में समानता इतनी स्पष्ट थी कि साइबर स्पेस पर बहुत से कार्यकर्ताओं का ध्यान इस ओर गया। बहुत जल्द इस साठगांठ की बात लीक हो गयी और पता चला कि ज़ायोनी शासन और उसके समर्थक इंटरनेट इन्फ्लुएंसर्ज़ को लाखों यहाँ तक कि दसियों लाख डॉलर दे रहे हैं।11 ज़ायोनियों ने अपनी छवि को सुधारने और साइबर स्पेस पर दमन को लागू करने का एजेंडा अपना रखा है लेकिन ऐसा लगता है कि इस वक़्त शैली के अनुपयोगी होने के बावजूद उनकी और जटिल और गुप्त योजनाओं का इंतेज़ार करना चाहिए। हालिया नाकाम कैम्पेन के संबंध में एक बिन्दु का उल्लेख बेहतर रहेगा।
साम्राज्यवाद का कामयाब हथकंडा
ज़ायोनियों का साइबर स्पेस पर ताज़ा कैम्पेन एक सफल तरकीब को फिर से मैदान में अपनाना चाहता है। इस्लामी संस्कृति और महिला अधिकार को एक दूसरे का विरोधी दर्शाने की उनकी कोशिश, क्षेत्र के अनेक विवादों में उनके लिए फ़ायदेमंद रही और उन्हें उम्मीद है कि इस बार भी यह उपयोगी होगी। अमरीका और ज़ायोनी शासन ने अब्राहम अकॉर्ड के आग़ाज़ के समय से, इस हथकंडे को सन 2018 और 2019 में सूडान में, सन 2020 और 2021 में ईरान में अपनाया। महिला के मुद्दे को हथकंडा बनाकर दो बड़े इस्लामी मुल्क के रूप में ईरान के ख़िलाफ़ अभूतपूर्व स्तर पर हमला और सूडान का बंटवारा, शायद क्षेत्र में पश्चिम की आक्रामक रणनीति को आग़ाज़ में मिलने वाली सबसे अहम सफलता थी, ऐसी रणनीति जो अलअक़्सा फ़्लड आप्रेशन, ग़ज़ा में नस्ली सफ़ाए, लेबनान, सीरिया, यमन और ईरान पर हमले में अपने चरम पर पहुंची।
पश्चिम के थिंक टैंक ने इस्लामी और साम्राज्यवाद के विरोधी गुटों के बीच एक बुनियादी मतभेद को सही तरह से चिंहित किया है। फ़िलिस्तीन मुद्दे के समर्थकों के कोर हिस्से में, जो मुख्य रूप से मुसलमान गुटों और दुनिया में वामपंथी के नाम से जाने जाने वाले गुटों पर आधारित है, महिला अधिकार के विषय पर बुनियादी मतभेद है। अमरीका और ज़ायोनी शासन जो पुरानी साम्राज्यावादी टैक्टिक12 के वारिस हैं, अब जनमत की निगाह में अपनी पिछली स्थिति को फिर से हासिल करने के लिए इसी मुद्दे पर कोशिश केन्द्रित कर रहे हैं ताकि इस फूट की आड़ में नयी सफलताएं हासिल करें।
महिला के विषय पर फ़िलिस्तीन के समर्थकों के बीच मतभेद की जड़ सृष्टि की समझ और दर्शन की गहरी बुनियादों में निहित है लेकिन ज़रूरी नहीं है कि फ़िलिस्तीन के मसले पर ये विचारधाराएं आपसी सहयोग में रुकावट बनें। जैसा कि इन दो बरसों में फ़िलिस्तीनी महिलाओं के धैर्य और रेज़िस्टेंस ने, इस्लाम के बारे में दुनिया के जिन लोगों के मन में ग़लत विचार थे, उसे सही कर दिया। ग़ज़ा पट्टी की महिलाओं का यह संघर्ष और धैर्य, महिला के विषय पर इस्लाम के नज़रिए की हक़ीक़त को बयान करने और मीडिया के प्रभाव से दूर एक संयुक्त समझ को बनाने की पृष्ठिभूमि बन सकता है। फ़िलिस्तीन का मुद्दा जिस तरह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर और मुल्कों13 की आंतरिक राजनीति में बहुत सी गुत्थियों के सुलझने की कुंजी है, उसी तरह दुनिया में महिला के मुद्दे को हल करने की भी कुंजी हो सकता है।
16/10/2025

